Faundder And ,CEO

बुधवार, 19 मई 2021

प्रदर रोग का वर्णन प्रदर-रोग ( Wight Discharge ) आयुर्वेदिक इलाज

 स्त्री रोगों की चिकित्सा

प्रदर रोग Wight Discharge  का वर्णन 


प्रदर रोग के निदान-कारण

सभी जानते हैं कि स्त्रियों को हर महीने रजोधर्म होता है। जब स्त्रियों को रजोधर्म होता है, तब उनकी योनि से एक प्रकार का खून, चार या पाँच दिनों तक,बहता रहता और फिर बन्द हो जाता है। इसके बाद यदि उन्हें गर्भ नहीं रहता,अथवा उनको रजोधर्म बन्द हो जाने का रोग नहीं हो जाता, तो वह फिर दूसरे

महीने में रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से फिर चार-पाँच दिनों तक आर्तव या खून बहता है। यह रजोधर्म होना कोई रोग नहीं, बल्कि स्त्रियों के आरोग्य की निशानी है। जिस स्त्री को नियत समय पर ठीक रजोधर्म होता है, तो वह सदा हष्ट-पुष्ट और तन्दुरुस्त रहती है। मतलब यह, कि इस समय योनि से खून बहना रोग नहीं समझा जाता। हाँ, अगर चार-पांच दिनों से ज्यादा बराबर खून गिरता रहता है, तो औरत कमजोर हो जाती है एवं और भी अनेक रोग हो जाते हैं। इसका इलाज किया जाता है। मतलब यह है कि जब नाना प्रकार के मिथ्या आहार-विहार

से स्त्रियों की योनि से खून या अनेक रंग की, रक्त जैसी चीज, बहा करती है, तब कहते हैं कि स्त्री के प्रदर-रोग' हो गया है।


"भावप्रकाश' में लिया है, जब दुष्ट रज बहुत ही ज्यादा बहता है, शरीर टूटता है, अंगों में वेदना होती है, एवं शूल की-सी पीड़ा होती है, तब कहते हैं-'प्रदर-रोग'

"वैद्यरत्न' में लिखा है

अतिमार्गातिगमनं प्रभूत सुरणादिभिः।

प्रदरो जायते स्त्रीणां योनिरक्तस्बुतिः पृथुः।।

बहुत रास्ता चलने और अत्यंत परिश्रम और अति मैथुन करने से स्त्रियों को प्रदर-रोग होता है। इस रोग में योनि से खून बहता है।

'चरक' में लिखा है अगर स्त्री नमकीन, चरपरे, ख, गलन करने वाले,चिकने, अभिष्यन्दी पदार्थ, गाँव के और जल के जीवों का मांस, खिचड़ी, खीर, दही,सिरका और शराब प्रभृति को सदा या ज्यादा खाती है, तो उसकी वायु कुपित होती है और खून अपने परिमाण से अधिक बढ़ता है। उस समय वायु, उस खून को ग्रहण करके, गर्भाशय को रज बहाने वाली शिराओं का आनय ले कर, उस स्थान में रहने वाले आर्तव को बढ़ाती है। चिकित्सा शास्त्र-विशारद विद्वान, उसी बढ़े हुए वायु-संसृष्ट रक्त-पित्त को 'असग्दर' या 'रक्त-प्रदर' कहते हैं। 'वैद्यविनोद' में लिखा है

मद्यातिपानमतिमैथुनगर्भता-जीर्णध्वशोकगरयोग दिवातिनिद्रा।

स्त्रीणामसदरगदो भवतीति तस्य प्रत्युद्गतौ भ्रमरुजौ दवथुप्रलापौ।

दौर्बल्यमोहमदपाणयुगश्च तन्दा तृष्णा तथानिलरुजो बहुधा भवन्ति।वाताच्च पित्तकफर्ज त्रिविध चतुर्थ दोषोजवं प्रदररोगमिदं वदन्ति।।

बहुत ही शराब पीने, अत्यन्त मैथुन करने, गर्भपात होने या गर्भ गिरने, अजीर्ण होने, राह चलने, शोक या रंज करने, कृत्रिम विष का योग होने और दिन में बहुत सोने वगैरः कारणों से स्त्रियों को 'असग्दर' या 'प्रदर रोग' पैदा होता है। 

इस प्रदर-रोग के अत्यन्त बहने पर भ्रम, व्यथा, दाह-जलन, सन्ताप, बकवाद,कमजोरी, मोह, मद, पाण्डुरोग, तन्द्रा, तृष्णा और बहुत-से वात-रोग हो जाते हैं। यह प्रदर-रोग वात, पित्त, कफ और सन्निपात-इन भेदों से चार तरह का होता है।

'भावप्रकाश' में प्रदर रोग होने के नीचे लिखे कारण लिखे हैं(१) विरुद्ध भोजन करना। (२) मद्य पीना। (२) भोजन-पर-भोजन करना। (४) अजीर्ण होना। (५) गर्भ गिरना। (६) अति मैथुन करना। (७) अधिक राह चलना। (८) बगुन शोक करना। (९) अत्यन्त कर्षण करना। (१०) बहुत बोझ उठाना। (११) चोट लगना । (१२) दिन में सोना।

प्रदर-रोग की किस्में

प्रदर-रोग चार तरह का होता है-(१) वातग प्रदर। (२) पित्तज प्रदर) (३) कफज प्रदरा (४) सन्नितपातज प्रदर या त्रिदोषन प्रदर।

वातज प्रदर के लक्षण

अगर जातज प्रदर-रोग होता है, तो रूखा, लाल, झागदार, व्यथा-सहित, मांस के धोक्न-जैसा और थोड़ा-थोड़ा खून बहा करता है।

नोट-'चरक' में लिखा है-वातज प्रदर का खून झागदार, स्या, माँजसे अथवा अकेले लाल रंग का होता है। वह देखने में ढाक के काड़े के-से रंग का होता है। उसके साथ शूल होता है और नहीं भी होता है। लेकिन वायु-कमर, वंक्षण, इदय,पसली, पीठ में बड़े जोरों से वेदना या दर्द पैदा करती है। वातजनित प्रदर

में वायु का कोष प्रचलता से होता है और वेदना या दर्द करला वायु का काम है, इसी से यादी के प्रदर में कमर और पीत कौर: में बड़ा दर्द होता है।

पित्तज प्रदर के लक्षण

अगर पित के कारण से प्रदर-रोग होता है, तो पीला, नीला, काला, लाल और गरम खून बारम्बार बहता है। इसमें पित की वजह से दाह-जलन आदि पीड़ाएँ होती हैं।

नोट-बट्टी, नमकीन, खारी और गरम वस्तुओं का अत्यंत सेवन करने से चित्त कुपित होता और पित्तजनित या पित्त का प्रदर पैदा करता है। पित-प्रदर से खून कुछ-कुछ नीला, पीला, काला और आत्यन्त गरम होता है; बारम्बार पीड़ा होती और खून गिरता है। इसके साथ जलन, प्यास, मोह, अम और ज्वर—ये उपद्रव भी होते हैं।

कफज प्रदर के लक्षण

अगर कफ से प्रदर होता है तो कच्चे रस वाला, सेमल कौरः के गोद-जैसा चिकना, किसी कदर पाण्डु-वर्ण और तुच्छ धान्य के धवन के समान खून नहता है।

नोट–भारी प्रभृति चीजों के बहुत ही ज्यदा सेवन करने से कफ कुपित  होता और कफन प्रदर रोग पैदा करता है। इसमें यून पिच्छिल या लिलिया, पाण्डू रंग का, भारी, चिकना और शीतल होता है तथा श्लेष मिले हुए थन का स्राव होता है। पौड़ा कम होती है। पर अमन, अरुचि, हुल्लास, श्वास और खाँसी ये कफ के उपद्रव नजर आते हैं।

त्रिदोषज प्रदर के लक्षण

अगर त्रिदोष-सनिपात या वात-पित्त-कफ-जीनों दोषं के कोप से प्रदर-रोग होता है, तो शहद, पी और हरताल के रंग वाली मज्जा और शंख की-सी गन्ध बाल बन बहता है। विद्वान लेग इस चौधे प्रपर-रोग को असाध्य कहते है, अत: चतुर वैश को इस प्रदर का इलाज न करना चाहिए।

नोट-चरक' में लिखा है-जमाव होने, स्त्री के अत्यन कर पाने और

कर नष्ट होने से, यानी सब हेतुओं के मिल जाने से वात, पित और कर तीनों दोष कुपित हो जाते हैं। इन तीनों में वायु सबसे ज्यादा कुपित हो कर, असाध्य कफ का त्याग करती है, तब पित्त की तेजी के मारे, प्रदर का खून बदबूदार, लिबलिबा, पीला और जला-सा हो जाता है। बलवान वायु, शरीर की सारी वसा और मेद को ग्रहण कर के योनि की राह से घी, मज्जा और वसा के-से रंग वाला पदार्थ हर समय निकाला करती है। इसी वजह से उक्त स्त्री को प्यास, दाह और ज्वर प्रमृति उपद्रव होते हैं। ऐसी क्षीण-रक्त-कमजोर स्त्री को अंसाध्य समझना चाहिए।

खुलासा पहचान

वातज प्रदर में रूखा, झागदार और थोड़ा गरम खून बहता है।

पित्तज प्रदर में -पौला, नीला, लाल और गरम खून बहता है।

कफज प्रदर में सफेद, लाल और लिबलिबा स्त्राव होता है।

त्रिदोषज प्रदर में—बदबूदार, गरम, शहद के समान खून बहता है।

नोट-ध्यान रखना चाहिए, सोम रोग मूत्र-मार्ग में और प्रदर-रोग गर्भाशय में होता है। कहा है

सोमरूङ् मूत्रमार्गे स्यात्प्रदरो गर्भवमनि

अत्यन्त रुधिर बहने के उपद्रव

आगर प्रदर-रोग वाली स्त्री के रोग का इलाज जल्दी ही नहीं किया जाता, उसके शरीर से ही ज्यादा खून निकल जाता है, तो कमजोरी और बेहोशी आदि अनेक रोग उसे आ घेरते हैं। भावप्रकाश' और 'बंगसेन' प्रभृति ग्रन्थों में लिखा है

तस्यातिवृत्तो दौर्बल्यं अमोमूछां पदस्तृषा।

दाहः प्रलापः पाण्डवं तन्दा रोगश्च बातजाः॥

बहुत खून चूने या गिरने से कमजोरी, थकान, बेहोशी, नशा-सा बना रहना, जलन होना, बकवाद करना, शरीर का पीलापन, ऊँघ-सी आना और आँख मिचना तथा बादी के रोग-आक्षेपक आदि उत्पन्न हो जाते हैं।

डाक्टरी मत से प्रदर-कारण व निदान

साधारण तौर पर स्त्री की योनि में गर्भाशय, गर्भाशय-ग्रीवा तथा योनि की दीवारों से एक नाव निकलता रहता है, जो योनि की दीवारों को नम (हल्का गोला) बनाये रखता है। हल्के पीलेपन या सफेद या धान्य वर्ण का यह पतला पदार्थ एक विशेष प्रकार की गय लिए होता है। यों तो इसकी मात्रा बहुत कम या नहीं के बराबर होती है, लेकिन योनि को नाम रखने, और बाहर से भीतर आने वाले रोग-जनित जीवाणुओं को शक्ति-हीन बनाने के लिए पर्याप्त होती है। यह पदार्थं इन जीवाणुओं की उत्पत्ति और वृद्धि को भी रोकता है। मात्रा में बहुत कम होने के कारण अन्दर पहने जाने वाले कपड़ों पर कभी-कभी ही हल्का-सा दाग लगता है। युवावस्था (जपानी) में पैर रखने पर, गर्भकाल में, मासिक शुरू होने के कुछ पहले इस पदार्थ की मात्रा साधारणतया बढ़ जाती है। यही मात्रा यदि इतनी बढ़ जाये कि स्त्री के चलने-फिरने, दौड़ने, उठने-बैठने और काम करते वक्त अन्दर पहने जाने बले कपड़ों को गोला बनाये रख्ने तो 'प्रदर' कहाता है। साधारण बोल-चाल में इसे 'पानी गिरना' कहते हैं। क्योंकि इसमें खून नहीं मिला होता, इसलिए त्वेत-प्रदर' या 'सफेद-प्रदर' भी कहते हैं।

प्रदर के सामान्य कारण

अच्छा उपयुक्त भोजन न मिलना (कुपोषण), शारीरिक दुर्बलता, कमजोरी, खून की कमी (एनीमिया), लम्ये समय तक रहने वाली (दीर्घकालिक) बीमारियाँ, मानसिक (दिमागी) व्याधि, चिन्ता, तनाव, शोकादि। इनके अलावा योनि में किसी प्रकार के

रासायनिक पदार्थ दवाएँ, रखड़ के छल्ले, गर्भ निरोधक गोलियाँ या मासिक के समय योनि में कपड़ा, फाहा रखने से भी प्रदर होता है। 

कुछ अन्य कारण

गर्भाशय ग्रीवा की शोध, मस्सा, अर्बुद (ट्यूमर) और योनि संक्रमण—ऐसे कारण हैं जिनमें रक्त के साथ-साथ मवाद (पीव) भी आता है। योनि संक्रमण के अनेक कारणों में से दो का उल्लेख कर देना पाठकों के हक में अच्छा होगा। ये हैं-ट्राइकोमोनिएसिस (Trichomtoniasis) और मोनिलियासिस ( (Moniliasis)

ट्राइकोमोनिएसिस-एक विशेष जीवाणु 'ट्राइकोमोनस' द्वारा होने वाला प्रदर पतला, झागदार, प्रदाह या जलन पैदा करने वाला होता है। इस साव के निरन्तर बहने से भग प्रदेश में सूजन और खुजली होती, तथा पेशाब बार-बार और रुक-रुक कर होते हैं।

अब आइये जाने प्रदर-रोग ( Wight Discharge ) आयुर्वेदिक इलाज

(१) कैथ के पत्ते और वाँस के पत्ते बराबर-बराबर ले कर, सिल पर पीस कर लुगदी बना लें। इस लुगदी को शहद मिला कर खाने से तीव्र प्रदर-रोग भी नए हो जाता है। परीक्षित है।

👉👉इसे भी पढ़े दूध के गुण आयुर्वेद मे वर्णन

(२) ककड़ी के बीजों की मींगी १ तोले और सफेद कमल की पंखड़ी १ तोले ले कर पीस लें। फिर जीरा और मिश्री मिला कर सात दिन पियें। इस नुसखे से श्वेत-प्रदर आराम हो जाता है।

(३) काकजंघा की जड़ के रस में लोध का चूर्ण और शहद मिला कर पीने से श्वेत प्रदर नष्ट हो जाता है। परीक्षित है।

नोट-काकजंघा के पत्ते ओंगा या अपामार्ग-जैसे होते हैं। पौधा भी उतना ही ऊँचा, कमर तक होता है। नींद लाने को काकजंपा सिर में रखते हैं। काकजंघा का रस कान में डालने से कर्णनाद और बहरापन आराम होते और कान के कीड़े मर जाते हैं। केवल काकजंघा की जड़ को चावलों के धोवन के साथ पीने से पाण्डु-प्रदर शान्त हो जाता है।

(४) हुढारों की गुठलियां निकाल कर कूट-पीस लें। फिर उस चूर्ण को 'घी' में तल लें। पीछे 'गोपीचन्दन' पीस कर मिला दें। इसके खाने से प्रदर-रोग आराम हो जाता है। परीक्षित है।

(५) खिरनी के पत्ते और कैथ के पत्ते पीस कर घी में तल लें और खाय। इस योग से प्रदर-रोग आराम हो जाता है। परीक्षित है।

(६) कथीरिया गोंद रात को पानी में भिगो दें। सवेरे ही उसमें 'मिश्री' मिला कर पी लें। इस नुसखे से प्रदर-रोग, प्रमेह और गरमी-ये नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है।

नोट-काँटोल के पेड़ में दूध-सा या गोंद-सा होता है। उसी को

'कथीरिया गोंद' कहते हैं। काँडोल का वृक्ष सफेद रंग का होता है। इसके पत्ते बड़े और फूल लाल होते हैं। वसंत में आम-वृक्ष की तरह मौर आ कर फल लगते हैं। फल बादाम जैसे होते हैं। पकने पर मीठे लगते हैं। इसकी जड़ लाल और शीतल होती है।

(७) कपास के पत्तों का रस, चावलों के धोवन के साथ पीने से प्रदर-रोग, आराम हो जाता है।



आगर् आपका कोई प्रश्न् है तो आप हमें कमेंट या ईमेल कर सकते है

धन्यवाद Gk Ayurved