Faundder And ,CEO

सोमवार, 24 मई 2021

अजीर्ण-वर्णन अजीर्ण का आयुर्वेदिक उपचार

 अजीर्ण-वर्णन

   साधारण लक्षण 


सभी तरह के अजीरणों में ग्लानि होती है, शरीर और पेट भारी रहते हैं, पेट में शूल-से चलते हैं, अपान वायु नहीं सरकती यानी हवा रुक जाती है, कभी दस्त-कब्ज हो जाता है तो कभी अजीर्ण या बदहजमी के दस्त होते हैं, खट्टी-खट्टी हकारें आती हैं, खाने के बाद कय होती हैं या जी मिचलाता है। बस यही अजीर्ण की सीधी पहचान है। 

वैद्यविनोद' में लिखा..

 हैग्लानिवम्धप्रवृत्तिवाँ सामान्याजीर्ण लक्षणम। 

शर में ग्लानि या मल का अवगेध अथवा दस्तो का ज्यादा होना-अजीर्ण के धरगमान्य' लक्षण हैं। | भोजन पचने का लक्षण प्यास और भूख का अथवा शरीर हलका मालूम होना-ये जीर्णाहर या भोजन पचने के लक्षण हैं। 

अजीर्ण की किसें अजीर्ण ६ तरह के होते हैं :आम अरजीर्ण, (२) विद अजीर्ण, (३) विष्टद्य अजीर्ण, (४ शेष अजीर्ण, (५) दिनपाकी अजीर्ण, (६) प्राकृत अजीर्ण। कौन अजीर्ण किस तर होता है ? 

(१) कफ के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है। (२) पित्त के प्रकोष से विदाधाजीर्ण होता है। (३) वायु के प्रकोष से विष्टभाजीर्ण होता है। (४) रसे के शेष रहने, यानी रक्तादि रूप में परिणत ने होने से रसशेषाजीर्ण होता है। (५) दिन भर में भोजन न पचने से दिनपाकी अजीर्ण होता है। (६) स्वाभाविक या प्राकृत अजीर्ण स्वभाव से नित्य होता है। . 

अजीर्ण के कारण

(१) दैहिक कारण 

(१) बहुत जल पीना, (२) भोजन के समय के बाद भोजन करना, (३) मलमूत्रादि वेगों को रोकना, (४) रात को जागना, (५) दिन में सोना, ये पाँच तो देह से सम्बन्ध रखने वाले कारण हैं। 

 (२) मानसिक कारण 

(१) ईर्ष्या, (२) भय, (३) क्रोध, (४) लोभ, (५) शोक, (६) दीनता, और (७) मत्सरता-ये अजीर्ण के मानसिक कारण हैं। उपरोक्त दैहिक और मानसिक कारणों से, भोजन के समय किया हुआ स्वभाव के अनुकूल भोजन भी नहीं पचता; अजीर्ण हो जाता है। 

अजीर्णों के लक्षण 

(१) आम अजीर्ण के लक्षण

 इस अजीर्ण के होने से पेट और शरीर में भारीपन होता है, जी मिचलता है, गालों और आँखों पर सूजन आ जाती है। खट्टा, मीठा प्रभृति जैसा भोजन किया जाता है, उसी तरह की डकारें आती हैं।

 (२) विदग्ध अजीर्ण के लक्षण 

इस अर्जीर्ण में भ्रम, प्यास, मूर्च्छा, पित्त के अनेक रोग, धुएँ के साथ खट्टी डकारें, पसीना और दाह-ये लक्षण होते हैं। 

(३) विष्टब्ध अजीर्ण के लक्षण - 

इस अजीर्ण में शूल, अफारा, अनेक प्रकार की बादी की पीड़ायें, मल और अधोवायु का रुकना, शरीर का जकड़ जाना, मोह और देह में दर्द-ये लक्षण होते हैं। का" नोट--याद रखो, पहला कफ से, दूसरा पित्त से और तीसरा विष्टब्धाजीर्ण वायु के कोप से होता है। 

(४) रस-शेष अजीर्ण के लक्षण « 

इस अजीर्ण में अन्न में अरुचि, हृदय में जड़ता और देह में भारीपन होता है।

 (५) दिनपाकी अजीर्ण के लक्षण 

इस अजीर्ण वाले को रात-दिन में भोजन पचता है और इसमें अफारा और हड़-फूड़न आदि कुछ नहीं होता। 

(६) प्राकृत अजीर्ण 

यह अजीर्ण नित्य ही रहता है, क्योंकि स्वाभाविक है; विकृतिजन्य नहीं है। इसके पचाने के लिए 'सुश्रुत” ने ये उपाय लिखे हैं-

(१) भोजन करके सौ कदम टहलना, (२) बाईं करवट सोना, (३) अपने दिल को भाने वाले पदार्थों को छूना, देखना, सुनना, सूँघना और चखना; जैसे मनोहर कामिनियों पर हाथ फेरना, रूपवती स्त्रियों को या अन्य सुन्दर चीजों को देखना, गाना सुनना, फूल और इत्र आदि सूँघना तथा स्वादिष्ट पदार्थ चखना। यह अजीर्ण इन उपायों से पच जाता है। इसके लिए दवा की जरूरत नहीं। 

अजीर्ण के उपद्रव 

मूर्छा-बेहोशी, आनतान बकना, वमन, मुँह से लार गिरना, ग्लानि, भ्रम और मरण-ये अजीर्ण के उपद्रव हैं। 

नोट-मरण का यह मतलब है, कि अजीर्ण बहुत बढ़ जाने से मनुष्य को मार भी डालता है। 

अजीर्ण का असल कारण क्‍या हैं ? 

जो अनाप-शनाप नाक तक दूस-ठूस कर खाते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ उनके अपने वश में नहीं हैं, जो पशुओं की तरह खाते हैं, उनको अनेक रोग पैदा करने वाला अजीर्ण' होता है। 

 अजीर्ण की साधारण चिकित्सा 

(१) आमाजीर्ण में वमन करा देने से लाभ होता है। (२) विदग्धाजीर्ण में लंघन या उपवास से लाभ होता है। (३) विष्टब्धाजीर्ण में पसीना कराने से लाभ होता है। (४) रस-शेषाजीर्ण में भोजन से पहले दिन में सोने से, लाभ होता है। . 

विशेष आयुर्वेदिक चिकित्सा 

आमाजीर्ण की चिकित्सा

 (१) सेंधानोन १ तोला और बच २ तोला ले कर पीस लो और गरम जल में मिला कर रोगी को पिला दो और कय कराओ। कय में दूषित पदार्थ निकल जायँंगे और रोग आराम हो जायगा। यह वमनकारक दवा रोगी को उस हालत में दो, जबकि आमाशय बहुत भारी मालूम होता हो।

नोट--अजीर्ण में सबसे पहले अजीर्ण पैदा करने वाले कारणों को त्याग दो। बिना कारण त्यागे, अजीर्ण कभी आराम न होगा। सभी अजीर्णों में उपवास करना सर्वोत्तम उपाय है। विशेष कर, आमाजीर्ण की पहली हालत में तो लंघन हितकारी है। परन्तु बालक, बूढ़े और दुर्बलों को उपवास कराना अच्छा नहीं। उनको, उनकी प्रकृति के अनुसार, हल्का और थोड़ा भोजन देना उचित है। अजीर्ण में क्या-क्या पथ्य और अपथ्य हैं, यह हमने आगे लिखा है। जो पथ्य हो उसके देने में हानि नहीं; पर विचार की सर्वत्र दरकार है। 

(२) धनिया और सोंठ का काढ़ा पीने से आमाजीर्ण शान्त होता है, शूल नष्ट होता है और मूत्राशय साफ होता है। 

(३) दिन में चार बार गर्म जल पीने से आमाजीर्ण में लाभ होता है। 

(४) सोंठ और सौंफ-दोनों को बराबर-बराबर ले कर, पीस-कूट-छान कर और मिश्री मिला कर, सेवन करने से आमाजीर्ण शान्त होता है। 

(५) सौंफ, पोदीना, गुलाब के फूल, तेजपात और बड़ी इलायबी-सबको तीन-तीन माशे ले कर, एक सेर जल में पका कर रख लो। उसी में से ज़रा-जरा-सा जल पीने से आमाजीर्ण नष्ट होता है। 

(६) हींग, सेंधानोन, सोंठ, कालीमिर्च और पीपल--इनको बराबर-बराबर ले कर, जल के साथ सिल पर पीस कर, लेप-सा बना लो और पेट पर बारम्बार इसी का लेप करो। इससे आमाजीर्ण की पीड़ा शान्त हो जायगी। 

(७) छोटी हरड़, सोंठ, नागकेसर और कालानोन-इनमें से प्रत्येक को चार-चार माशे ले कर, पाव-भर जल में पीस कर, जरा सी हींग डाल कर दिन में कई बार, जरा-जरा-सा पीने से आमाजीर्ण शान्त होता है। 

(८) बड़ी इलायची ३ माशे, दालचीनी ६ माशे, नागकेसर ९ माशे, काली-मिर्च १२ माशे, पीपल १५ माशे और सोंठ १८ माशे-इन सबको एकत्र कूट-पीस कर चूर्ण बना लो। इसको दिन में २-३ बार सेवन करने से आमाजीर्ण नष्ट हो जाता है। 

(९) सज्जीख़ार, जवाख़ार, कालानोन, साँभरनोन, सेंधानोन, कचियानोन, बिड़नोन, भुना सुहागा, आमलासार गन्धक, सोंठ, मिर्च, पीपलामूल, चीता, अजवायन और बायबिड़ंग-इन सब दवाओं को समान भाग ले कर, कूट-पीस लो और पीछे आक के पत्तों के रस में खरल करो। इसके बाद सेंहुड़ या थूहर का एक डण्डा पोला करके, उसमें खरल किये चूर्ण को भर दो और ऊपर से कपड़-मिट्टी चढ़ा दो। इसके बाद २५ उपलों की आग में उस कपड़-मिट्टी चढ़े डण्डे को रख कर पकाओ। जब आग ठण्डी हो जाय, निकाल लो। डण्डे के ऊपर की मिट्टी उतार कर, डण्डे में से दवा को निकाल लो। इस नमक के सेवन करने से आमाजीर्ण और हर प्रकार के अजीर्ण नष्ट होते हैं। मात्रा--४ रत्ती। अनुपान--माठा या दही का तोड़। 

(१०) शुद्ध मीठा विष १ भाग, सोंठ २ भाग, कालीमिर्च ३ भाग और पीली कौड़ी की भस्म ४ भाग-इन सबको कूट-पीस, खरल में डाल, जम्भीरी नीबू के रस में, उड़द के दाने-बराबर गोलियाँ बना लो। इनको सेवन करने से अजीर्ण नष्ट होता और तत्काल भूख लगती है।  मात्रा-२ या ३ गोली। अनुपान-ताजा जल। 

नोट-ये सब नुसखे परीक्षित हैं। 

विदग्धाजीर्ण की चिकित्सा 

(११) लिख चुके हैं कि विदग्धाजीर्ण में लंघन उपकारी है, पर बहुधा इसमें शीतल जल पीने से भी लाभ होता है। अत: दिन में कुछ न खा कर, केवल थोड़ा-थोड़ा शीतल जल पीना चाहिए। इस अजीर्ण में गुलकन्द-गुलाब प्रभृति से हल्का दस्त करा देना भी अच्छा है। लिखा है-


श्लैष्मिके वमनं पूर्व पैत्तिके मृदु रेचनम्‌। वातिके स्वेदन॑ चाथ यथावस्थं हित॑ च तत्‌॥ 

कफ से उत्पन्न मंदाग्नि या अजीर्ण में पहले वमन करानी चाहिए। पित्त से उत्पन अजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए और बादी से हुए अजीपर्ण में स्वेदन कर्म, बफारा या सेक वगैरः करना चाहिए अथवा जिस समय जैसी अवस्था हो और जो काम उस अवस्था में हितकारी हो, वही करना चाहिए। कहीं लघन से काम हो जाता है, क्रहीं शीवल जल के पीने से और कहीं हलके जुल्गब से। चिकित्सा करने में विचार्बुद्धि और तर्क से क्षण-क्षण॑ पर काम लेना चाहिए। किसी एक ही कायदे को प्रकड़ कर अन्धाधन्ध काम करने से हानि की सम्भावना रहती है।

(१२) सफेद जीरा ४ माशे, सफेद इलायची ४ माशे, सूखा अनारदाना ४ माशे, आल-बुखारा ४ माशे और मुनक्का (बीज निकाला) ४ माशे--इन सबकों एक जगह पीस कर और थोड़ा सेंधानोन मिला कर सेवन करने से पित्त की 'विदश्धाजीर्ण नष्ट होता है। 

(१३) धनिया ४ माशे, इलायची ४ माशे, गुलाब की केसर ४ माशे और सौंफ ४ माशे-सबको पीस कर, इनके वजन के बराबर मिश्री मिला लो। इस चूर्ण को शीतल जल के साथ सेवन करने से पित्त का 'विदग्धाजीर्ण” आराम होता है। 

(१४) छोटी हरड़ का चूर्ण १ माशे, दाख २ माशे, मिश्री ४ माशे और शहद ६ माशे-इन सबको पीस कर और शहद में मिला कर चाटने से पित्त का विदग्धाजीर्ण नष्ट होता है। 

(९५) सोंठ ५ माशे, जीरा ४ माशे, छोटी इलायची ३ माशे, कालीमिर्च २ माशे, पीपल १ माशे और शुद्ध आमलासार-गन्धक ९ माशे-सबको एक जगह मिला कर पीस लो और फिर खरल में डाल कर नीबू का रस दे-दे कर चार-चार रत्ती की गोलियाँ बना लो। एक-एक गोली सुबह-शाम या दिन में ३-४ बार खाने से विदग्धाजीर्ण” और सब तरह के अजीर्ण नष्ट हो जाते हैं। 

(६) बड़ी इलायची का चूर्ण और मिश्री मिला कर तीन-तीन माशे की _ मात्रा से सेवन करने से पित्त का अजीर्ण नष्ट होता है। 

(९७) पोदीना ४ माशे, अम्लवेत ४ .माशे, छोटी इलायची ४ माशे, दाल-चीनी ३ माशे और तालीसपत्र ३ माशे-इन सबको एकत्र कूट-पीस लो और चूर्ण के बराबर मिश्री मिला दो। इस चूर्ण का सेवन करने से पित्त का विदग्धाजीर्ण! नष्ट होता है। 

(१८) नीबू, नारंगी और अनार प्रभूति फलों का सेवन करने से भी विटग्धाजीर्ण नष्ट हो जाता है। 

 मन्दाग्नि और अजीर्ण में पथ्य 

 कफ से उत्पन्न मन्दाग्नि और अजीर्ण-आमाजीर्ण में, नमक मिले गरम जल से वमन करानी चाहिए। पित्त से उत्पन्न विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए और वातज अजीर्ण-विष्टब्ध-अजीर्ण-में स्वेदकर्म-बफूरे प्रभृति से काम लेना चाहिए। अथवा समय पर जैसी जरूरत हो, विचार कर काम करना चाहिए। अजीर्ण की पहली अवस्था में उपवास करना सबसे अच्छा उपाय है। 

 नोट-जहाँ तक हो, जुलाब न देना ही अच्छा है। हाँ, एक दस्त साफ करा देना बुरा नहीं। अजीर्ण में नीचे लिखे आहार और विहार पथ्य या हितकारी हैं:-कसरत, कुश्ती, मिहनत, हल्के और अग्नि प्रदीप्त करने वाले भोजन, बहुत पुराने महीन लाल चावल, यवागू, लाजामंड-खीलों का माँड, मूँग का रस, मदिरा, शाली चावल, बथुआ, छोटी मूली, लहसन, पुराना पेठा, नवीन केले की फली, सहँजना, करेला, परवल, बैंगन, ककोड़ा, ख़स का सुगन्धित जल, आमला, नारंगी, अनार, पापड़, अम्लवेत, जंभीरी नीबू, बिजौरा नीबू, शहद, माठा, काँजी, हींग, नमक, सोंठ, अजवायन, मिर्च, मेथी, धनिया, जीरा, पान, गर्म जल (विदग्धाजीर्ण में शीतल जल), कड़वे और चरपरे रस, बारली, अरारूट और साबूदाना प्रभृति हल्के पदार्थ। मोंठ की दाल में पिसी हुई सोंठ और भुनी हुई हींग डाल कर खाने से पेट का दर्द और अफारा मिटता है। 

भुनी हुई मोंठ नमक-मिर्च लगा कर खाने से शीघ्र ही पच जाती और रुचि बढ़ाती है। 

पहली अवस्था में उपवास करने से, जब अजीर्ण के दोष शान्त हों,रोगी को . साबूदाना, बारली या अरारूट पका कर दो। जब अग्नि बढ़े, सवेरे के भोजन में पुराने चावल का भात, परवल का साग, कच्चे केले की तरकारी, मसूर की दाल, माठा, कागजी नीबू और अदरख के टुकड़े नमक लगा कर दो। शाम के भोजन या ब्यालू में, यदि भूख लगी हो, तो साबूदाना या बारली अथवा और कोई हल्का खाना दो। अगर खूब भूख लगने लगी हो और अजीर्ण न हो, तो आटे में 'अजवायन और नमक' डाल कर पतली-पतली पूरियाँ बना दो और साग तोरई या परवल का दो। रोगी से कह दो; कि भोजन में लोटे-के-लोटे जल न चढ़ा जाये बल्कि उतना ही जल पिये, जितने से गले का ग्रास उतर जाय। वह भी उस दशा में, जब पानी बिना रहे ही नहीं। इस रोग में जितना ही थोड़ा जल पिया जाय, उतना ही अच्छा। हो सके तो खाना खाने के घण्टे-दो-घण्टे या तीन घण्टे बाद थोड़ा-थोड़ा जल पिया जाय। सवेरे, तारों की छाया में, पेट-भर शीतऊू जल पीना अच्छा है। 

राजमण्ड 

चावलों के गरम माँड में' हींग और संचरनोन मिला कर पिलाने से विषम 

और मन्द अग्नि पूर्ण रूप से बढ़ती है। 

८-८ तोले मूँग या चावलों को ३२ तोले जल में पकाओ। जब यह पक जाय, माँड को पसा लो और उसे गाय के घी में भून लो। इसके बाद उसमें भुनी हींग, सेंधा नोन, सोंठ, मिर्च, पीपर और धनिया-इन सब का एक माशा चूर्ण मिला दो और खूब स्वच्छ चमकदार चाँदी या काँच के बर्तन में रख कर, एक चतुरा विलासिनी कामिनी के हाथ में दे कर रोगी के पास भेज दो। वह स्थान निर्जल, निर्वात और निर्जन हो; यानी वहाँ न तो कोई आदमी हो, न बाहरी हवा आती हो और न जल हो। वह स्त्री रोगी के पास जा कर, मधुर-मधुर कटाक्ष करती हुई, रोगी को उस अमृत-तुल्य माँड के बर्तन को प्रेम से दिखाये। अगर इस तरह राजमण्ड पिया जाय, तो वह अग्नि दीप्त करके तीनों दोषों को हरेगा। कहा है :-

किचित्कटाक्षं सा दत्वा सुंधातुल्य॑ प्रकाशयेत्‌। ततः पिवेद्राजमण्ड दोषत्रयविनाशनम्‌।। 


मन्दाग्नि और अजीर्ण में अपथ्य

मन्दाग्नि और अजीर्ण में नीचे लिखे हुए पदार्थ या आहार-विहार अपथ्य या हानिकारक हैं :-। 


जुलाब लेना (पित्त के विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब बुरा नहीं), मल, मूत्र और अधोवायु के वेगों को रोकना, भोजन-पर-भोजन करना, यानी बिना एक भोजन पचे टूसरा भोजन करना, रात में जागना, मैथुन करना, तेल लगाना, स्नान करना, कभी कम और कभी अधिक खाना, कभी किसी समय और कभी किसी समय भोजन करना और खून निकालना। 

दाल के अनन-मूँग, मोंठ, उड़द, चना वगैर:, मछली, मांस, बहुत जल पीना, पोई का साग, लालमिर्च, पिट्ठी के पदार्थ, घी में पके पदार्थ, तत्काल ब्याई गाय का दूध, विकृत दूध, या घी में पके हुए चावल, दूध, खोया, इमली आदि का पना या और पतले पदार्थ, ईख-रस, ताड़-फल की मींगी, नारियल, धनिया, नेत्रबाला, - ख़राब या गन्दा पानी, अपनी प्रकृति के विरुद्ध अन्न और जल, भारी और देर में हजम होने वाले पदार्थ, भूने-सेके पदार्थ, दाख-मुनक्का या अन्य दस्तावर पदार्थ। 

उड़द मन्दाग्नि रोग में महा अपथ्य हैं; क्योंकि यह पहले दर्जे के गरिष्ट हैं। उड़द की पिट्ठी के लड्डू ताकतवर होते हैं, पर मन्दाग्नि वाले के लिए हानिकारक हैं। ज्वर, वात-प्रकृति वाले और मन्दाग्नि वाले को उड़द नुकसानमन्द और अफारा करने वाली है। 


आगर् आपका कोई प्रश्न् है तो आप हमें कमेंट या ईमेल कर सकते है

धन्यवाद Gk Ayurved