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सोमवार, 17 मई 2021

उदर-पेट रोग-वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

पेट उदर-रोग-वर्णन  उदर-रोगों के निदान-कारण


सब तरह के रोग मदाग्नि से होते बहुत् हि होते हैं; मंदाग्नि से अजिणन पदार्थो के खाने पीने  से, दोषों और मलों के बढ़ने या कोष्ठबद्धता--दस्त की कब्ज़ियत से उदर-रोग--पेट के रोग होते हैं। सभी रोगों का जन्म मंदाग्नि से होता है; यानी अग्नि के we रहने से अनेकानेक रोग होते हैं। इनमें भी पेट के रोग तो मन्दाग्नमि से बहुत ही ज्यादा होते हैं। मंदाग्नि के सिवा, पेट के रोग अजीर्ण से, अत्यन्त हानिकारक खानेपीने के पदार्थों से और पेट में मल के जमा हो जाने से भी होते हैं। अत: आरोग्यता चाहने वाले मनुष्य को ऐसे उपाय करते रहना चाहिये, जिनसे अग्नि कभी भी मंद न हो, अजीर्ण न हो और दस्त की कब्ज्ञियत न हो। 


उदर-रोग की सम्प्राप्ति संचित हुए दोब--पसीना और जल को बहाने वाली नाड़ियों को रोक कर तथा जटराग्रि, प्राणवायु और अपान वायु को बिगाड़ कर, उदर-रोग--पेट के रोग पैदा करते हैं। 


खुलासा--जमा हुए वातादि दोष, पसीना और जल बहाने वाले स्रोतों को रोक देते हैं और जठराग्रि, प्राणवायु तथा अपान वायु को दूषित कर देते हैं। स्रोतों के रुकने तथा जठराग्रि, प्राणवायु और अपान वायु के दूषित होने से पेट में रोग हो जाते हैं। असल बात यह है कि पहले अग्नि मंद होती है; मंदाग्नि होने की वजह से अजीर्ण हो जाता है; अजीर्ण की वजह से शरीर में मल इकट्ठा हो जाता है; मल का संचय  होने से दोष कुपित होकर, जठराग्नि को सर्वथा नष्ट करके, उदर-रोग करते हैं। 


 उदर-रोगों के सामान्य रूप

 नीचे लिखे हुए लक्षण सब तरह के उदर-रोगों--पेट के रोगों में देखे जाते है।


(१) अफारा, (२) चलने में अशक्तता, (३) कमज़ोरी, (४) अग्नि का मन्दापन, (५) सूजन, (६) अंगों में ग्लानि, (७) अपान वायु का न खुलना, (८) मल का रुकना, (९) दाह या जलन होना,


नोट--अफारा, आलस्य, अशक्ति, अंगसाद, मल-रोध, प्यास और दाह-ये सब उदर-रोगों के पूर्वरूप हैं। यानी उदर-रोग होने से पहले ये होते हैं। | उदर-रोगों की संख्या उदर-रोग आठ तरह के होते हैं--(१५) वात से--बातोदर। (२) पित्त से-पित्तोदर। (३) कफ से--कफोदर। (४) सप्निपात से--सप्निपातोदर। (५) प्लीहा से-प्लीहोदर। (६) गुदा के अवरोध से-बद्धगुदोदर। (७) क्षत से--क्षतोदर। (८) पेट में पानी भर जाने से--जलोदर। 


[१] वातोदर के लक्षण--वातोदर रोग में ये लक्षण देखे जाते है।

(१) हाथ, पैर, नाभि और कोख में सृजन होती है। (२) कोख, पसली, पेट, कमर, 

पीठ और सन्धियों में दर्द होता है। (३) सूखी खाँसी चलती है। (४) शरीर टूटता 

है। (५) नाभि से नीचे के शरीर का आधा भाग भारी जान पड़ता है। (६) मलरोध 

होता है; यानी दस्त नहीं होता। (७) चमड़ा, आँख और पेशाब कौर: का रंग लाल होता है। (८) अकस्मात उदर की सूजन घट या बढ़ जाती है। (९) पेट में सूई 

चुभाने की-सी पीड़ा होती है। (१०) काले रंग की सूक्ष्म aa पेट पर छा जाती हैं। 

(११) पेट पर उँगली मारने से फूली मशक की-सी आवाज़ होती है। (१२) दर्द और आवाज़ करती हुई हवा इधर-उधर घूमती है। 

नोट---संक्षेप में, वातोदर रोग होने से हाथ, पैर और नाभि पर सूजन, अंग टूटना, अरुचि और जड़ता--ये लक्षण होते हैं। 


[२) पित्तोदर के लक्षण--पित्तोदर होने से ये लक्षण देखे जाते हैं-(१) ज्वर होता है। (२) मूर्च्छा होती है। (३) दाह या जलन होती है। (४) प्यास लगती है। (५) मुँह का स्वाद कड़वा रहता है। (६) भ्रम होता है। (७) अतिसार या दस्तों का रोग होता है। (८) चमड़ा और आँख का रंग पीला हो जाता है। (९) पेट का रंग हरा हो जाता है। (१०) पेट पर पीली या ताम्बे के रंग की नसें छायी रहती हैं। (११) पेट पर पसीने आते हैं, गरमी से उसमें दाह होता है; भीतर गरमी और बाहर दाह होता है। (१२) आँतों से धुआँ-सा निकलता जान पड़ता है। (१३) छूने से पेट नर्म जान पड़ता है, उसमें पीड़ा होती है। (१४) पित्तोदर जल्दी पक कर जलोदर हो जाता है। 


> नोट--संक्षेप में, पित्तोदर होने से दाह, मद, अतिसार, भ्रम, ज्वर, प्यास और मुख में कड़वापन--ये लक्षण होते हैं। 


[३ ] कफोदर के लक्षण--कफोदर रोग होने से ये लक्षण देखे जाते F(१) शरीर में शिथिलता, (२) शून्यता-स्पर्शज्ञान का अभाव, (३) सूजन, (४) भारीपन, (५) नींद बहुत आना, (६) क्रय होने की इच्छा, (७) अरुचि, (८) श्वास, (९) खाँसी, (१०) चमड़े और नेत्र बगैर का रंग सफेद होना, (११) पेट भोगा-सा, चिकना, सफ़ेद, नसों से व्याप्त, मोटा, कठोर, छूने में शीतल, भारी, अचल और बहुत देर में बढ़ने वाला होता है; यानी कफोदर बहुत देर में बढ़ता है। 


 नोट--संक्षेप में, कफोदर होने से भारीपन, अंगसाद, श्वास, अरुचि, खाँसी, पीनस और सूजन--ये लक्षण होते हैं। 


[४ ] सन्निपातोदर या eater के लक्षण--जिन मनुष्यों को दुष्टा feral वश में करने के लिए नाखून, बाल, मूत्र, मल या ada (रजोधर्म का खून) मिला कर खाने-पीने के पदार्थों में खिला-देती हैं, जिनको दुश्मन ज़हर खिला देते हैं, जो दूषित जल पीते हैं, अथवा जो दूषी विष सेवन करते हैं, उनके रक्त और वातादि तीनों दोष कुपित हो कर अत्यन्त भयानक सन्निपातोदर या दृष्योदर रोग पैदा करते हैं। 


यह उदर रोग शीतकाल में, शीतल हवा चलने के समय, अधिक बादल घिरने के दिन या वर्षा की झड़ी लगने के समय विशेष करके कुपित होता है; क्योंकि इन - समयों में दूषित विष का प्रकोप होता है। मतलब यह है कि ऐसे समयों में यह रोग बढ़ जाता है और दाह होने लगता है। 


इस उदर रोगी के शरीर में दाह होता है। वह निरन्तर बेहोश रहता या बार-बार बेहोश होता है। उसके शरीर का रंग पीला हो जाता है, देह हो जाती है और प्यास के मारे गला सूखा करता है। इस सन्निपातोदर या त्रिदोषज उदर-रोग को ‘ganar’ भी कहते हैं। | 


नोट--परस्पर दूषित हुए दोष भी दृष्य कहाते हैं। इसलिए दृष्य द्वारा हुए उदर-रोग को “दृष्योदर' कहते हैं। खुलासा यह है कि दुष्ट जल--सिवार, ae, पत्तों से खराब हुआ पानी पीने से, दूषी विष के सेवन से, मल-मूत्र रोकने से तथा विष खाने से दुष्ट हुए वातादि रोग सन्निपातोदर रोग करते हैं। 


(५ ] प्लीहोदर के लक्षण--दाहकारक और अभिष्यन्दी अथवा कफ कारक और अम्लपाकी पदार्थ खाने-पीने से रुधिर और कफ अत्यन्त दूषित हो कर, पेट के बाईं तरफ, प्लीहा को बढ़ा कर अत्यन्त वेदना उत्पन्न करते हैं। इसी को '“प्लीहोदर' कहते हैं। 


प्लीहा या यकृत के बढ़ते रहने से जब पेट बहुत बढ़ जाता है, तब सारे शरीर में अवसन्नता,मन्दाग्रि, बलक्षीणता, देह की पाण्डुवर्णत और कफपित्तजनिं अन्यान्य उपद्रव भी होते हैं। इस समय इन रोगों को 'प्लीहोदर या यकृदुदर' कहते हैं। ' घ्लीहोदर होने से पेट का बायाँ भाग बढ़ता है और यकृदुदर होने से पेट का दाहिनं भाग बढ़ता है, क्योंकि प्लीहा पेट के बायें भाग में और यकृत दाहिने भाग में है। 


(5 ) कफ की अधिकता होने से दर्द नहीं होता। शरीर का रंग सफेद होता है, प्लीहा अत्यन्त कठिन, मोटी, बहुत भारी और wea होती है, अथवा शरीर भारी रहता है, अरुचि होती और पेट बड़ा aan रहता है। वायु का प्रकोप Tera रहने से सदा दस्त की क़क्ज्ियत, उदावर्त, आनाह और पेट में ज़ोर का दर्द रहता है। पित्त का कोप अधिक होने से say, प्यास, अधिक पसीने आना, तीव्र बेदना, दाह, मोह और शरीर का रंग पीला--बये लक्षण होते हैं। रुधिर का कोप अधिक होने से ग्लानि, दाह, मोह, शरीर का रंग बदल जाना, शरीर में भारीपन, sete, भ्रम और मूर्च्छा-ये लक्षण होते हैं। जिसमें तीनों दोषों के लक्षण होते हैं, उसे त्रिदोषज प्लीहा रोग कहते हैं। यह असाध्य होता है। 


> नोट--ये लक्षण यकृदुदर और प्लीहोदर दोनों में ही पाये जाते हैं। फर्क इतना ही है कि अगर दाईं तरफ रोग होता है तो यकृदुदर और बाईं तरफ होता है, तो प्लीहोदर कहते हैं। 


[६ ] बद्धगुदोदर के लक्षण--जब मनुष्य की aid अन्न, शाक तथा कमलकन्द आदि चिपटने वाले पदार्थों से अथवा रेत-कंकरी या बालू आदि से अत्यन्त ढक जाती हैं, उस समय वातादि दोषों से नित्य थोड़ा-थोड़ा मल आँतों में उसी तरह जमता जाता है, जिस तरह बुहारी देते समय थोड़ा कूड़ा-कर्कट रह जाता है। ऐसा होने से जमा हुआ मल, गुदा की राह को रोक कर, थोड़ा-थोड़ा मल बड़ी कठिनता से बाहर निकलने देता है। इससे हृदय और नाभि के बीच में पेट बढ़ जाता है। इसको ‘ager’ कहते हैं। । 


खुलासा--इस रोग के होने से बड़ी तकलीफ़ के साथ थोड़ा-थोड़ा मल निकलता है नाभि के बीच में पेट बढ़ जाता है। 


[७] क्षतोदर के लक्षण--अन्न के साथ अथवा और किसी तरह से पेट में रेत, तृण, लकड़ी या काँटे कौर: के चले जाने से आँतें छिद जाती हैं--उनमें घाव हो जाते हैं। फिर उन घावों से पानी जैसा पतला ara होता है और वह गुदा में हो कर बाहर बहता है। नाभि के नीचे का भाग बढ़ जाता है, पेट में सूई छेदने का-सा दर्द होता है और ऐसा जान पड़ता है मानो कोई चीरता है। इसी रोग को ' क्षतोदर ' कहते हैं, क्योंकि इस रोग में आँतों में अल्सर या घाव हो जाते हैं। कितने ही ग्रन्थों में इसे ‘afteraqar’ भी लिखा है; क्योंकि इस रोग में पानी-सा स्राव होता रहता है। 


खुलासा--शल्य, बाण और धातु प्रभूति के भोजन के साथ पेट में जाने से आतें छील या कट जाती हैं। फिर उन छिली हुई या कटी हुई आँतों में से हो कर गुदा द्वारा पतला पानी-सा स्राव होता है और नाभि के नीचे से पेट बढ़ता है। इसे ' क्षतोदर' कहते हैं। tg आने या थोड़ा भोजन करने से काँटे aM: पेट में छिदने लगते हैं-यह भी क्षतोदर की एक पहचान है। 


[८ ] जलोदर के लक्षण--जो मनुष्य Bea करके-घी-तैलादि पी कर, अनुवासन वस्ति-चिकने पदार्थों की पिचकारी ले कर, वमन-विरेचन करके, अथवा Free वस्ति सेवन करके तत्काल शीतल जल पी लेता है, उसकी जलवाही नाड़ियाँ दूषित हो जाती हैं, अथवा उनके चिकनाई लिपट जाती है। फिर उन्हीं दूषित नाड़ियों से पानी टपक-टपक कर पेट में इकट्ठा होता है और इस तरह पेट बढ़ता है। इसको ‘sealer’ या 'जलोदर' नामक जल संचय-जनित उदर-रोग कहते हैं। 


इस रोग में पेट चिकना, बड़ा और चारों तरफ से बहुत ऊँचा होता है। पेट तना हुआ-सा मालूम होता है। पानी की पोट-सी भरी जान पड़ती है। जिस तरह पानी से भरी हुई मशक झलर-झलर हिलती है, उसी तरह पेट हिलता और आवाज़ होती है। इसकी वजह से नाभि के चारों तरफ दर्द होता है। 


 खुलासा--पेट अत्यन्त ऊँचा और चिकना होता है। पानी की पोट-सी भरी मालूम होती है। वह पानी से भरी हुई पखाल की तरह हिलता है, गुड़-गुड़ शब्द और कम्प होता है। इसे 'जलोदर या जलन्धर' कहते हैं। आत्रेय मुनि कहते हैं कि विषम आसन पर बैठने से, बहुत पानी पीने से, मिहनत और राह चलने की पीड से एवं अत्यन्त कसरत करने से पेट पोला हो जाता है और जलोदर रोग हो जाता है। जिसको जलोदर हो जाता है उसके पेट में पानी मालूम होता है, पेट अत्यन्त बढ़ जाता है, आवाज होती है और पैरों में सूजन होती है। 

👉👉इसे भी पढ़े- मूत्रकृच्छ रोग-वर्णन

उदर-रोगों की साध्यासाध्यता बहुत करके सभी तरह के उदर-रोग कष्टसाध्य होते हैं। रोगी बलवान हो, पेट में पानी पैदा न हुआ हो और रोग हाल का पैदा हुआ हो, तो उपाय करने से नष्ट हो जाते हैं। 


सब तरह के उदर-रोग कष्टसाध्य हैं; विशेषकर जलोदर और क्षतोदर रोग अतिशय कष्टसाध्य हैं। चीर-फाड़ से ही ये आराम हों तो हो सकते हैं; दवा-दारू से आराम होने की आशा बहुत कम है। रोग पुराना होने या रोगी का बल नाश हो जाने से सभी उदर-रोग असाध्य हो जाते हैं। 


 उदर रोगों की सामान्य चिकित्सा 

 समस्त उदर-रोग-नाशक आयुर्वेदिक नुसखे 


 (१) पुनर्नवा, देवदारु, गिलोय, अम्बष्ठा--पाढ़, बेल की जड़, गोखरू, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, हल्दी, दारुहल्दी, पीपर, चीता और अडूसा--इनको समान-समान लेकर पीस-छान लो। इसमें से चार या छह माशे चूर्ण 'गोमूत्र के साथ” खाने से सब उदर रोग नष्ट हो जाते है।

(२) रैडि का तेल 'गरम दूध या जल अथवा गोमूत्र' में मिला कर पीने से सब तरह के उदर-रोग आराम हो जाते हैं। 

(३) मालकाँगनी का तेल पीने से सब तरह के उदर-रोग नष्ट हो जाते हैं। 

(४) कंकुष्ठ का चूर्ण गरम जल के साथ सेवन करने से आठों तरह के उदररोग नष्ट हो जाते हैं। 

(५) देवदारु, ढाक, आक की जड़, गजपीपर, सहँजना और असगन्ध--इनको गौमूत्र में पीस कर लेप करने से सब तरह के उदर-रोग नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है। 

(६) मुर्दाशंख का चूर्ण 'नागरमोथा के काढ़े ' में मिला कर पीने से आठों तरह के उदर-रोग चले जाते हैं। 

(७) पीपलों को थूहर के दूध में भावना दे कर, उनमें से अपनी शक्ति-अनुसार एक से आरम्भ करके एक हज़ार तक खाने से सब तरह के उदर-रोग नष्ट हो जाते हैं। 

(८) शुद्ध शिलाजीत को “गोमूत्र' में मिला कर पीने से अथवा शुद्ध गूगल को “त्रिफले के काढ़े' में मिला कर काँजी के साथ पीने से सब तरह के उदर रोग नष्ट हो जाते हैं। 

(९) दुर्गन्‍न्ध करंज के बीज, मूली के बीज, गहरेडूबे की जड़ (गवादनी-मूल) और शंख-भस्म को मिला कर काँजी के साथ पीने से जलोदर तक आराम हो जाता है। 

(१०) इंद्रजौ ४ माशे, सुहागा ४ माशे, हींग ४ माशे, शंख भस्म ४ माशे और पीपर ६ माशे--इनको गोमूत्र के साथ पीस कर पीने से सब तरह के उदर-रोग, यहाँ तक कि पुराने उदर-रोग भी नष्ट हो जाते हैं। )

(११) इन्द्रायण, शंखपुष्पी, दन्ती, निशोथ, नीलीवृक्ष, त्रिफला, हल्दी, बआयबिडंग और कबीला--इनका चूर्ण 'गोमूत्र' के साथ पीने से उदर-रोग नष्ट हो जाते हैं।


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मंगलवार, 11 मई 2021

दाह-रोग वर्णन शरीर मे जलन का आयुर्वेदिक उपचार

 दाह-रोग वर्णन

दाह के सामान्य लक्षण

विविध कारणों से पित्त के कुपित होने से, हाथ-पैरों के तलवे और आँखों में

अथवा सारे शरीर में दाह या जलन होती है। उस दाह या जलन को ही 'दाह-रोग'

कहते हैं।


दाह-रोग की किस्में

दाह-रोग सात तरह का होता है-(१) पित्त का दाह । (२) रुधिर का दाह ।

(३) प्यास रोकने का दाह। (४) रक्तपूर्ण कोटज दाह। (५) मा का दाह।

() धातु-क्षयज दाह । (७) मर्माभिधातज दाह।

पित्त के दाह के लक्षण-दाह गरमी की व्याधि है। पित्त के दाह में, पित्तज्वर के-से लक्षण होते हैं। इसलिये इसकी चिकित्सा भी 'पित्त ज्वर' की तरह ही करनी चाहिये

पित्त चर और दाह में फ़र्क-पित्त ज्वर में, आमाशय के दूषित होने से, ज्वर

और दाह दोनों होते हैं; किन्तु दाह-रोग में केवल दाह ही होता है। अथवा पित्त-ज्वर

में अग्नि और आमाशय दोनों दूषित होते हैं; किन्तु पित्त के दाह में अग्नि और आमाशय

दूषित नहीं होते-केवल जलन होती है; यही भेद है।

रुधिर के दाह के लक्षण-शरीर में खून के बहुत ही ज्यादा बढ़ जाने से भी

दाह होता है; यानी शरीर का खून भी कुपित हो कर दाह-रोग पैदा करता है। ऐसा

होने से रोगी को सारा संसार आग से जलता हुआ-सा मालूम होता है। अथवा ऐसा

जान पड़ता है, मानो आग मेरे पास रखी है और मैं उससे जला जा रहा हूँ। रोगी को

प्यास बहुत लगती है। दोनों आँखें और सारा शरीर ताम्बो के रंग का हो जाता है; यानी 

शरीर और नेत्र लाल हो जाते हैं। शरीर और मुंह से ऐसी गन्ध निकलती है जैसी गरम

लोहे पर पानी डालने से निकलती है। शरीर में मानो किसी ने आग लगा दी है, ऐसी

वेदना होती है।

प्यास रोकने के दाह के लक्षण-जो आदमी मूर्खता से प्यास को रोकता है,

उसकी जल-रूप-धातु क्षीण हो जाती है और तेज या पित्त की गरमी शरीर के भीतर

और बाहर दाह-जलन पैदा करती है। उस समय उस आदमी के गला, तालू और

होठ सूख जाते हैं और वह जीभ को निकाल कर हाँफने लगता है।

मतलब यह है कि पानी न पीने से शरीर की पतली धातुएँ क्रमशः कम हो

जाती हैं और गरमी बढ़ती है। गरमी बढ़ने से शरीर के भीतर-बाहर आग-सी लग

जाती है; गला, तालू और होठ सूखने लगते हैं और रोगी कुत्ते की तरह हॉफ्ता और

जीभ को बाहर निकाल देता है।

रक्तपूर्ण कोष्ठज दाह-तलवार, बरछी या भाले वौरह के लगने से आदमी

के शरीर में पाप हो जाते हैं। उन पायों से निकले हुए खून से जिस आदमी का

 कोठा भर जाता है, उसके शरीर में महा दुस्तर दाह पैदा होता है।

मतलब यह है कि तलवार आदि से जख्म होने पर, खून से हदय आदि कोठे

भर जाते हैं, तब घोर दुःसह दाह पैदा होता है। इसी से युद्धक्षेत्र के घायल पानी-ही पानी को रटना लगा देते हैं। ऐसे दाह के लक्षण सद्योव्रण के समान होते हैं। अतः

 ऐसे दाह की चिकित्सा भी वैसी ही होनी चाहिए।

मध के दाह के लक्षण-गद्यपान करने या शराब पीने से पित्त कुपित हो जाता

है। उस कुपित पित्त की गरमी, पित्त-रक्त को बढ़ा कर, दाह पैदा कर देती है। इस

दाह की चिकित्सा पित्त की जैसी करनी चाहिये।

धातु-शय का दाह-रस-रक्त आदि धातुओं का क्षय होने से भी दाह-रोग

होता है। इस दाह वाला रोगी तृषार्स, मूर्षिछा, क्षीण-स्वर और चेष्टाहीन हो जाता है;

अर्थात् धातुओं का क्षय होने से जो दाह होता है, उसमें रोगी प्यास के मारे विकल हो

उठता है, बेहोश हो आता है, गला बैठ जाता है, आवाज नहीं निकलती और वह

चेष्टा-रहित हो जाता है। इस दाह-वाला अच्छा इलाज न होने से मर जाता है।

मर्माभिधातज दाह के लक्षण-मस्तक या हदय अथवा मूत्राशय आदि

मर्मस्थानों में चोट लगने से जो दाह होता है, वह असाध्य होता है।

» नोट-पित्त से ही दाह होता है, इसलिए जिन रोगों में दाह हो, उनमें

"पित्त की अधिकता' समझनी चाहिये। खून के बढ़ने या कुपित होने से, प्यास के

रोकने से, घाव होने से, शराब पीने से, रक्त-रस आदि धातुओं के कम होने से और

हृदय आदि मर्मस्थानों में चोट लग जाने से दाह होता है। धातुक्षय का दाह खराब होता

है। अच्छा इलाज न होने से रोगी मर जाता है। पर मर्म में चोट लगने से जो दाह होता

है, वह तो असाध्य ही होता है।

" नोट-बंगसेन ने लिखा है, क्षत या भाव होने से जो दाह होता है, उसमें

भूख बहुत कम हो जाती है। जिसे शोक करने से दाह होता है, उसके शरीर के भीतर

बड़ी जलन होती है, तथा प्यास, मूछा और प्रलाप के लक्षण होते हैं।

दाह की असाध्यता

जिस रोगी के शरीर के भीतर दाह हो, पर ऊपर से शरीर शीतल हो, उसका

दाह असाध्य है। उसका इलाज न करना चाहिये। कहा है


दाह-रोग वर्णन


पित्तज्वरसमा कायां चिकित्सा तु भिषग्वरैः ।

वर्जनीया प्रयत्नेन शीतगात्रस्य देहिनः॥


दाह-रोग की चिकित्सा बुद्धिमान वैद्य को पित्त-ज्वर के समान करनी चाहिये,

परन्तु जिसके भीतर दाह हो- भीतर से शरीर जला जाता हो और ऊपर से छूने में शरीर

शीतल हो, उसका इलाज न करना चाहिये।

दाह-चिकित्सा में याद रखने योग्य बातें

(१) दूध और दूध वाले वृक्षों के सुशीतल चन्दन-मिले हुए काढ़े एवं अन्यान्य

शीतल प्रयोगों से अन्तर्दाह या भीतर का दाह शान्त होता है।

(२) चमड़े की गरमी रुकने से शरीर का चमड़ा ठण्डा हो जाता है। ऐसा होने

से शरीर पर 'अगर का लेप' करना चाहिये।

(२) पित्त और खून से बढ़ी हुई शरीर की गरमी, चमड़े में घुस कर, घोर दाह

करती है। इसलिये, उस अवस्था में, पित्त के समान चिकित्सा करनी चाहिये।

(४) शरीर के खून के बढ़ने या कुपित होने से जो दाह होता है, वह घोर दाह

होता है। उससे मनुष्य की आँख लाल और शरीर का चमड़ा ताम्बे के रंग का सा हो

जाता है, तथा देश में आग के-से पतंगे लगते हैं। इस दाह को 'अति दाह' भी कहते

हैं। चूंकि यह दाह खून के बढ़ने से होता है, इसलिए इसमें हाथ या पाँव की 'रोहिणी'

नामक शिरा-नस को खोल कर खून निकालना चाहिये। चन्दन और उशीर को बहुत

से पानी में मिला कर, रोगी को उसमें स्नान कराना चाहिये। अगर रोगी प्यास के मारे

जीभ को बाहर निकाल कर हॉफता हो, गला और होंठ सूखे जाते हों, तो उसे शीतल

पानी अथवा मिश्री, पानी और दूध मिला कर पिलाना चाहिये। ये उपाय इस दाह में

परीक्षित हैं।

खून के कोप से हुए दाह में विधिपूर्वक लंघन करा कर, उत्तम चिकना, शीतल

और हल्का भोजन देना चाहिये। ये काम पहले करने चाहियें। अगर इन

उपायों से दाह शान्त न हो, तो रोहिणी नामक शिरा, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है

👉👉इसे भी पढे़- बेहोशी मूर्छा का आयुर्वेदिक इलाज

(५) प्यास से हुए दाह में, इच्छानुसार, पेट भर के जल पीना चाहिए अथवा

मित्री या पानी का शर्बत पीना चाहिये; अथवा दूध में ईख का रस मिला कर पीना

चाहिये।

(६) धातु-क्षय से हुए दाह को अनेक प्रकार के इष्ट विषयों से जीतना चाहिये।

मित्रों में बैठ कर दूध और मांस-रस का भोजन करना चाहिये। इस तरह के दाह में

'रक्तपित्त की विधि' से इलाज करना और चिकनी वातनाशक दवा या पथ्य देना हित है।

(७) दाह-रोग में, उप्रदवों के शान्त होने पर, शोधन करना चाहिये।

(८) प्यास और दाह की शान्ति के लिए स्नान कराने, छीट मारने और पंखा

वगैरह भिगोने में शीतल जल ही लेना चाहिए।

(९) सुश्रुत ने जो अत्यन्त सोच-फ़िक्र करने से दाह का होना लिखा है, उस

दाह का इलाज रोगी को प्यारे मित्रों में बिठाना, दूध और मांस-रस पिलाना तथा अन्य

शीतल उपचार हैं।

(१०) दाह-रोग में रोगी के पेट को साफ़ रखना बहुत ज़रूरी है।


२१ दाह-नाशक नुसखे


(१) दाह-रोगी के शरीर पर "सौं वार भुला हुआ घी" लगाने से दाह शान्त

हो जाता है। परीक्षित है।

(२) काँजी के पानी में कपड़ा भिगो कर, उससे शरीर ढक देने से दाह शान्त

हो जाता है। अगर प्यास का दाह हो, तो शीतल जल पिलाना चाहिये।

(३) जौ के सत्तू का शरीर पर लेप करने से दाह शान्त हो जाता है।

(४) बेर और आमलों को एकत्र पीस कर, शरीर पर लगाने से दाह शान्त हो

जाता है।

(५) अनार और इमली को एकत्र पीस कर, शरीर पर लगाने से दाह शान्त हो

जाता है।

(६) लामज्जक नाम की सुगन्ध घास अथवा चन्दन का लेप करने से दाह

शान्त हो जाता है।

(७) आमले और अनार के रस में "जी का सतू'' मिला कर लेप करने से

दाह मिट जाता है।


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धन्यवाद Gk Ayurved




शनिवार, 8 मई 2021

मूर्च्छा बेहोशी का करें आयुर्वेद से सफल एवं जड़ से इलाज


मूर्च्छा बेहोशी रोग का वर्णन मूर्च्छा का स्वरूप।


जब मनुष्य में सुख-दुःख आदि का अनुभव करने की सामर्थ्य नहीं रहती-जब उसे सुख-दुःख आदि का ज्ञान नहीं रहता और वह काठ की तरह, बेहोश हो कर, जमीन पर गिर पड़ता है, तब कहते हैं कि उसे 'मूर्च्छा' या 'मोह' रोग हो गया है। साधारण बोलचाल की भाषा में मूर्च्छा को बेहोश होना, गश आना या जोफ़ आना कहते हैं।

» नोट-थोड़ी-सी बेहोशी को 'मोह' और एकदम बेहोश हो जाने को 'मूर्च्छा' कहते हैं।

मूर्च्छा के निदान कारण।


इन कारणों से मूर्च्छा बेहोशी रोग होता है-(१) क्षीणता होना, (२) पित्त-दोष का

बहुत ही बढ़ जाना , (३) विरुद्ध भोजन करना, (४) मल-मूत्रादि के वेगों को रोकना,

(५) लकड़ी वगैरः की चोट लगना, (६) सत्वगुण की कमी होना।


निदानपूर्वक सम्प्राप्ति।


जो मनुष्य क्षीण हो जाता है, जिसका पित्त-दोष बहुत ही बढ़ जाता है, जो विरुद्ध आहार सेवन करता है, जो मल-मूत्र आदि वेगों को रोकता है, जिसके किसी तरह की चोट लग जाती है और जो हीन-सत्य हो जाता है, उस मनुष्य की इन्द्रियों के बाहरी और भीतरी स्थान में जब उन दोष जम जाते हैं, तब मनुष्य मूर्छित या बेहोश हो जाता है।

खुलासा-जो आदमी क्षीण हो जाते हैं, जो दूध-मछली प्रभृति को एक साथ खाते हैं, जो दिशा-पेशाब वगैरः को रोकते हैं, जिनको लट्ठ वगैरः की भारी चोट लग जाती है, जिनमें सतोगुण की कमी और तमोगुण की अधिकता होती है, उनके

बाहरी और भीतरी-नेत्र प्रभृति इन्द्रियवाही और मनोवाही स्रोतों में जब दोष कुपित होकर ठहर जाते हैं, तब उन्हें 'मूर्छा होती है।


" नोट-१. कोई ज्ञानेन्द्रियों का स्थान हृदय को मानते हैं और कोई दिमाग को।

" नोट-२. एक-एक दोष से मूर्छा होती है। तीनों दोषों के समुदाय से मूर्छा होती है, ऐसा नहीं समझना चाहिये।

" नोट-३. "अल्प सत्वगुणं वाले को मूर्छा होती है", इसका अर्थ यह है कि अधिक तमोगुण वाले को मूर्छा होती है; क्योंकि मूर्छा में पित्त और तमोगुण की अधिकता होती है।

" नोट-४. 'हारीत-संहिता' में लिखा है-मनुष्य की पाँचों इन्द्रियों से बारहबारह माड़ियों का सम्बन्ध है; यानी कुल मिला कर १२४५-६० नाड़ियाँ हैं, जिनका इन्द्रियों से लगाव है। जब कुपित हुए दोष इन नाड़ियों के द्वारों को रोकते हैं, तब मनुष्य मूच्छित होता है।


मूर्च्छा बेहोशी के सामान्य लक्षण।


संज्ञा को बहाने वाली नाड़ियों के, वायु आदि दोनों से पीड़ित होने पर एकाएक, सुख और दुःख का ज्ञान नाश करने वाला तमोगुण प्राप्त होता है। जब तमोगुण का दौर-दौरा हो जाता है, तब मनुष्य को सुख दुख का ज्ञान नहीं रहता और वह काठ या लकड़ी की तरह जमीन पर गिर पड़ता है। इस रोग को 'मूर्छा' या 'मोह' कहते हैं। मूर्छा के पर्याय शब्द-संजोपघात, मूनि, मूछो, मूर्छन, कश्मल, प्रलय और मोह हैं। जिस मोह से मनुष्य मुर्दे के समान हो जाता है, उसे 'संन्यास' कहते हैं।

मूर्च्छा के भेद।

मूर्च्छा-रोग छह प्रकार का होता है। ''सुश्रुत'' में लिखा है।


वातादिभिः शोणितेन मोन च विषेण च।

षट्स्वपि तासु पित्तं हि प्रभुत्वेनावतिष्ठते॥

वात से, पित्त से, खून से, शराब से और विप से इस तरह छह प्रकार की मूर्च्छा- होती है। इन सभी तरह की मूर्च्छाओं में ही पित्त की प्रधानता होती है। कहा है- "मूळ पित्ततमः प्रायेति"।  अर्थात् मूर्चा में पित्त और तमोगुण की अधिकता होती है।

खुलासा यह है कि यों तो बात से, कफ से, खून से, शराब से और विष से मूर्छा होती है; पर सभी तरह की मूर्च्छाओं में पित्त का जोर ज़्यादा होता है। खाली पित्त से ही मूर्च्छा नहीं होती; वात से भी होती है और कफ़ से भी होती है; पर इनमें राजा पित्त ही रहता है। पित्त तो सभी मूर्च्छाओं में रहता है, पर जिसमें बात का ज़ोर ज़्यादा होता है, वह वातज मूर्च्छा कहलाती है। इसी तरह जिसमें कफ पयादा होता है,वह कफ़ज मूर्च्छा कहलाती है। 


मूर्च्छा के छह भेद ये हैं।


(१) वातज (३) कफज (५) मधज, और

(२) पित्तज (४) रक्तज (६) विषज।

» नोट-यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि पित्त तो सत्वगुण-प्रधान और चैतन्यता का कारण है, फिर उससे मूर्च्छा क्यों होती है? इसका जवाब यह है कि अपने स्थान पर रहा हुआ शुद्ध पित्त सत्वगुण-प्रधान और चैतन्यता का हेतु होता है, पर दूषित और उद्विक्त (फूटा हुआ या चिहित) पित्त अज्ञानकारक हो जाता है।

मूर्च्छा के पूर्वरूप- (१) हृदय में पीड़ा या कलमलाहट-सी होना,

(२) जंभाइयाँ आना, (३) ग्लानि होना, (४) संज्ञा का नाश होना या होश-हवास

विगड़ना, (५) बल का नाश होना या कमज़ोरी आना।

वातज मूर्च्छा.. के लक्षण-जिसे बात की मूछा होती है, वह मनुष्य आकाश

को नीला, काला या लाल देखता-देखता बेहोश हो जाता है और फिर तत्काल ही होशमें आ जाता है। ऐसे रोगी के शरीर में कँपकँपी आती है, अगों में तोड़ने की पीड़ा होती है, हृदय में वेदना होती है, शरीर दुर्बल हो जाता है और उसका रंग स्याहीमाइल लाल हो जाता है।

पित्तज मूर्च्छा.. के लक्षण-अगर रोगी आकाश को लाल, हरा अथवा पीले रंग का

देखता-देखता बेहोश हो जाय और पसीने आकर फिर होश में आ जाय, प्यास लगे, सन्नतापहो, आँखें लाल और पित्त से व्याकुल हो जायें, दस्त पतला होने लगे और शरीर का रङ्ग पीला हो जाय, तो समझो कि पित्त की मूर्च्छा है।

कफ़ज मूर्च्छा.. के लक्षण-अगर आदमी आकाश को सफ़ेद बादलों से बका

हुआ देख कर अथवा घोर अन्धकार से घिरा हुआ देख कर बेहोश हो जाय और फिर बहुत देर बाद होश में आये, शरीर गीले चमड़े से ढके हुए की तरह भारी जान पड़े,मुँह में पानी भर-भर आये, उबकाइयाँ आयें, तो समझो कि कफज मूर्च्छा है।

त्रिदोष की मूर्च्छा के लक्षण-जो मूर्छा सत्रिपात या वात, पित्त और कफतीनों दोषों से होती है, उसमें तीनों ही दोषों के लक्षण देखने में आते हैं। इस मूर्ख वाला, अपस्मार या मृगी वाले की तरह, बड़े जोर से गिर जाता और गिर कर बहुत समय बाद होश में आता है। कहा है

सर्वापात को मूर्च्छा में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं। यह रोग दूसरा अपस्मार या मृगी है। यह मूछो तत्काल प्राण- नाश करती है, इसका इलाज होशियारी से करना

" नोट- यहाँ यह सबाल होता है कि जब मृगी और सभिपात की मूर्च्छा के

लक्षण एक ही से हैं, तब इन दोनों में फ़र्क कैसे समझा जाय? इसका जवाब चरक मुनि इस तरह देते हैं कि मृगी-रोगी झागदार वमन करता है, दाँत चबाता है और उसके नेत्रों का ढा और ही तरह का हो जाता है आदि-आदिः पर सन्निपात की मूर्च्छा में ये लक्षण और चेष्टायें नहीं होती।

खून की मूर्च्छा के कारण-पृथ्वी और पानी में तमोगुण के अंश बहुत ज़्यादा हैं, और गन्ध तथा यून पृथ्वी और पानी के पदार्थ रूप हैं यानी गन्ध और खून पृथ्वी और पानी के अंशों से बनेहैं-तत्व् हैं। इसलिये सतोगुणी और रजोगुणी नहीं हैं, किन्तु तमोगुणी मनुष्य खून की बू या रुधिर की गन्ध सूंघने या सुंघाने से बेहोश हो जाते हैं। इस विषय में बहुत से मत हैं। कोई-कोई कहते हैं कि यह युक्ति ठीक नहीं है, क्योंकि चम्पा की गन्ध भी तो पृथ्वी-सम्बन्धी है, अत: उसको गन्ध से भी मूर्च्छा होनी चाहिये, पर उसको गन्ध से मूर्च्छा नहीं होती।

कोई-कोई कहते हैं कि खून की गन्ध से नहीं, किन्तु देखने से मूर्च्छा होती है। यह मूर्च्छा रुधिर या खून के ऐसा स्वभाव होने से होती है। किन्तु भोज' कहता है कि खून के देखने से भी मूर्च्छा होती है और उसके गन्ध से भी

मूर्च्छा-रोग में पथ्यापथ्य -

पथ्य-शीतल जल के छींटे देना, मणि अथवा हार पहनना, शीतल पदार्थों का लेप करना, तिल का तेल मलवाना, बहती हुई नदी या तालाब में स्नान कराना, पंखे की हवा, शीतल सुगन्धित द्रव्य मिले हुए पानी के पदार्थ, फव्वारे वाला मकान, चन्द्रमा की शीतल किरणें, धूमपान-धुआँ पीना, अंजन आँजना, नस्य लेना, फ़स्द खोलना,  कहानियाँ कहना, ऊँची आवाज से बोलना, मनोहर बाजे ज़ोर से बजाना, रोगी को भूली हुई बातों की याद कराना, आत्मज्ञान में लगाना और धीरज धराना-ये सब मूर्च्छा-रोग में पथ्य हैं।


छाया, वर्षा का पानी, सौ बार का धोया घी, कोमल और तीखे रस, खीलों का मॉड, पुराने जौ, लाल चावल, हाँड़ी का घी, मूंग और मटर का यूष, राग-खांडव, गाय का दूध, मिश्री, पुराना पेठा, परवल, केले की गहर,अनार, नारियल, चौलाई, हल्के अन्न, नदी-तट के कुएं का पानी, सफ़ेद चंदन, कपूर का जल, नेत्रबाला और शीतल बालू-ये सब मूर्च्छा रोग में पथ्य हैं।

दिन के समय पुराने चावलों का भात; मूंग, मसूर, चना और उड़द की दाल; परवल, पका कुम्हड़ा, बैंगन और गूलर आदि का साग; दही, मक्खन, दाण, अनार,पके आम, पका पपीता, शरीफा और कच्चा नारियल वगैरह मूर्छा-रोगी को पथ्य हैं। रात के समय पूरी, रोटी, हलवा, मोहन भोग, दूध, घी, मैदा या सूजी के पदार्थ और मिठाई देना पथ्य है।

सवेरे के समय गाय का धारोष्ण दूध और शर्वत पीना पथ्य है। अन्य समय मिली-मिला और कपूर से सुवासित किया हुआ आमले आदि का पना, मधुर औषधियों के द्वारा पकाया हुआ दूध, अनार का रस ये सब भी पथ्य और रोग नाशक हैं।


अपथ्य-ताम्बूल (पान), मेथी आदि पत्तों के साग, दाँत घिसना; धूप में फिरना, विरुद्ध अन-पान, स्त्री-प्रसंग, पसीने निकालना, चरपरे रस सेवन करना; प्यास,नींद और मल-मूत्र आदि के वेग को रोकना, माठा या छाछ पीना-ये सब मूळ-रोग में अपथ्य हैं। देर में हजम होने वाले, तीक्ष्ण-वीर्य, रूखे और खट्टे पदार्थ खाना; अधिक मिहनत करना, चिन्ता करना, उरना, क्रोध या शोक करना, शराब पीना, रात-दिन बैठा रहना, आग तापना, इच्छा-विरुद्ध काम करना, घोड़े आदि की सवारी करना, रात को जागना और दाँतुन करना-ये सब भी मूर्च्छा-रोग में अपथ्य हैं।

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मूर्छा-नाशक नुसखे

(१) बेरों का गूदा, काली मिर्च, ख़ास और नागकेशर को बराबर-बराबर ले सिल पर ठण्डे पानी के साथ महीन पीस लो और फिर ठण्डे पानी में घोल कर पिला दो। इस नुसखे से मूर्छित होश में आ जाता है। सुपरीक्षित और सर्वोत्तम नुसखा है।

(२) छोटी पीपरों का महीन चूर्ण शहद' में मिला कर चटाने से मूर्च्छा-रोग नष्ट हो जाता है। हमारे द्वारा सुपरीक्षित है।

(३) पंचमूल का कषाय (काढ़ा) 'मित्री और शहद' में मिला कर पिलाने से मूर्च्छा नष्ट हो जाती है। परीक्षित है।

(४) कमल का कन्द या जड़, कमल की नाल, पीपर और हरड़-इनको बराबर-बराबर ले कर और पीस-छान कर शहद के साथ चटाने से मूर्च्छा नष्ट हो जाती है।

(५) दाख, चीनी, अनार, धान की खीलें, दही का तोड़ या दही का पानी,नीले कमल और सफेद कमल-इन सब का हिम या शीत-कषाय पीने से मूर्छा नष्ट हो जाती है।

 'पित्त-ज्वर-नाशक

काढ़े' पिलाने से मूर्च्छा-रोग चला जाता है।

(६) आमलों के स्वरस के साथ पकाया हुआ घी पिलाने से मूर्च्छा रोग आराम हो जाता है।

(७) सिरस के बीज, पीपर, काली मिर्च, सेंधा नमक, लहसन, मैनसिल और बच-इनको बराबर-बराबर ले कर, गो-मूत्र में महीन पीस लो और अंजन-सा बना कर आँखों में आँजो। इस अंजन से मूर्छित होश में आ जाता है।

(८) शहद, सेंधा नोन, मैनसिल, काली मिर्च-इनको बराबर-बराबर लेकर, काजल के समान महीन पीस लो और आँखों में आँजो। इस अञ्जन से भी मूर्च्छा नष्ट होता है।


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धन्यवाद Gk Ayurved






बुधवार, 21 अप्रैल 2021

घरेलू उपचारों से ठीक करें आमवात के रोग को

 घरेलू उपचारों से ठीक करें आमवात के रोग को




जैसे अन्य अनेक रोगों को हम घरेलू उपचारों से सफलतापूर्वक दूर कर सकते हैं, इसी प्रकार आमवात के लिए भी हमारे पास अनेक उपचार है। घर में उपलब्ध फल, फूल,सब्जियों, पेड़-पौधे तथा मलाले हमें इस कार्य में मदद करते हैं। कुछ का वर्णन यहाँ कर रहे है।


गाजर का रस


गाजर सदी के मौसम में बहुतायत में मिल जाती है। यह एक सस्ता फल या सब्जी है। आमवात के रोग का अधिक प्रभाव भी सदी की तु में होता है। गाजर का रस पीने तथा गाजर खाने से आमवात का रोग शांत किया जा सकता है।


मिश्रित रस


अकेले गाजर का रस तो काफी लाभ देता ही है। यदि चुकवर, ककड़ी और गाजर, तीनों को मिलाकर, इनका रस रोगी को पिलाया जाए अथवा जो-जो सब्जी इनमें से मिले, उन्हीं का पिवित रस निकालकर रोगी को पिलाएँ, उसे रोग में आराम मिलेगा।


तुलसी की भाप


1. मुट्ठी भर तुलसी के पत्ते में । इन्हें खालकर भाप पैदा करें। यदि आमपात वाले अंगो पर यह भाप पड़ाती है तो उन्हें आराम मिलता है। तुलसी के पत्तों की भाप बड़ी ही उपयोगी रहेगी

2. यही उबला हुआ पानी भी बाद में अंगों को धोने के काम आ सकता है। इस पानी में तुलसी का असर आ चुका होता है, इसलिए प्रभावी अंगों को धोने से आराम मिलता है।


काली मिर्च, घी तथा तुलसी


आमवात के रोगी अपने इस रोग को छुटकारा पाने के लिए ।। तुलसी के पत्ते, 5 काली मिर्च साबुत तथा एक चम्मच गाय का देसी घी तें। इन तीनों को इकडा चबाने से आराम मिलता है।


अदरक और घी


आमवात अवमा गठियावाय से छुटकारा पाने के लिए दो चम्मच अदरक का रस निकालें। इसमें एक पम्मच गाय का देसी घी मिलाकर रोगी को चटाएं।


सोंठ का पानी


एक छोटा टुकड़ा सोंठ का लें। अंदाज़ से एक तोला मात्र। दो कप पानी में इस सोंठ को कूटकर डालें व उबालें। जब पानी आधा बच जाए तो उतारें। ठंडा करें। इसमें एक बड़ा चम्मच शहद मिलाकर रोगी को पिलाएँ। उसे राहत मिलेगी।


प्याज़ का रस


1. आमवात हो जाए तो कच्चा प्याज खाने की आदत बनाएँ। दोनों समय भोजन के साथ एक-एक कच्चा प्याज़ खूब चबाकर खाएँ।

2. कच्चे प्याज़ का रस तीन चम्मच एक समय रोगी को पीने को दें। ऐसी ही दो खुराक प्रतिदिन देनी चाहिए।


 लहसुन तथा तिल का तेल 


आमवात को शांत करने के लिए लहसुन को कूट-पीस लें। इसे तिल के तेल में मिलाएँ। इसका सेवन लाभकारी होता है।

मालिश आमवात का रोगी स्वयं करे तो ठीक वरना अभिभावक उसकी लहसुन के तेल से मालिश करें। काफ़ी जल्दी आराम मिलेगा।


लहसुन की खीर


लहसुन की पंद्रह कलियाँ लें। इन्हें छील लें। छोटे-छोटे टुकड़े करें। ताज़ा दूध आधा किलो लेकर उसमें इस साफ़ कटे लहसुन को डालें। उबालें। दूध को कुछ सूखने दें। यह पतली खीर तैयार हो जाएगी। लहसुन का काफी प्रभाव दूध में भी आ चुका होगा। इस खीर को खाने से रोगी लाभ उठ सकता है। इस खीर को नियमित खाने से बहुत आराम मिलेगा।


आलू उपचार


1. आलू को पीसकर पेस्ट तैयार करें। प्रभावी अंग पर इसका लेप करें। इसीसे आराम मिलेगा।

2. अपनी पैंट की जेबों में सदा एक-एक छोटा आलू रखें। यह करये आलू आमवात के रोग को नियंत्रण में रखेंगे।

3. आमवात का रोगी अपने भोजन में आलू को सम्मिलित करें। बल्कि दिन में एक-दो बार केवल आलू ही खाया करें।

4. एक टुकड़ा कच्चे आलू का लें। इसे पीस लें। अब इस पिसे आलू का अँगूठे पर लेप करें। इसी से आराम मिलना शुरू हो जाएगा।


मेथी से उपचार


गठियाबाय से बचने के लिए, आराम पाने के लिए मेथी से उपचार संभव है। जैसे


1. रात के समय एक गिलास पानी मे दानेदार मेथी के दो बड़े चम्मच भिगो दें। सुबह इस मेवी भीगे पानी को मामूली गरम करें। छानें। इसे पी लें।

2. यदि आप अंकुरित मेवी खाना शुरू करें तो इससे आमवात को बड़ा शीघ्र आराम मिलता है। जो ऊपर नं. । श उपचार है, उसे प्रातः छानकर मेथी अलग करें। केवल पानी को मामूली गरम कर रोगी पी ले। उनी, भीगी मेथी को अंकुरित करने को रखें। अगले दिन अंकुरित मेवी खाकर रोग नगा सकते हैं।

3. हरी मेथी की भुजिया, साग, सब्जी बनाकर कुछ दिन नियमित खाएँ। इससे बड़ा आराम मिलता है।

4. हरी मेथी को बारीक काटकर, कच्ची चवाकर भी खा सकते हैं। यह भी अपना असर दिखाती है।

5. मेथी को देशी घी में भून लें। ठंडा हो जाने पर पीस लें। इसमें गुड़ डालकर, इसके लड्डू बनाएँ। ये लड्डू दिन में दो बार, एक-एक लाना है। यह काफ़ी जल्दी प्रभाय करने वाला इलाज है।


शहद का सेवन


आमवात का रोगी यदि दो चम्मच शहद नियमित खाता रहे तो उसे यह रोग छोड़ जाएगा।वैसे भी यदि किसी को इस रोग के होने की संभावना मात्र लगे तो वह आराम से न बैठे। उसे शहद के दो या तीन चमच रोज़ खाने चाहिए। उसको काफी फायदा होगा। इस तरह हमने जान लिया है कि गठियावाच या आमवात का रोग कुछ घरेलू उपचारों से अवश्य ठीक किया जा सकता है। हर व्यक्ति को ज़रूरत पड़ने पर इन उपचारों को अपनाना चाहिए।


धन्यावद Gk Ayurved


सोमवार, 19 अप्रैल 2021

लू लगने' तथा 'चक्कर आने' पर स्वयं करें उपचार

 'लू लगने' तथा 'चक्कर आने' पर स्वयं करें उपचार

लू लगना



गर्मी के मौसम में ही लू का प्रकोप रहता है। जिनका शरीर नाजुक होता है तथा उन्हें धूप में, भरी दोपहरी में जाना पड़ता है, उन्हें तू घेर लेती है। इससे बेहद बेचैनी रहती है। कभी-कभी चक्कर आ जाते हैं। कोई बच्चा, बड़ा या पुवती चक्कर खाकर सड़क पर ही गिर जाता है। वेसुध हो जाता है तो कोई घर या ठिकाने पर पहुँचकर बेसुध हो जाता है। लू लगने के आसार ही न बनने दें। यदि लू लग भी जाए तो इसका घरेलू इलाज संभव है। आसानी से हो सकता है। थोड़ी-सी कोशिश कर आप लू के रोगी को ठीक कर सकते हैं।


नींबू-पानी


यदि लू लग जाए तो पानी का एक गिलास लें। इसमें नींबू निचोड़ें। इसमें दो चम्मच

पिसी मिश्री भी लें। इसे मिलाकर रोगी को पिलाएँ। यदि फ्रिज या घड़े का ठंडा पानी हो तो और भी जल्दी आराम मिलेगा। वर्क का प्रयोग न करें तो अच्छा।


पानी से स्पंज तथा पानी सेवन


1. लू लगा व्यक्ति यदि सामान्य पानी बार-बार पीता रहे तो लू का प्रभाव कम

होगा।

2. यदि लू का प्रभाव बहुत अधिक हो तो रोगी को ताजा पानी के साथ दो-तीन

बार स्पंज करें। उसे बहुत आराम मिलेगा।


धनिया का पानी


गर्मी के दिनों में लू लगने की संभावना बनी रहती है। अतः बचाव में ही बचाव है, का विचार मन में रखते हुए धनिया को पानी में भिगोते रहें। कुछ घंटों बाद इसे मथकर,पानी छानकर, भीव शक्कर, चीनी, मित्री, कुछ भी मिलाकर पिला दें। दिन में दो बार इस यराक को लेते रहे। लू न लगे इसलिए तो इसे पीना ही है, लू लग जाए तो भी इसे पी सकते हैं।


इमली का पानी


गर्मी लग जाए, तू का प्रकोप हो जाए, ऐसे में इमली को घंटा-भर भिगोएं। फिर इसे

अच्छी प्रकार मलें। इसका असर पानी में आ जाए। इसे छानकर, कुछ और पानी डालकर रोगी को पिलाएँ। आराम पाएगा।


इमली का गूदा


इमली के गूदे को पाँव तथा हाथों के तलयों पर मलने से गर्मी निकल जाती है। तू का प्रभाव खत्म हो जाता है। यह सस्ता तया आसान तरीश है।


तुलसी के पत्तों का रस


तुलसी के पत्तों का रस निकालें । इसे पानी में मिलाएं। मियी या चीनी स्वादानुसार मिलाएँ। इसे पीने से तू का प्रभाव खत्म होता है। यदि चक्कर आते हो तो, तुलसी का रस ब्ड़ा लाभकारी है।


शहतूत का सेवन


लू, गर्मी का प्रभाव ख़त्म होने के लिए शहतूत को धोकर सेवन करें। यदि शहतूत का रस मिल सके तो एक कप रस, एक कप पानी डालकर पी लें। बड़ा आराम मिलेगा।


प्याज़ का सेवन


1. लू लगी होने पर, गर्मी से बचने के लिए प्याग को अपने खाने में सम्मिलित

करें। भोजन के साथ कच्चा प्याज साना शुरू करें।

2. एक कच्चा प्याज, नमक, नींबू का रस डालकर नियमित अलग से खाएँ। भोजन

के साथ प्याज खाने से अलग ही।

3. एक कच्या डोटा प्याज़ छीलकर जेब में रखें जब जाएं गर्मी में। काफी आराम मिलेगा 


प्याज़ का रस


1. प्याज का रस आधा कप निकालकर पीने से आराम मिलता है। गर्मी तथा

लू का प्रभाव बीक होता है।

2. प्याज का रस निकालकर छाती पर मलें। कनपटिनों पर मलें। इससे तू का

प्रभाव खत्म होता है।


लू सगने पर


यदि किसी को लू लग जाए तो उसे निम्नलिखित सभी या कुछ क्षण परेशान करेंगे 1. मुंह सूखेगा। अधिक प्यास लगेगी। ज़बान सूखी रहेगी।

2. चक्कर आने लगेंगे।

3. दित पवराएगा। पबराहट लगेगी। बेआरामी लगेगी।

4. पसीना आने लगेगा। माथे पर, होली पर, पाँव के तलवों पर...सब ओर पसीना

आने लगेगा।

5. रोगी हर प्रकार से असहज महसूस करेगा।


इन सब का उपचार

1. ऐसे रोगी को कैरी की छाछ पिलाने से उसे बहुत जल्दी लाभ होगा।

2. कैरी की छाक बनाने का तरीका

बड़ी करी-एक अदद लें।

इस कैरी को उबालें।

चाहें तो बैंगन की तरह इसे सेंके। जैसे बैंगन का मुर्ता बनाने के लिए

सेंकना पड़ता है, वैसे ही सेंकें।

इसे कुछ देर ठंडे पानी में रखें। केरी उचाली हो या सेंकी गई। आधा-पीना

घंटा ठंडे पानी में ज़रूर रखें।

ठंडे पानी से निकालकर इसके छिलके उतारें।

अब छिली हुई कैरी को भली प्रकार मथ लें।

इसके मधे हुए गूदे में डालें-(i) गुड़, (ii) धनिया, (ii) नमक,

(iv) जीरा, (v) काली मिर्च पिसी हुई।

वह सब डालने के बाद फिर से मः।

इसमें पानी डालकर घोल लें। यही कैरी की लस्सी है।

दिन में तीन बार, 4-1 घंटों बाद, एक-एक कप इस कैरी की लस्सी

को रोगी को पिलाएँ। उस पर से गर्मी तथा लू का पूरा प्रभाव उतर जायगा


चक्कर आना

हमें चक्कर किसी भी कारण से आ सकते हैं। यह गर्मी के कारण, लू लग जाने के कारण या कमज़ोरी होने के कारण भी आ सकते हैं। कभी घबराहट होना, दिल घबराना भी इसका कारण बन सकता है। किसी सबै रोग से उठने के कारण, दवाइयों के अधिक सेवन के कारण, अचानक भय की स्थिति हो जाने के कारण भी यक्कर आ सकते हैं। इन चक्करों को रोकने, चक्कर आ जाने पर उभरने, चक्कर के प्रभाव को खत्म करने के लिए घरेलू उपचारों पर निर्भर होना बहुत ही संभव है। रोग से छुटकारा पाने के कुछ साधन, कुछ उपचार यहाँ दिए जा रहे हैं।


आँवले का शर्बत्

गर्मियों में चक्कर आ जाना आम बात है। जरूरी नहीं कि कमजोर व्यक्ति ही हो, लू

व गर्मी का प्रभाव किसी को भी हो सकता है। आंवले का शर्यत इस तकलीफ से छुटकारा दिलाता है। इसका पान करना चाहिए। यह गर्मी के कारण होने वाली घबराहट को भी खम करता है।


धनिया का ताज़ा शर्बत

जब कभी सिर में चक्कर आते हो वा ऐसी संभावना भी बने तो धनिया का सहारा लें। धनिया तीन चम्मच, पानी एक गिलास, दोनों को अच्छी तरह उबालें। नीचे उतारें। इसमें स्वादानुसा रशक्कर या मिश्री मिलाएँ। ठंडा होने पर रोगी को पिलाएँ। आराम मिलेगा।


धनिया व शक्कर


चक्कर आने की प्रवृत्ति बन जाए तो एक चम्मच धनिया तवा इतनी ही शक्कर लेकर, इक़ट्ठी चवाएँ। इससे दिल को ताकत मिलेगी। चक्कर नहीं आया करेंगे।


मुनक्का तथा सेंधा नमक


चक्कर आने की दशा में या ऐसी प्रवृत्ति बन जाने पर, अधिक घबराएँ नहीं। बल्कि पांच दाने मुनक्का की से। बीज निकालें। इसे पहले घी में थोड़ा सेंक लें, फिर बीज निकाले। सेंधा नमक डालकर इसे रोगी को खिलाएँ। चक्कर नहीं 


तुलसी का रस


चक्कर छोटों को आ रहे हो या बड़ों को, चक्कर महिलाओं को आ रहे हों या पुरुषों

को, सबके लिए तुलसी का रस बड़ा लाभकारी रहता है। तुलसी के ताज़ा पने से। इन्हें घोएँ। इनका रस निकारों। 31 पते तक ले सकते हैं। अब इसके रस में आवश्यकतानुसार

मिश्री मिलाएँ। बच्चों को तो एक से डेढ़ चम्मच से शुरू होकर बड़ों को आधा कप तक ऐसा रस पिलाया जा सकता है। यह चक्कर लाने की प्रवृत्ति को समाप्त कर देता है।


काली मिर्च से बना हलुवा


यदि किसी को अक्सर चक्कर आने की शिकायत रहती हो तो इसके लिए हलुवा तैयार करें। इसके लिए काली मिर्च ।। दाने मोटी-मोटी कूट लें। इसे पीसना नहीं। फूटना ही है। इसे दस चम्मच देशी घी में तलें। मिर्च और धी को जानकर अलग करें। इस घीमें आटा भूनकर हनुषा बनाएँ। आवश्यकतानुसार शक्कर डाले। फिर तली हुई काली मिर्च । का चूरा इस हलुवा में मिलाकर रखें। आधा प्रातः आधा शाम दोनों समय के भोजन के बाद रोगी खा ले। कुछ दिनों तक इस उपचार को जारी रखें। चक्कर आने वाली बात खत्म होगी। पूरी तरह आराम मिलेगा।

हम जान गए हैं कि लू लगने तथा चक्कर आने की समस्या को हम घरेलू उपचारों

से कैसे नियंत्रण में रख आराम पा सकते हैं। ये सभी आसान भी हैं। लाभ उठाएं।


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रविवार, 18 अप्रैल 2021

जल जाने पर प्रयोग में लाएँ घरेलू विधियाँ

 जल जाने पर प्रयोग में लाएँ घरेलू विधियाँ


शरीर के किसी भी अंग का आग से जल जाना बहुत ही दुखदायी होता है। यदि एकाच अंग जले तब तो सहन हो भी सकता है। यदि कपड़ों को आग लग आने के कारण पूरा शरीर ही आग की चपट में आ जाए तब जो पीड़ा झेलनी पड़ती है, तब यह जो दुखदायी बन जाती है, उसका तो वर्णन करना भी कठिन है।




यदि अचानक आग लग ही जाए तो इन कुछ बातों की ओर ध्यान दें। सावधानियों बरतें। इनसे कष्ट को काफी कम किया जा सकता है। स्थिति पर काबू पाया जा सकता है।


सावधानियों

1. आग लगने पर वह आदमी बाहर न भागे। जितना हवा में जाएगा, उतनी आग भड़केगी।

2. वह अकेला हो या साथ में कोई और भी, उसे भारी कपड़े, कंबल, रजाई आदि में लपेट लेना चाहिए। इससे आग बुझ जाएगी।

3. कंचत, रजाई आदि तपेटकर वह व्यक्ति जमीन पर लेट जाए। इससे जाग जल्दी बुझेगी। उसके कंवत या रजाई से हया अंबर बिजुत प्रवेश न करे।

4. ऐसे व्यक्ति पर पानी मत डालें। पानी का प्रयोग करने से शरीर पर फफोले उभर आएंगे-जो बहुत ही पीड़ापक होते हैं।

5. शरीर के जले अंग पर कपणे आलू को पीसकर लगाएं। इससे दर्द वटता है। शांति मिलती है।

6. यदि जल जाने के कारण घाव हो गए हों तो इन घावों का उपचार करें। ये जल्दी-से-जल्दी ठीक हो। इसके लिए नारियल के तेल को चूने के पानी में मिलाकर, घावों पर लगाएं। जितना चूने का पानी सें, उतना ही नारियल का तेल । दोनों को मिलाकर लगाने से धीरे-धीरे घाव भरने लगते हैं।

7. चूने का पानी नारियल के तेल की काय अलसी के तेल में भी मिलाकर लगा सकते हैं। दोनों तेलों में से जो नज़दीक उपलब्ध रहे, उसी का लाभ


गेहूँ का आटा


जाने का उपचार करने के लिए घरेलू उपचार करें। गेहूँ का आटा पानी के साथ गीला करें। इस गीले आटे को जले हुए अंग पर लगाएँ। इससे बड़ी शांति मिलेगी। यह आटा जले की जलन को खींच लेगा।


पिसा हुआ केला


यदि कोई अंग आग में जल जाए तो ताज़ा केता लेकर पीस लें। लुग्दी-सी बनाएँ। इस पिसे केले का जले अंग पर लेप करें। बहुत ही आराम मिलेगा। केला ठंडक पैदा कर, घाव ठीक करेगा।


जले हुए जौ 


शरीर का कोई भी अंग जल जाए तो जौ ले । इन्हें जलाएं। पीसें । छाने । पाउडर-सी राख तैयार हो जाएगी। इस राख को तिल के तेल में मिलाएँ । लुग्दी-सी तेयार कर, जले अंग पर लगाएं। काफी राहत मिलेगी। 


धूप से जली त्वचा


1. यदि त्वचा धूप के कारण झुलसी हो या आग के कारण हो, कच्चा आलू लेकर, कूट-पीसकर लगाएं। जले अंग पर मलें। बाँथे। कोई आधा घंटा बाद बोल दें। ऐसा दिन में चार बार करें।


कच्चे आलू का रस


त्वचा के आग से जलने या यूप में शुललने के कारण परेशान मत हो। कच्चे आलू का रस निकालें। इत्ते त्वचा पर लगाएँ। आराम मिलेगा। धीरे-धीरे मुरासा अंग सुंदर निखर आएगा।


पानी में पिसी मूंग


शरीर के जले अंगों को राहत देने के लिए साबुत मूंग सें। इन्हें पानी में पीसें। इस पेस्ट का जले अंग पर लेप करें। काफी आराम मिलता है।


नारियल व तुलसी


जाले अंग का दर्द हटाने के लिए तथा इसे ठीक करने के लिए तुलसी का रस दो चम्मच निकालें। इतना ही नारियल का तेल से। दोनों को तुरंत मिलाकर, जले अंग पर लगाएं। इससे काफी आराम मिलेगा।


नमक का घोल


जले अंग पर छाले न पड़े, इसके लिए नमक का गाना मोल तैयार करें। इसे छालों पर लगाएं। काफ़ी राहत मिलेगी। वदं तो कम होगा ही, छाले भी नहीं पड़ेंगे।


ग्वारपाठा (एलोवेरा) का गूदा


फासोले न पड़ें। छाले न बनें। इसके लिए ग्वारपाठा का गूदा लें। अच्छी प्रकार पीसें।जले अंग पर लगाएं। बहुत राहत मिलेगी।


घी का प्रयोग


जैसे ही कोई व्यक्ति अपना कोई अंग आग से जला बैठे, वह इस पर घी लगाता रहे। आराम पाएगा।


पिसा हुआ प्याज


कन्या प्यार लेकर, छीलकर, पीसकर जले हुए अंग पर लगाएँ । राहत पाएँगे। ऐसा बार-बार करें। छाते तो पड़ेंगे ही नहीं, बनता घाव भी ठीक हो जाएगा।


सरसों का तेल भी


यदि जले हुए अंग पर ओर कुछ भी लगाने को न मिले तो घर में सदा उपतपय रहने वाला सरसों का तेल बार-बार लगाते रहें। आराम पाएंगे।


पिसी, कच्ची गाजर


कच्ची गाजर को पीस लें। इसको जले हुए अंगों पर लगाएं। यह बहुत आराम देगी।


पिसी मेथी


जले अंग का उपचार करने के लिए दानेदार मेथी अंदाज से तें। इसे पानी में पीसें। मात्रा इतनी हो जाए कि जले अंग पर लेप हो सके। यह जलन को हटाएगी। छाले आदि नहीं होंने देगी।


शहद का प्रयोग


शरीर का कोई भी अंग जला हो, उस पर शहद लगाने से बड़ा आराम मिलता है। जलन घटती है, दाह नहीं रहती। फफोले नहीं होने पाते। यहाँ तक कि घाव हो जाने पर भी यह ठीक हो सकता है। जब तक पूरी तरह ठीक न हो जाए, शहद लगाते रहें।


सफेद दाग


यदि इलाज कोई भी किया हो, जले स्थान पर ठीक हो जाने के बाद सफ़ेद दाग रह जाएँ तो भी शहद लगातार लगाएँ। ये सफ़ेद दाग भी नहीं रहेंगे।

अब तक हम जले के घरेलू उपचारों की एक लम्बी लिस्ट जान गए हैं। मौके पर जो भी उपचार आसानी से मिले, उसी को प्रयोग में लाना चाहिए।


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शनिवार, 17 अप्रैल 2021

वमन, अम्लता तथा जलोदर के प्राकृतिक उपचार जाने

 वमन, अम्लता तथा जलोदर के प्राकृतिक उपचार जाने

वमन का उपचार

वमन यानि उल्टी आना देखने में कितना साधारण रोग लगता है। मगर जब यह बढ़ जाए तो परेशानी कर सकता है। अपच के कारण उल्टी, कोई बात नहीं। गर्भ ठहरनेका संकेत मान उल्टी, कोई बात नहीं। मगर जब इनकी तीव्रता बढ़ जाए। जब उल्टीके साथ खून भी आने लगे। या जब गर्भवती स्त्री को बेहद उल्टियाँ आने लगे। इन सब परेशानियों में बड़ी कठिनाई होती है। बात नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है। 



यहाँ हम कुछ अच्छे व आसान घरेलू उपचारों की चर्चा करते हैं।

इमली का रस

कोई 50 ग्राम इमली लें। इसे भिगोकर रखें। कुछ देर बाद इसको अच्छी तरह मय लें। छान कर रस निकालें। इसे एक गिलास पानी में मिलाकर रोगी को पिला दें। उल्टी आना रुक जाएगा।

लॉग का काढ़ा

लौंग पाँच अदद लें। कूटें। डेढ़ कप पानी लेकर इसे खूब उबालें। छानें। शक्कर डालें। इसे रोगी को पिलाकर सुला दें। रोगी सीधा या उलटा नहीं, बल्कि करवट लेकर सोए। यह एक खुराक है। ऐसी चार खुराकें। हर तीन घंटों बाद पीता रहे। इससे उल्टियाँ बंद हो जाएंगी। आराम मिलेगा।

शहद व लौंग

यदि कोई गर्भवती युवती बार-बार होने वाली उलटी से परेशान चल रही हो तो दो लौंग लें। इन्हें पीस लें। एक चम्मच शहद लें। इसमें यह पिसी लौंग मिलाएँ। चटाएँ। बार-बार की उल्टी आना बंद हो सकेगा।

धनिया का रस

उल्टियों रोकने के लिए हरा धनिया लें। इसको धोकर, रस निकालें। चार चम्मच रस रोगी को पिलाएं। उल्टी आना बंद होगा।

सूखा धनिया

सूखा धनिया पीस लें। इसे पानी में उबालें। अच्छी तरह उक्त जाने पर इसका रस पिलाएँ। उल्टी बंद होगी।

गर्भवती के लिए

1. ऊपर यताए धनिया के दोनों इलाज गर्भवती स्त्री के लिए भी उतने ही उपयोगी

हैं जितने अन्य उल्टी वाले रोगी के लिए।

2. गर्भवती बुबती को आने वाली उल्टियों या के का इलाज करने के लिए तीन

चम्मच चायल लें। इसे धोकर एक गिलास पानी में भिगो दें। 30 मिनट बाद

इन्हें हिला दें। इसमें एक छोटा चम्मच पिसा धनिया भी डाल दें। पंद्रह मिनट

तक मिगोए रखें। अब इन दोनों को पानी में अच्छी प्रकार मथ लें। छानें।

यह कै का इलाज है। इस एक गिलास पानी को तीन हिस्सों में पीना है।

हर बार डेढ़-डेढ़ घंटे का अंतरात रखें। कै नहीं होगी।

नारंगी का रस

उल्टियों लगें या के से गर्भवती परेशान हो। नारंगी का रत पिलाएँ। इससे उल्टी बंद हो जाती है। नारंगी खाने से भी यह रुक जाती है।

नींबू से उपचार

1. यदि उल्टी होने की प्रवृत्ति होने लगे। किसी का जी मिचालाने लगे। उसे नींबू

का एक टुकड़ा लेकर काली मिर्च, सेंधा नमक के साथ चूसना चाहिए। आराम

मिलेगा। उल्टी आएगी ही नहीं।

2. नींबू काटें। बीज निकालें। इसमें पिसी इसायची भरें। अब रोगी को चटाएँ।

उसको उल्टी आना बंद हो जाएगा।

3. यदि छोटा बच्चा दूध उलटता हो तो ऐसे बच्चे को पानी में कुछ बूंदें मिलाकर

पिला दें। बच्चा दूध उलटना छोड़ देगा।

4. नींबू काटकर बीज निकाल फेंके। अब इसमें काली मिर्च पिसी हुई तथा शक्कर

भरें। यदि रोगी इसे चाट ले तो उसकी उल्टी करने की प्रवृत्ति खत्म होगी।

5. नींबू का शर्बत बनाएँ। ठंडे पानी में शक्कर घोल लें। इसमें नींबू निचोड़ें।

इस एक गिलास शक्कर तथा नींदू मिले पानी को छान लें। रोगी को पिलाएँ।

जी खराब होना बंद होगा। जी मिचलाना बंद होगा। उल्टी आनी रुक जाएगी।

साँस भी सरल हो जाएगी।

6. उल्टी रोकने के लिए पोदीना पीस लें। रस निकालें। इस दो-तीन चम्मच रस

में आधा चम्मच नींबू का रस मिलाएँ। इसे पिलाने से उल्टी बंद हो जाएगी।

आँवले का मुरब्बा

यदि किसी युवती को के आती हो। किसी को उल्टी परेशान करती हो। इसे आँवले का मुरब्बा 30 ग्राम एक समय, हर दो घंटों बाद खिलाते रहें। आराम मिलेगा।


अम्लता का उपचार

जिसका पाचन ठीक नहीं होगा। गैस बनेगी। छाती में जलन होगी। खड़े डकार आएँगे। उसे अम्लता का सामना करना पड़ेगा। इस रोग को घरेलू उपचारों से ठीक करना संभव है। अधिक वायु बनना भी बंद हो जाएगा।

दूध का सेवन

अम्ल पित्त का रोगी यदि सबसे सरल व सुलभ उपचार चाहे तो उसे दिन में चार बार आधा-आधा गिलास ठंडा दूध पीना चाहिए। इससे आराम मिलेगा। अम्लता नहीं रहेगी। कई दिनों तक जारी रखें।

केला, इलायची, चीनी

इस रोग से बचने के लिए, छुटकारा पाने के लिए केला लें। इसको छीलकर टुकड़े करें। इस पर पिसी इलायची तथा पिसी चीनी डालें-आधा-आधा चम्मच। मिलाकर खाने से अम्लता को आराम मिलेगा।

गाजर का रस

इस रोग को शांत करने के लिए दिन में दो बार गाजर का रस-एक-एक गिलास रोगी पीता रहे। चार-पांच दिनों में पूरा आराम महसूस करेंगे।

गरम पानी व नींबू

अम्लता से परेशान व्यक्ति यदि एक गिलास गरम पानी में नींबू निचोड़कर, दिन में दो बार पीता है तो उसे काफी राहत मिलेगी। अम्लता की शिकायत नहीं रहेगी।

प्याज व दही

अम्लता का रोग ऐसा नहीं जो ठीक न से सके। ऊपर अनेक उपचार लिखे हैं। इनमें

एक यह भी है कि एक कटोरी दही में एक सफेद प्याज़ काटकर डालें। इसे खाएँ। यदि रोगी इसे दिन में दो बार, पाँच दिनों तक लगातार खाता है तो यह रोग पूरी तरह खत्म हो सकेगा।

नारियल का पानी

यदि अम्लता के रोगी को नारियल का पानी उपलब्ध हो सके तो उसे यह दिन में तीन बार पीते रहना चाहिए। चार ही दिनों में रोग खत्म होगा।

भुना हुआ आलू

ऐसा रोगी गरम राख में या गरम रेत में आलू भूनकर खाया करे। यह (1) अम्लता दूर करेगा। (2) उसे खड़े डकार आना बंद होगा। (3) उसके पेट में गैस नहीं बनेगी।

लॉग चबाना

अम्लता का प्रभाव पूरी तरह खत्म करने के लिए रोगी खाना खाकर एक लौंग चूसें, चयाएँ और धीरे-धीरे रस निगलता रहे। दिन में दो बार।

मूली का रस

खट्टी डकारें न आएँ। गैस बननी बंद हो। छाती में जलन न हो। ताज़ा मूली का एक कप रस निकालें। इसमें पिसी मित्री एक-डेढ़ चम्मच डालें। इसे रोगी को पिला दें। पाँच दिनों तक यह उपचार जारी रखें। अम्लता का रोग नहीं रहेगा।


जलोदर का उपचार

जलोदर रोग को भी घरेलू उपचारों के साथ टीक करना संभव है। ऐसे क्या उपचार हैं, उनका वर्णन यहाँ दिया है


लहसुन का रस


एक छोटा गिलास ताज़ा पानी लें। इसमें एक चम्मच लहसुन का रस डालें। मिलाएँ । रोगी को पिलाएँ। यदि इसे एक सप्ताह तक नियमित पिलाएँ तो रोग ठीक होगा।


चना का काढ़ा

एक गिलास पानी में एक मुही काले चने धोकर उथालें। खूब उबालें। जब पानी आया बच रहे तो उतारें। इसे रोगी को पिलाएँ। इसे कम-से-कम 25 दिनों तक रोगी को अवश्य पिलाया करें। उसका जलोदर का रोग खत्म होगा।

करेले का रस

करेले का रस चार चम्मय निकालें। इसे एक बड़े कप पानी में मिलाएं। पिलाएं। एक

सप्ताह तक यह उपचार जारी रखें। आराम मिलेगा। जलोदर खत्म होगा।

कच्चा प्याज़

जलोदर के रोगी को कच्चा प्याज़ डीलकर, काटकर, बार-बार खिलाएँ। कम-से-कम तीन बार, एक-एक प्याज एक दिन में। सात दिनों तक यह जारी रखें।

कुछ और फल-सब्ज़ियाँ

जलोदर के रोगी को ठीक करने के लिए उसे निम्नलिखित सब्जियों, फल, दही आदि खिलाएँ।

1. खरखूजा खिलाएँ। पफा, पीला, मीय खरबूजा ।

2. गाजर का सेवन।

3. गाजर का रस।

4. प्याज, गाजर, खरखूजा काटकर, मिलाकर एक साथ खिलाएँ।

5. इन तीनों को मिलाकर एक छोटा गिलास रस पिलाएँ।

6. एक गिलास छाछ, प्रातः नाश्ते में पिलाएँ।

इस उपचार को एक सप्ताह तक करने से जलोदर का रोगी पूरी तरह ठीक हो सकता है। इन पृष्ठों में हमने बमन (उल्टी) को रोने, अम्लता को समाप्त करने तथा जलोदर से छुटकारा पाने के तरीके जान लिये हैं। ये सभी हमारे हित में हैं। इनको प्रयोग में लाएँ।


आप सभी का धन्यावद Gk Ayurved