Ayurveda Great Of Word

Ayurveda Best For Advice On Your Health

USE AYURVEDA AND TRETMENT SAVE YOU AND YOUR FAMILY

AYURVEDA AND FITTENES www.GkAyurved.Com

Get Glowing Skin And Body

Get glowing skin and healthy life every day Daily Visit

Benefits of daily yoga

Always get disease and get impeccable skin and healthy life

Faundder And ,CEO

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

वीर्य की सुरक्षा करना ही हैं ब्रम्हचर्य-व्रत का पालन

 

वीर्य की सुरक्षा करना ही हैं ब्रम्हचर्य-व्रत का पालन

‘वीर्य’ हमारे खान-पान का अंतिम लक्ष्य हैं I अंतिम पड़ाव हैं I पूरा सार हैं I निचोड़ हैं I जब हमारे पूर्ण आहार का यही निष्कर्ष हैं, तब इसकी भली प्रकार रक्षा तो होनी चाहिए I हमारा भोजन चबाये जाने, लार के साथ मिलकर एक के बाद एक धातु बनाता व बदलता जाता हैं I इन सात धातुओ में भोजन का परिवर्तन ही अंतिम अवस्था में ‘वीर्य’ निर्मित होता हैं I हमारे शारीर का सार अंश ही वीर्य हैं I वीर्य के रूप में संग्रहित हैं I अतः अमूल्य हैं I बहुमूल्य भी कह सकते हैं I यही हमेरे स्वास्थ्य, हमारी निरोगता  का आधार हैं I यदि हम इसे बचा पाते हैं तो हम अपने प्रत्येक अंग की सही रक्षा कर सकते हैं I

रज-वीर्य

मनुष्य के भोजन के बाद जो अंतिम धातु वीर्य बनता है, यही संतानोत्पत्ति का स्तम्भ हैं I सभी इन्द्रियों का मूल अंश यही हैं I सम्भोग के समय पुरुष के लिंग से स्खलित होकर वीर्य, स्त्री की योनी में, रज के साथ जा मिलता हैं I वीर्य और रज के सही मिलाप से ही स्त्री गर्भ धारण करती हैं I रज और वीर्य का सही समय पर सम्भोग ही संतान पैदा हो सकने का कारण हैं I आधार हैं I

 अतुल शक्ति का भंडार

हमारे शारीर में विद्यमान तथा बनने वाला वीर्य अपूर्व शक्ति हैं I अतुल शक्ति का भण्डार हैं I जो व्यक्ति अपने विचार शुद्ध रखकर नारी के करीब नहीं जाता वह वीर्य को खंडित होने से बचा सकता हैं I इसकी रक्षा कर सकता हैं I जिस युवक के विचार अशुद्ध होंगे I अश्लील साहित्य पढ़ेगा I बुरे मित्रों में रहेगा I उसे रात को अनेक उत्तेजक बाते याद आयेगी I उसमे उत्तेजना उठेगी I उसे सपने आएंगे I सपनो में वह किसी लड़की से संपर्क बनाकर उसके शरीर को अपने साथ पायेगा I इससे वीर्य का स्खलन होगा I वह कृत्रिम तौर पर सम्भोग करेगा I यही स्वप्नदोष हैं I जो वीर्य की क्षति कर देगा I वीर्य क्षय होगा I बस हो गया ब्रम्हचर्य भंग I यदि यह वीर्य की अतुल शक्ति संभली रहती  है तो हमारे स्वास्थ में वृद्धि होती हैं I निरोगता पाते हैं I

ब्रम्ह की प्राप्ति

एक विद्वान का मानना है यदि यह शक्ति अन्दर-प्रविष्ट हो जाये तो क्या कहने I तो क्या बात है I समझ ले की आत्म-दर्शन का मार्ग  प्रशस्त हो जाता है I हम परमात्मा को पा सकते हैं I ब्रम्हचर्य का अर्थ ‘ब्रम्ह की प्राप्ति’ भी हैं I  केवल वीर्य की रक्षा ही नहीं I दोनों अर्थों में ‘ब्रम्हचर्य’ महन हैं I कोई ब्रम्हचर्य-व्रत का पालन कर सके तो इससे बड़ी उपलब्धि और कोई हो ही नहीं सकती I तभी तो ब्रम्हचर्य को एक बड़ा तप माना गया हैं I संतानोत्पत्ति हेतु गृहस्त में रहते हुए, मौजमस्ती और भोग  की लालसा से, काम-वासना की  पूर्ति के लिए तो नहीं, मगर संतान की उत्पत्ति के लिए यदि पत्नी-संपर्क किया जाए I सहशयन व संभोग किया जाये तो यह भी ब्रम्हचर्य का पालन माना जाता हैं, क्योकि इसका उद्देश्य ठीक हैं I लक्ष्य अच्छा हैं इरादा नेक हैं I

ब्रम्ह की प्राप्ति

विवाह से पूर्व तथा वानप्रस्थ आश्रम में स्त्री-सहवास पूरी तरह मना हैं I इन दोनों आश्रमों में सम्भोग करना ब्रम्हचर्य व्रत को खंडित करना होता हैं I वासनाओ को पालना कामवासना की पूर्ति व संतुष्टि करना ब्रम्हचर्य का क्षय करना हैं I

        `कामवासना का दमन कर परमात्मा की राह पर चलने को ही ब्रम्चार्य कहते हैं I ब्रम्ह की प्राप्ति कर सकता हैं I

भगवान-ही-भगवान

 

1.   पुरुष अपने पक्के संकल्प के साथ चले और अपनी कामवसनाओ को जीतता हुआ ईश्वर में ध्यान लगाये तो उसे ब्रम्ह की प्राप्ति हो सकती हैं I उसे हर चीज में भगवान ही नाजर आए I यहाँ तक की  उसे स्त्री मात्र स्त्री अवास दिखाई  न दे I भगवान का रूप नजर आये I

2.   ऐसा न हो की से काम से पीड़ित बने रहे तथा ऊपर से ब्रम्हचर्य का ढोंग करते रहे I यह गलत होगा I इससे न तो ब्रम्चारी रह सकेंगे और न ही ब्रम्ह की प्राप्ति होगी I

3.   ऊर्ध्व भाग से गमन करना ही वीर्य की क्षय करना है I ऐसा व्यक्ति कामावासनाओ का दास बना रहता हैं I वह ब्रम्ह का कभी पा नहीं सकता I

ब्रम्हचर्य का पालन

ब्रम्हचर्य का पालन करने के लिए ऐसा हो –

1.   मनुष्य सात्विक आहार का सेवन करे I इसी पर निर्भर रहे I

2.   उसके विचार भी सात्विक हो I तभी लक्ष्य-पूर्ति I

3.   ब्रम्हचर्य का पालन करने के लिए काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि त्यागने पड़ते हैं तभी सफलता मिलती हैं I

4.   उसे स्त्री भोग की वस्तु नजर न आए बल्कि भगवन का ही रूप नजर आए I

5.   काम-वासना मन से मिटनी चाहिए, दिखावे से नहीं I

यह ब्रम्हचर्य नहीं

कुछ व्यक्ति ब्रम्हचारी रहना चाहते हैं मगर...जहां स्त्री देखी फिसल गए... फिर भी कोशिश में लगे रहते हैं I मन उनका कामपूर्ति चाहता हैं Iशारीर भी इसकी आवश्यकता समझता हैं I मगर नियंत्रण करना कठिन हो जाता हैं I ऐसा पूर्व में भी होता रहा I अब भी हो रहा हैं I कई बार व्यक्ति उत्तेजना से इतना दुखी हो जाता हैं कि लिंग तक की काट देता हैं I यदि वह ब्रम्हचारी होने के लिए लिंग काठ बैठता हैं तो वह बिलकुल भी ब्रम्हचर्य क पालन नहीं कर रहा I उसने अपने इन्द्रियों को दबाने के लिए ऐसा किया हैं I वह इन्द्रियों पर विजय नही पा सका I वह ब्रम्हचारी नहीं I

मन में वासना

मन ही सारे शारीर का सञ्चालन करता हैं I वासना की उत्पत्ति मन में न हो, तभी आपका तन, आपका लिंग आपके अधीन होंगे I यदि मन वश में नहीं, स्त्री-सहवास की इच्छा बनी रहती हैं, तब आपकी काया आपके वश में न होगी I आपका लिंग अपने आप उत्तेजित होकर पथभ्रष्ट होने पर विवश कर देगा I आप ब्रम्हचर्य व्रत से भटक जायेंगे I अतः आपका मन शुद्ध हो I इसमें वासना न समाये I न जागे I

ध्यान से

मन को वासनारहित रखने के लिए ध्यान की जरुरत हैं I जो ध्यान कर सकता है, वह मन को भी जीत सकता हैं I बस ध्यान ऐसा लगे कि जब स्त्री सामने आये तो वह भी भगवान का रूप दिखे I वासना की जड़ मन हैं I ध्यान से इसे जीते I यदि कोई व्यक्ति शारीर में कामवासना पूरी नहीं करता या इससे दूर रहता हैं परन्तु उसके मन में काम के विचार बने रहते हैं तो भी वह ब्रम्हचारी नहीं I

ब्रम्हचारी व्यक्ति

1.   सदा शांत बना रहता I

2.   काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार उसके पास नहीं फटकते I

3.   वह सदा रहता हैं I

4.   ब्रम्हचारी व्यक्ति  को रोग परेशान नहीं करते I वह सदा निरोगी बना रहता हैं I




स्वस्थ रहने के लिए कुछ बातें – अपनाये इन्हें !

 

स्वस्थ रहने के लिए कुछ बातें – अपनाये इन्हें !

ऐसा नहीं कि ये नई बातें हैं, जिन्हे आपके सामने रखा जा रहा हो इन्हे सब जानते तो हैं , मगर इनके महत्व को नहीं समझते I इनकी अनदेखी कर दिया करते है I तभी तो आज यह रोग तो कल वह रोग I कभी शरीर दुखी तो कभी मस्तिष्क कमजोर I घर के बड़े सदस्य भी इन सभी बातो को कहते समझाते रहे हैं, मगर इन पर गौर न करना हमारी गलती है I आइये, इन्हें एक नज़र देखे I क्या हमारे जीवन में, हमारी दिनचर्या में इनके लिए कोई स्थान हैं भी या नहीं I अपनी परीक्षा स्वयं लेते हुए ‘हा’ या ‘न’ के लिए इन्हें टिक करें अथवा कटते चलें I यदि कुल बातों का ६० प्रतिशत ‘हा’ में हो तो हम ठीक हैं I यदि ६०% से कम बातें हमारे जीवन में विद्यमान हैं, तो इस संख्या की बढ़ोतरी करना आवश्यक है I ऐसा समय आना चाहिए जब ये सारी बातें, सौ प्रतिशत हमारी दिनचर्या में उतरकर, स्थापित हो जाये I   

यदि ऐसा हो जाता हैं तो हमारा स्वास्थ्य उत्तम होगा I मस्तिष्क खूब काम करेगा I हम अपने जीवन में सफल होते जायेंगे I सफलता हमारे कदम चूमेगी I हमें अपना जीवन सार्थक लगेगा I हृदय में तथा आसपास ख़ुशी झूम उठेगी I अंग-अंग प्रफुल्लिल हो उठेगा I अजमाकर तो देखे I जो सुख लाखों रुपये खर्च करने से नहीं मिलता, वह इन बातो को गंभीरतापूर्वक अपना लेने से मिल सकता है, इसे पक्की बात जानें I

तो उठाइए कलम ‘टिक’ अथवा ‘क्रास’ के निशान लगते जाएँ I बने स्वयं ही अपने परीक्षक और करे अंको का जोड़ I देखते-ही-देखते परिणाम सामने आ जायेगा I ...तो करे शुरू !

1.   क्या आप सूर्य उदय होने से पूर्व बिस्तर त्याग देते हैं, या नहीं ?

2.   क्या आंख खुलते ही, एकदम आप बिस्तर छोड़ देते हैं या पहले ईश्वर का ध्यान कर इस नई सुबह देखने के लिए धन्यवाद करते है या नहीं ?

3.   क्या उठाते ही बेड-टी की मांग करते हैं या नहीं ?

4.   क्या उठकर पहले शौच, कुल्ला कर, दांत साफ करते हैं या नहीं ?

5.   क्या आप कोई नीम, कीकर, तिरमिरा आदि का दातुन करते हैं या सीधे ब्रश पर आ जाते हैं ?

6.   आप चाय पीते हैं या एक कप गाय का दूध ?  गाय का दूध पीना बेहतर है, चाय से I

7.   क्या आप प्रातः सैर के लिए जाते हैं या नहीं ?

8.   आप घर के आँगन में ही सैर करते हैं या लम्बी सिरे के लिए निकल पड़ते हैं I दूर की, बाहर की की सैर ज्यादा उत्तम है, आँगन में टहलने से I

9.   क्या आप पार्क, बाग़-बगीचे में जाकर व्यायाम, योगासन जैसा कुछ करते हैं या नहीं ?

10.  क्या आप सप्ताह में कम-से-कम एक बार मालिश करते हैं या नहीं ?

11.  क्या आप सामान्य रोशनी में पढ़ना-लिखना पसंद करते हैं,अथवा आँखों पर पड़ने वाली तेज़ रोशनी में ?

12.  क्या आप नाश्ता,भोजन शांत मन से बैठकर किया करते हैं, अथवा लड़ते, झगड़ते या बातें करते  ?

13.  क्या आप भोजन खूब चबा चबाकर करते है, या फटाफट, जैसे की आपको कही आग बुझाने का काम करना हो ?

14.  क्या आप भोजन के शुरू, मध्य तथा अंत में भी पानी नहीं पीते या भोजन के साथ-साथ पानी पीते रहते हैं ?

15.  क्या आप भोजन कर लेने के बाद अपने दांत अच्छी प्रकार साफ़ किया करते हैं या नहीं ?

16.  क्या आप सुबह-शाम के भोजन में कम-से-कम आठ-दस घंटों का अंतर रखते हैं या जब तब खाने बैठ जाते हैं ?

17.  क्या आप इन आठ-दस घंटों के अन्तराल के अन्दर हल्का सा नाश्ता, फल आदि ले लेते हैं या नहीं ?

18.  क्या आप अपनी आँखों में सुरमा,अंजन,काजल या कोई अच्छा आई-ड्राप डालकर आँखों की ज्योति तेज़ रखने का प्रयत्न करते हैं या नहीं ?

19.  क्या आप ईश्वर आराधना के लिए, ईश्वर स्मृति के लिए, ईश्वर द्वारा दिए उपहारों के लिए धन्यवाद-स्वरुप थोड़ी पूजा, प्रार्थना, धूप-बत्ती या ऐसा कुछ भी करते हैं या बिलकुल नहीं ?

20.  क्या आप बड़ों का सम्मान करते हैं या उनके लिए आपकी भाषा रूखी, आपत्तिजनक हुआ करती हैं ?

21.  क्या आप गुरुजनों का सम्मान करते हैं या उनका मजाक उड़ाते हैं ?

22.  क्या आप अपने स्कूल, कालेज, कार्यालय पर ठीक समय पर पहुन्चकर अनुशासन में समय बिताते हैं या आपको समय की पाबन्दी मानना अच्छा नही लगता I

23.  क्या आप मिलाने वालो भाद्रतापुर्बक व्यवहार करते हैं या नहीं ?

24.  क्या आप कुछ समय निकालकर कोई-न-कोई सामाजिक कार्य करते हैं या केवल अपनी मैजमस्ती में फालतू का समय बिता देते हैं ?

25.  क्या आपके सम्मुख जीवन का कोई लक्ष्य, कोई ध्येय है या हवा जहाँ ले जाएगी उधर ही चल-पड़ेंगे कटी पतंग की तरह ?

26.  क्या आप आशावादी है या हर समय निराशा में घिरे रहते हैं ?

27.  क्या आपका ईश्वर में विश्वास हैं या नहीं ?

28.  क्या आप सुपाच्य, हल्का, ताज़ा खाना खाते हैं या भरी, बसी भी ?

29.  क्या आप किसी भी रोग को जड़ से उखाड़ फेंकने  के लिए प्रयत्नशील होते हैं या लापरवाही में ?

30.  क्या आपका आहार संतुलित, पौष्टिक होता हैं या जो मिला सो खा लिया ?

31.  क्या आप प्राकृतिक उपचारों में विश्वास रखते हैं या एलोपैथी की दवा खाकर काम चला लेते हैं ?

32.  क्या आप मेहनत व ईमानदारी की कमी में विश्वास रखते है या लूट-खसूट  की रकम में ?

आशा हैं आप इन ३२ प्रश्नों की मार्किंग कर अच्छे अंक पा सकेंगे I कमी रह जाने पर गंभीरता से प्रयत्न करेंगे ताकि एक समय  आप १०० प्रतिशत  अंक पा सकें I


सोमवार, 24 मई 2021

अजीर्ण-वर्णन अजीर्ण का आयुर्वेदिक उपचार

 अजीर्ण-वर्णन

   साधारण लक्षण 


सभी तरह के अजीरणों में ग्लानि होती है, शरीर और पेट भारी रहते हैं, पेट में शूल-से चलते हैं, अपान वायु नहीं सरकती यानी हवा रुक जाती है, कभी दस्त-कब्ज हो जाता है तो कभी अजीर्ण या बदहजमी के दस्त होते हैं, खट्टी-खट्टी हकारें आती हैं, खाने के बाद कय होती हैं या जी मिचलाता है। बस यही अजीर्ण की सीधी पहचान है। 

वैद्यविनोद' में लिखा..

 हैग्लानिवम्धप्रवृत्तिवाँ सामान्याजीर्ण लक्षणम। 

शर में ग्लानि या मल का अवगेध अथवा दस्तो का ज्यादा होना-अजीर्ण के धरगमान्य' लक्षण हैं। | भोजन पचने का लक्षण प्यास और भूख का अथवा शरीर हलका मालूम होना-ये जीर्णाहर या भोजन पचने के लक्षण हैं। 

अजीर्ण की किसें अजीर्ण ६ तरह के होते हैं :आम अरजीर्ण, (२) विद अजीर्ण, (३) विष्टद्य अजीर्ण, (४ शेष अजीर्ण, (५) दिनपाकी अजीर्ण, (६) प्राकृत अजीर्ण। कौन अजीर्ण किस तर होता है ? 

(१) कफ के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है। (२) पित्त के प्रकोष से विदाधाजीर्ण होता है। (३) वायु के प्रकोष से विष्टभाजीर्ण होता है। (४) रसे के शेष रहने, यानी रक्तादि रूप में परिणत ने होने से रसशेषाजीर्ण होता है। (५) दिन भर में भोजन न पचने से दिनपाकी अजीर्ण होता है। (६) स्वाभाविक या प्राकृत अजीर्ण स्वभाव से नित्य होता है। . 

अजीर्ण के कारण

(१) दैहिक कारण 

(१) बहुत जल पीना, (२) भोजन के समय के बाद भोजन करना, (३) मलमूत्रादि वेगों को रोकना, (४) रात को जागना, (५) दिन में सोना, ये पाँच तो देह से सम्बन्ध रखने वाले कारण हैं। 

 (२) मानसिक कारण 

(१) ईर्ष्या, (२) भय, (३) क्रोध, (४) लोभ, (५) शोक, (६) दीनता, और (७) मत्सरता-ये अजीर्ण के मानसिक कारण हैं। उपरोक्त दैहिक और मानसिक कारणों से, भोजन के समय किया हुआ स्वभाव के अनुकूल भोजन भी नहीं पचता; अजीर्ण हो जाता है। 

अजीर्णों के लक्षण 

(१) आम अजीर्ण के लक्षण

 इस अजीर्ण के होने से पेट और शरीर में भारीपन होता है, जी मिचलता है, गालों और आँखों पर सूजन आ जाती है। खट्टा, मीठा प्रभृति जैसा भोजन किया जाता है, उसी तरह की डकारें आती हैं।

 (२) विदग्ध अजीर्ण के लक्षण 

इस अर्जीर्ण में भ्रम, प्यास, मूर्च्छा, पित्त के अनेक रोग, धुएँ के साथ खट्टी डकारें, पसीना और दाह-ये लक्षण होते हैं। 

(३) विष्टब्ध अजीर्ण के लक्षण - 

इस अजीर्ण में शूल, अफारा, अनेक प्रकार की बादी की पीड़ायें, मल और अधोवायु का रुकना, शरीर का जकड़ जाना, मोह और देह में दर्द-ये लक्षण होते हैं। का" नोट--याद रखो, पहला कफ से, दूसरा पित्त से और तीसरा विष्टब्धाजीर्ण वायु के कोप से होता है। 

(४) रस-शेष अजीर्ण के लक्षण « 

इस अजीर्ण में अन्न में अरुचि, हृदय में जड़ता और देह में भारीपन होता है।

 (५) दिनपाकी अजीर्ण के लक्षण 

इस अजीर्ण वाले को रात-दिन में भोजन पचता है और इसमें अफारा और हड़-फूड़न आदि कुछ नहीं होता। 

(६) प्राकृत अजीर्ण 

यह अजीर्ण नित्य ही रहता है, क्योंकि स्वाभाविक है; विकृतिजन्य नहीं है। इसके पचाने के लिए 'सुश्रुत” ने ये उपाय लिखे हैं-

(१) भोजन करके सौ कदम टहलना, (२) बाईं करवट सोना, (३) अपने दिल को भाने वाले पदार्थों को छूना, देखना, सुनना, सूँघना और चखना; जैसे मनोहर कामिनियों पर हाथ फेरना, रूपवती स्त्रियों को या अन्य सुन्दर चीजों को देखना, गाना सुनना, फूल और इत्र आदि सूँघना तथा स्वादिष्ट पदार्थ चखना। यह अजीर्ण इन उपायों से पच जाता है। इसके लिए दवा की जरूरत नहीं। 

अजीर्ण के उपद्रव 

मूर्छा-बेहोशी, आनतान बकना, वमन, मुँह से लार गिरना, ग्लानि, भ्रम और मरण-ये अजीर्ण के उपद्रव हैं। 

नोट-मरण का यह मतलब है, कि अजीर्ण बहुत बढ़ जाने से मनुष्य को मार भी डालता है। 

अजीर्ण का असल कारण क्‍या हैं ? 

जो अनाप-शनाप नाक तक दूस-ठूस कर खाते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ उनके अपने वश में नहीं हैं, जो पशुओं की तरह खाते हैं, उनको अनेक रोग पैदा करने वाला अजीर्ण' होता है। 

 अजीर्ण की साधारण चिकित्सा 

(१) आमाजीर्ण में वमन करा देने से लाभ होता है। (२) विदग्धाजीर्ण में लंघन या उपवास से लाभ होता है। (३) विष्टब्धाजीर्ण में पसीना कराने से लाभ होता है। (४) रस-शेषाजीर्ण में भोजन से पहले दिन में सोने से, लाभ होता है। . 

विशेष आयुर्वेदिक चिकित्सा 

आमाजीर्ण की चिकित्सा

 (१) सेंधानोन १ तोला और बच २ तोला ले कर पीस लो और गरम जल में मिला कर रोगी को पिला दो और कय कराओ। कय में दूषित पदार्थ निकल जायँंगे और रोग आराम हो जायगा। यह वमनकारक दवा रोगी को उस हालत में दो, जबकि आमाशय बहुत भारी मालूम होता हो।

नोट--अजीर्ण में सबसे पहले अजीर्ण पैदा करने वाले कारणों को त्याग दो। बिना कारण त्यागे, अजीर्ण कभी आराम न होगा। सभी अजीर्णों में उपवास करना सर्वोत्तम उपाय है। विशेष कर, आमाजीर्ण की पहली हालत में तो लंघन हितकारी है। परन्तु बालक, बूढ़े और दुर्बलों को उपवास कराना अच्छा नहीं। उनको, उनकी प्रकृति के अनुसार, हल्का और थोड़ा भोजन देना उचित है। अजीर्ण में क्या-क्या पथ्य और अपथ्य हैं, यह हमने आगे लिखा है। जो पथ्य हो उसके देने में हानि नहीं; पर विचार की सर्वत्र दरकार है। 

(२) धनिया और सोंठ का काढ़ा पीने से आमाजीर्ण शान्त होता है, शूल नष्ट होता है और मूत्राशय साफ होता है। 

(३) दिन में चार बार गर्म जल पीने से आमाजीर्ण में लाभ होता है। 

(४) सोंठ और सौंफ-दोनों को बराबर-बराबर ले कर, पीस-कूट-छान कर और मिश्री मिला कर, सेवन करने से आमाजीर्ण शान्त होता है। 

(५) सौंफ, पोदीना, गुलाब के फूल, तेजपात और बड़ी इलायबी-सबको तीन-तीन माशे ले कर, एक सेर जल में पका कर रख लो। उसी में से ज़रा-जरा-सा जल पीने से आमाजीर्ण नष्ट होता है। 

(६) हींग, सेंधानोन, सोंठ, कालीमिर्च और पीपल--इनको बराबर-बराबर ले कर, जल के साथ सिल पर पीस कर, लेप-सा बना लो और पेट पर बारम्बार इसी का लेप करो। इससे आमाजीर्ण की पीड़ा शान्त हो जायगी। 

(७) छोटी हरड़, सोंठ, नागकेसर और कालानोन-इनमें से प्रत्येक को चार-चार माशे ले कर, पाव-भर जल में पीस कर, जरा सी हींग डाल कर दिन में कई बार, जरा-जरा-सा पीने से आमाजीर्ण शान्त होता है। 

(८) बड़ी इलायची ३ माशे, दालचीनी ६ माशे, नागकेसर ९ माशे, काली-मिर्च १२ माशे, पीपल १५ माशे और सोंठ १८ माशे-इन सबको एकत्र कूट-पीस कर चूर्ण बना लो। इसको दिन में २-३ बार सेवन करने से आमाजीर्ण नष्ट हो जाता है। 

(९) सज्जीख़ार, जवाख़ार, कालानोन, साँभरनोन, सेंधानोन, कचियानोन, बिड़नोन, भुना सुहागा, आमलासार गन्धक, सोंठ, मिर्च, पीपलामूल, चीता, अजवायन और बायबिड़ंग-इन सब दवाओं को समान भाग ले कर, कूट-पीस लो और पीछे आक के पत्तों के रस में खरल करो। इसके बाद सेंहुड़ या थूहर का एक डण्डा पोला करके, उसमें खरल किये चूर्ण को भर दो और ऊपर से कपड़-मिट्टी चढ़ा दो। इसके बाद २५ उपलों की आग में उस कपड़-मिट्टी चढ़े डण्डे को रख कर पकाओ। जब आग ठण्डी हो जाय, निकाल लो। डण्डे के ऊपर की मिट्टी उतार कर, डण्डे में से दवा को निकाल लो। इस नमक के सेवन करने से आमाजीर्ण और हर प्रकार के अजीर्ण नष्ट होते हैं। मात्रा--४ रत्ती। अनुपान--माठा या दही का तोड़। 

(१०) शुद्ध मीठा विष १ भाग, सोंठ २ भाग, कालीमिर्च ३ भाग और पीली कौड़ी की भस्म ४ भाग-इन सबको कूट-पीस, खरल में डाल, जम्भीरी नीबू के रस में, उड़द के दाने-बराबर गोलियाँ बना लो। इनको सेवन करने से अजीर्ण नष्ट होता और तत्काल भूख लगती है।  मात्रा-२ या ३ गोली। अनुपान-ताजा जल। 

नोट-ये सब नुसखे परीक्षित हैं। 

विदग्धाजीर्ण की चिकित्सा 

(११) लिख चुके हैं कि विदग्धाजीर्ण में लंघन उपकारी है, पर बहुधा इसमें शीतल जल पीने से भी लाभ होता है। अत: दिन में कुछ न खा कर, केवल थोड़ा-थोड़ा शीतल जल पीना चाहिए। इस अजीर्ण में गुलकन्द-गुलाब प्रभृति से हल्का दस्त करा देना भी अच्छा है। लिखा है-


श्लैष्मिके वमनं पूर्व पैत्तिके मृदु रेचनम्‌। वातिके स्वेदन॑ चाथ यथावस्थं हित॑ च तत्‌॥ 

कफ से उत्पन्न मंदाग्नि या अजीर्ण में पहले वमन करानी चाहिए। पित्त से उत्पन अजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए और बादी से हुए अजीपर्ण में स्वेदन कर्म, बफारा या सेक वगैरः करना चाहिए अथवा जिस समय जैसी अवस्था हो और जो काम उस अवस्था में हितकारी हो, वही करना चाहिए। कहीं लघन से काम हो जाता है, क्रहीं शीवल जल के पीने से और कहीं हलके जुल्गब से। चिकित्सा करने में विचार्बुद्धि और तर्क से क्षण-क्षण॑ पर काम लेना चाहिए। किसी एक ही कायदे को प्रकड़ कर अन्धाधन्ध काम करने से हानि की सम्भावना रहती है।

(१२) सफेद जीरा ४ माशे, सफेद इलायची ४ माशे, सूखा अनारदाना ४ माशे, आल-बुखारा ४ माशे और मुनक्का (बीज निकाला) ४ माशे--इन सबकों एक जगह पीस कर और थोड़ा सेंधानोन मिला कर सेवन करने से पित्त की 'विदश्धाजीर्ण नष्ट होता है। 

(१३) धनिया ४ माशे, इलायची ४ माशे, गुलाब की केसर ४ माशे और सौंफ ४ माशे-सबको पीस कर, इनके वजन के बराबर मिश्री मिला लो। इस चूर्ण को शीतल जल के साथ सेवन करने से पित्त का 'विदग्धाजीर्ण” आराम होता है। 

(१४) छोटी हरड़ का चूर्ण १ माशे, दाख २ माशे, मिश्री ४ माशे और शहद ६ माशे-इन सबको पीस कर और शहद में मिला कर चाटने से पित्त का विदग्धाजीर्ण नष्ट होता है। 

(९५) सोंठ ५ माशे, जीरा ४ माशे, छोटी इलायची ३ माशे, कालीमिर्च २ माशे, पीपल १ माशे और शुद्ध आमलासार-गन्धक ९ माशे-सबको एक जगह मिला कर पीस लो और फिर खरल में डाल कर नीबू का रस दे-दे कर चार-चार रत्ती की गोलियाँ बना लो। एक-एक गोली सुबह-शाम या दिन में ३-४ बार खाने से विदग्धाजीर्ण” और सब तरह के अजीर्ण नष्ट हो जाते हैं। 

(६) बड़ी इलायची का चूर्ण और मिश्री मिला कर तीन-तीन माशे की _ मात्रा से सेवन करने से पित्त का अजीर्ण नष्ट होता है। 

(९७) पोदीना ४ माशे, अम्लवेत ४ .माशे, छोटी इलायची ४ माशे, दाल-चीनी ३ माशे और तालीसपत्र ३ माशे-इन सबको एकत्र कूट-पीस लो और चूर्ण के बराबर मिश्री मिला दो। इस चूर्ण का सेवन करने से पित्त का विदग्धाजीर्ण! नष्ट होता है। 

(१८) नीबू, नारंगी और अनार प्रभूति फलों का सेवन करने से भी विटग्धाजीर्ण नष्ट हो जाता है। 

 मन्दाग्नि और अजीर्ण में पथ्य 

 कफ से उत्पन्न मन्दाग्नि और अजीर्ण-आमाजीर्ण में, नमक मिले गरम जल से वमन करानी चाहिए। पित्त से उत्पन्न विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए और वातज अजीर्ण-विष्टब्ध-अजीर्ण-में स्वेदकर्म-बफूरे प्रभृति से काम लेना चाहिए। अथवा समय पर जैसी जरूरत हो, विचार कर काम करना चाहिए। अजीर्ण की पहली अवस्था में उपवास करना सबसे अच्छा उपाय है। 

 नोट-जहाँ तक हो, जुलाब न देना ही अच्छा है। हाँ, एक दस्त साफ करा देना बुरा नहीं। अजीर्ण में नीचे लिखे आहार और विहार पथ्य या हितकारी हैं:-कसरत, कुश्ती, मिहनत, हल्के और अग्नि प्रदीप्त करने वाले भोजन, बहुत पुराने महीन लाल चावल, यवागू, लाजामंड-खीलों का माँड, मूँग का रस, मदिरा, शाली चावल, बथुआ, छोटी मूली, लहसन, पुराना पेठा, नवीन केले की फली, सहँजना, करेला, परवल, बैंगन, ककोड़ा, ख़स का सुगन्धित जल, आमला, नारंगी, अनार, पापड़, अम्लवेत, जंभीरी नीबू, बिजौरा नीबू, शहद, माठा, काँजी, हींग, नमक, सोंठ, अजवायन, मिर्च, मेथी, धनिया, जीरा, पान, गर्म जल (विदग्धाजीर्ण में शीतल जल), कड़वे और चरपरे रस, बारली, अरारूट और साबूदाना प्रभृति हल्के पदार्थ। मोंठ की दाल में पिसी हुई सोंठ और भुनी हुई हींग डाल कर खाने से पेट का दर्द और अफारा मिटता है। 

भुनी हुई मोंठ नमक-मिर्च लगा कर खाने से शीघ्र ही पच जाती और रुचि बढ़ाती है। 

पहली अवस्था में उपवास करने से, जब अजीर्ण के दोष शान्त हों,रोगी को . साबूदाना, बारली या अरारूट पका कर दो। जब अग्नि बढ़े, सवेरे के भोजन में पुराने चावल का भात, परवल का साग, कच्चे केले की तरकारी, मसूर की दाल, माठा, कागजी नीबू और अदरख के टुकड़े नमक लगा कर दो। शाम के भोजन या ब्यालू में, यदि भूख लगी हो, तो साबूदाना या बारली अथवा और कोई हल्का खाना दो। अगर खूब भूख लगने लगी हो और अजीर्ण न हो, तो आटे में 'अजवायन और नमक' डाल कर पतली-पतली पूरियाँ बना दो और साग तोरई या परवल का दो। रोगी से कह दो; कि भोजन में लोटे-के-लोटे जल न चढ़ा जाये बल्कि उतना ही जल पिये, जितने से गले का ग्रास उतर जाय। वह भी उस दशा में, जब पानी बिना रहे ही नहीं। इस रोग में जितना ही थोड़ा जल पिया जाय, उतना ही अच्छा। हो सके तो खाना खाने के घण्टे-दो-घण्टे या तीन घण्टे बाद थोड़ा-थोड़ा जल पिया जाय। सवेरे, तारों की छाया में, पेट-भर शीतऊू जल पीना अच्छा है। 

राजमण्ड 

चावलों के गरम माँड में' हींग और संचरनोन मिला कर पिलाने से विषम 

और मन्द अग्नि पूर्ण रूप से बढ़ती है। 

८-८ तोले मूँग या चावलों को ३२ तोले जल में पकाओ। जब यह पक जाय, माँड को पसा लो और उसे गाय के घी में भून लो। इसके बाद उसमें भुनी हींग, सेंधा नोन, सोंठ, मिर्च, पीपर और धनिया-इन सब का एक माशा चूर्ण मिला दो और खूब स्वच्छ चमकदार चाँदी या काँच के बर्तन में रख कर, एक चतुरा विलासिनी कामिनी के हाथ में दे कर रोगी के पास भेज दो। वह स्थान निर्जल, निर्वात और निर्जन हो; यानी वहाँ न तो कोई आदमी हो, न बाहरी हवा आती हो और न जल हो। वह स्त्री रोगी के पास जा कर, मधुर-मधुर कटाक्ष करती हुई, रोगी को उस अमृत-तुल्य माँड के बर्तन को प्रेम से दिखाये। अगर इस तरह राजमण्ड पिया जाय, तो वह अग्नि दीप्त करके तीनों दोषों को हरेगा। कहा है :-

किचित्कटाक्षं सा दत्वा सुंधातुल्य॑ प्रकाशयेत्‌। ततः पिवेद्राजमण्ड दोषत्रयविनाशनम्‌।। 


मन्दाग्नि और अजीर्ण में अपथ्य

मन्दाग्नि और अजीर्ण में नीचे लिखे हुए पदार्थ या आहार-विहार अपथ्य या हानिकारक हैं :-। 


जुलाब लेना (पित्त के विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब बुरा नहीं), मल, मूत्र और अधोवायु के वेगों को रोकना, भोजन-पर-भोजन करना, यानी बिना एक भोजन पचे टूसरा भोजन करना, रात में जागना, मैथुन करना, तेल लगाना, स्नान करना, कभी कम और कभी अधिक खाना, कभी किसी समय और कभी किसी समय भोजन करना और खून निकालना। 

दाल के अनन-मूँग, मोंठ, उड़द, चना वगैर:, मछली, मांस, बहुत जल पीना, पोई का साग, लालमिर्च, पिट्ठी के पदार्थ, घी में पके पदार्थ, तत्काल ब्याई गाय का दूध, विकृत दूध, या घी में पके हुए चावल, दूध, खोया, इमली आदि का पना या और पतले पदार्थ, ईख-रस, ताड़-फल की मींगी, नारियल, धनिया, नेत्रबाला, - ख़राब या गन्दा पानी, अपनी प्रकृति के विरुद्ध अन्न और जल, भारी और देर में हजम होने वाले पदार्थ, भूने-सेके पदार्थ, दाख-मुनक्का या अन्य दस्तावर पदार्थ। 

उड़द मन्दाग्नि रोग में महा अपथ्य हैं; क्योंकि यह पहले दर्जे के गरिष्ट हैं। उड़द की पिट्ठी के लड्डू ताकतवर होते हैं, पर मन्दाग्नि वाले के लिए हानिकारक हैं। ज्वर, वात-प्रकृति वाले और मन्दाग्नि वाले को उड़द नुकसानमन्द और अफारा करने वाली है। 


आगर् आपका कोई प्रश्न् है तो आप हमें कमेंट या ईमेल कर सकते है

धन्यवाद Gk Ayurved





रविवार, 23 मई 2021

हिचकी-रोग का वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 हिचकी-रोग का वर्णन

निदान-कारण 

दाहकारक--छाती और कण्ठ में जलन करने वाले, भारी, अफारा करने वाले, रूखे और अभिष्यन्दी पदार्थ खाने, शीतल जल पीने, शीतल अन्न खाने, शीतल जल में नहाने, धूल और धुआओँ के मुँह और नाक में जाने, गरमी और हवा में घूमने-फिरने,कसरत-कुश्ती करने, बोझ उठाने, बहुत राह चलने, मलमूत्रादि के वेग रोकने और उपवास-ब्रत करने से मनुष्यों को हिचकी, श्वास और खाँसी रोग होते हैं। 


नोट--.सुश्रुत में लिखा है.. कि आम-दोष, छाती वगैर: में चोट लगने, क्षय रोग की पीड़ा, विषम भोजन करने, भोजन-पर-भोजन करने वगैर: से हिचकी, श्वास और खाँसी की उत्पत्ति होती है। 

सामान्य लक्षण 

'प्राण और उदान जायु' कुपित हो कर, बआरम्बार ऊपर की तरफ जाती है। इससे हैक हिक शब्द के साथ वायु निकलती रहती है। 

हिचकी के भेद '

वायु' कफ से मिल कर पाँच तरह की हिचकियाँ पैदा करती है-(१) अन्नजा, (२) यमला, (३) क्षुद्रा, (४) गम्भीरा, (५) महती।

 पूर्वरूप 

हिचकी रोग होने से पहले कण्ठ और हृदय भारी रहते हैं, बादी से मुँह का स्वाद कसैला रहता है, कोख में अफार रहता या पेट में गुड़गुड़ शब्द होता है। 

अन्नजा हिचकी के लक्षण

 अनाप-शनाप खाने-पीने से 'वायु” अकस्मात कुपित हो कर ऊपर की तरफ जा कर अन्नजा नाम की हिचकी पैदा करती है। 

नोट--जल्दी-जल्दी बहुत ही ज़्यादा खाने-पीने से, आमाशय की वायु हठातू 

कूपित हो जाती है और ऊपर की राह से निकलती है। उसके निकलने से हिगू-हिग्‌ आवाज होती है, उसे ही 'हिचकी' कहते हैं। चूँकि यह हिंचकी अन्न के ज़्यादा खाने से होती है, अतः इसे अन्नजा यानी अन्न से पैदा हुई हिचकी कहते हैं। इस हिचकी की दवा-दारु नहीं करनी पड़॒ती। यह चन्द मिनट में आप ही शान्त हो जाती है। 

यमला हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी सिर और गर्दन को कॉँपाती हुई दो-दो बार निकलती है अथवा रुक-रुक कर दो-दो हिचकियाँ आती हैं और उनके आने से सिर और गर्दन काँपते हैं, उन्हें 'यमला' कहते हैं। शक्षः नोट--यमला शब्द का अर्थ दो है, इसी से इसे 'यमला' कहते हैं, क्योंकि एक बार में दो-दो हिचकियाँ आती हैं। यमला हिचकी कष्टसाध्य होती है, पर कभी-कभी असाध्य भी हो जाती है। इसके साथ प्रदाह्, दाह, प्यास और मूर्च्छा का होना घातक है।

क्षुद्रा हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी कंठ और हृदय के समन्धि-स्थान से पैदा होती तथा मन्दे वेग और देर से निकलती है ठसे ' धुद्रा' कहते हैं। 

नोट--्रुद्रा हिचकी देर-देर में और धीरे-धीरे ठठती है। यह सुखमाध्य होती है। कहते हैं, यह जत्रु-मूल अर्थात्‌ काँख और हृदय की सन्धि से उठती है। 

गंभीरा हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी नाभि के पास से उठती है, घोर गंभीर शब्द करती है और जिस के साथ प्यास, श्वास, पसली का दर्द और ज्वर आदि नाना ठपद्रव होते हैं, ठसे 'गंभीरा' कहते हैं। 

नोट--यह हिचकी रोगों के अन्त में प्राय: उपद्रव-रूप से होती है। बहुत करके अन्तिम काल में पैदा होती और मनुष्य को मार डालती है। यह असाध्य समझी जाती है। 

महती हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी वस्ति--पेडू, हदय और मस्तक आदि प्रधान मर्म-स्थानों में पीड़ा करती हुई, शरीर के सब अंगों को कँपाती हुई, लगातार चलती रहती है, उसे “महती” या “महाहिक्का' कहते हैं। 

नोट--इस हिचकी में पेडू, हदय और मस्तक आदि मर्म फटते-से जान पड़ते हैं और हिचकी का तार नहीं टूटता। यह हिचकी भी प्राय: रोग के उपद्रव के तौर पर, अन्तकाल में पैदा होती और मनुष्य को मार डालती है। 

असाध्य लक्षण 

गम्भीरा और महाहिक्का पैदा होने से रोगी की मृत्यु में सन्‍्देह करना वृथा है, यानी अवश्य मृत्यु होती है। इसके सिवा और हिचकियों में भी रोगी का शरीर फैल जाय, तन जाय, नजुर ऊपर की तरफ ज़्यादा रहे, नेत्र खड्डों में घुस जाये, देह क्षीण हो जाय और खाँसी चलती हो, तो रोगी के बचने की उम्मीद नहीं। जिस हिचकी में रोगी की देह तन जाय, दृष्टि ऊँची हो जाय, मोह या बेहोशी हो, रोगी क्षीण हो जाय, भोजन से अरुचि हो और छोंक ज़्यादा आयें, उस हिचकी वाला रोगी आरोग्य लाभ नहीं करता। जिस रोगी के वातादि दोष अत्यन्त सज्चित हों, जिसका अन्न छूट गया हो, जो दुबला हो गया हो, जिसकी देह नाना प्रकार की व्याधियों से क्षीण हो रही हो, जो बूढ़ा हो और जो बहुत ही ज़्यादा मैथुन करने वाला हो--ऐसे आदमी के कोई एक हिचकी पैदा हो कर प्राणनाश करती है। अगर यमला हिचकी के साथ प्रलाप, दाह, प्यास और बेहोशी हो, तो यह भी प्राण नष्ट करती है। जिस रोगी का बल क्षण न हो कर मन प्रसन्न हो, जिसकी धातुएँ स्थिर हों और इन्द्रियों में भरपूर ताकत हो--वह यमला हिचकी वाला आराम हो सकता है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों-वाला आराम हो नहीं सकता। 

हिचकी की भयंकरता 

यों तो हैजा और सन्निपात ज्वर आदि अनेक रोग-प्राण नाशक हैं, पर श्वास और हिचकी-रोग जैसी जल्दी मनुष्य के प्राण नाश करते हैं, वैसी जल्दी और रोग प्राण-संहार नहीं करते। अतः हिचकी और श्वास में गफ़लत हरगिजु न करनी चाहिये। 

हिचकी-चिकित्सा में याद रखने योग्य बातें 

(१) जो औषधि या अन्न-पान “कफ और वायु' को हरने वाले, गरम और वायु को अनुलोमन करने वाले हों--वे सब श्वास और हिचकी में हित हैं। 


(२) हिचकी और श्वास-रोगी के शरीर में पहले तेल की मालिश करनी चाहिये। इसके बाद स्वेदन-क्रिया यानी पसीने को निकालने के उपाय करने चाहिये तथा वमन ओर विरेचन कराना चाहिये। लेकिन अगर हिचकी और श्वास-रोगी कमज़ोर हों, तो वमन-विरेचन न करा कर रोग-नाशक औषधि दे देनी चाहिये। 

सुश्रुत में लिखा है -

विरेचनं पथ्यतमं ससैन्धवं, घृतं सुखोष्णं च सितोपलायुतम। 

हिचकी रोग में सैंधानोन मिला हुआ विरेचन या जुलाब अत्यन्त पथ्य है। निवाया घी मिश्री मिला कर पीना भी हितकारी है। 

और भी कहा है -

सर्पि; कोर्ष्ण क्षीरमिक्षो रसो वा, नातिक्षीणे रत्रंसनं छर्दनं ज। 

हिचकी रोग में निवाया घी या ईख का रस हितकारक है। अगर हिचकौ-रोगी अठि क्षीण या कमजोर न हो, तो उसे दस्त और क॒य कराने चाहियें; यानी बलवान रोगी को वमन-विरेचन कराने चाहिये, कमजोर को नहीं। 

हिचकी में पथ्यापथ्य 

पथ्य 

पसीना देना, कय कराना, नस्य देना, धुआँ पिलाना, जुलाब देना, दिन में सुलाना, शीतल पानी के छींटे मारना, एकाएक डराना-धमकाना, भुलाना, गुस्सा दिलाना और खुश करने वाली बात कहना, प्राणायाम कराना, जली हुई गरम मिट्टी सूँघधाना, कुशा की कूँची या धारा से जल छोड़ना, नाभि के ऊपर दबाना, चिराग पर जलाई हुई हल्दी की गाँठ से दागना, पैरों से ऊपर दो अंगुल पर अथवा नाभि से ऊपर दो अंगुल पर दाग देना--ये सब काम हिचकी रोगी को पथ्य या हितकर हैं। 

पुरानी कुलथी, पुराने गेहूँ, पुराने साँठी चावल, जौ, पका कैथा, लहसन, परवल, नरम मूली, पोहकरमूल, काली तुलसी, शराब, खस का जल, गरम जल, बिजौरा नीबू, शहद, गोमूत्र तथा और सब वात-कफ्‌-नाशक अन्न-पान हिचकी वाले को पथ्य हैं। 

👉👉इसे भी पढ़े उबटन लगाना आयुर्वेद मे वर्णन

बहुत कर के जिन आहार-विहारों से वायु का अनुमोल हो, वायु का नाश हो वे अथवा उष्णवीर्य क्रियाएँ हिचकी और श्वास में पथ्य हैं। हिचकी रोग में पेट पर और श्वास रोग में छाती पर तेल मल कर पसीना निकालना और कय कराना पथ्य है, परन्तु कमज़ोर रोगी को वमन कराना नुकसानमन्द है। अगर वायु का उपद्रव ज़्यादा हो, तो इमली का भिगोया पानी पीना, नीबू निचोड़ कर मिश्री का शर्बत पीना और नदी या तालाब में स्नान करना पथ्य है, पर अगर कफ बढ़ा हुआ हो, तो ये सब हानिकारक है। इसलिये दोष का विचार करके ये पदार्थ देने चाहियें। 

हिचकी और श्वास वाले को रात को बहुत ही हल्का भोजन देना चाहिये। हिचकी वाले को गरम घी मिला हुआ पुराना चावलों का गरमागर्म भात बहुत ही उपकारी है। अनेक बार ऐसे भात से ही हिचकी नष्ट हो जाते देखी है। 

अपथ्य 

अधोवायु, मल-मूत्र, डकार और खाँसी आदि के वेग रोकना, धूल में रहना, धूप में बैठना या घूमना, मेहनत करना, हवा में रहना, विलम्ब या देर में हजम होने वाले पदार्थ खाना, दाहकारी या जलन करने वाली चीजें खाना, चौला, उड़द, पिट्ठी के पदार्थ, तिल के पदार्थ खाना, भेड़ का दूध पीना, अनूप देश या बहुत पानी वाले देशों के पशु पक्षियों का मांस खाना, दाँतुन करना, गुदा में पिचकारी लगाना, मछली, सरसों, खटाई, तुम्बी का फल, कन्दों के साग, तेल में छौंका हुआ चौलाई का साग, भारी और शीतल खाने-पीने के पदार्थ हिचकी रोग में अपथ्य या हानिकारक हैं। भारी ओर देर में पचने वाले पदार्थ खाना, ज़्यादा खाना, रात मेंजागना,चिन्ता-फिक्र या क्रोध करना, रंज करना, लाल मिर्च, अमचूर और दही आदि भी अपथ्य हैं। 


 हिचकी-नाशक आयुर्वेदिक नुसखे


(१) बिजौरे नीबू के २ तोले रस में ६ माशे शहद और ३ माशे कालानोन मिला कर पीने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(२) मुँगा-भस्म, शंख-भस्म, हरड, बहेड़ा, आमला, पीपर और गेरू-.इन दवाओं का चूर्ण, ना-बराबर घी और शहद में मिला कर चाटने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(३) रेणुका और पीपर के काढ़े में 'हींग' डाल कर पीने से हिचकी निस्सन्देह शान्त हो जाती है। धन्वन्तरि का वचन हे। 

(४) एक पाव बकरी के दूध में दो तोले सोंठ और एक सेर पानी डाल कर औटाने और दूध मात्र रहने पर छान कर पीने से हिचकी नष्ट हो जाती हेै। परीक्षित हे। 

नोट... सुश्रुत' में लिखा हे, यह दूध 'मिश्री' मिला कर खूब पेट भर कर पीना चाहिये। 

(५) सैंधानोन और खीलों का सत्तू मिला कर खाने और ऊपर से खट्टा रस पीने से हिचको नष्ट हो जाती है। 

(६) सोंठ, पीपर और आमले का चूर्ण शहद में मिला कर चाटने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(७) काँस की जड़ का चूर्ण शहद में मिला कर चाटने से भयंकर हिचकी नष्ट हो जाती हे।



आगर् आपका कोई प्रश्न् है तो आप हमें कमेंट या ईमेल कर सकते है

धन्यवाद Gk Ayurved