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मंगलवार, 18 मई 2021

मूत्रकृच्छ रोग-वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 मूत्रकृच्छ रोग-वर्णन 

मूत्रकृच्छ किसे कहते हैं--जिस रोग में पेशाब बड़ी तकलीफ के साथ होता है, उसे मूत्रकृच्छ कहते हैं। अँगरेजी मे इसे Dysuria कहते हैं। 


मृत्रकृच्छ का सामान्य लक्षण--मूत्रकृच्छू रोग होने से पेशाब बड़ी तकलीफ के साथ बूँद-बूँद अथवा कच्चे खून के साथ थोड़ा-थोड़ा उतरता है। नाभि या सूंडी के नीचे, जाँघों में और मूत्र-नली में बड़ी वेदना होती है। मूत्रकृच्छू के यही सामान्य लक्षण हैं। 


मूत्रकृच्छु और मूत्राघात में भेद--मृत्रकृच्छ और मूत्राघात दोनों ही पेशाब के रोग हैं, दोनों में ही पेशाब के समय तकलीफ़ होती है, फिर दोनों में फर्क क्या है ? मृत्रकृच्छ में पेशाब की रुकावट थोड़ी देर तक रहती है और मूत्राघात में पेशाब की रुकावट बहुत ही ज़्यादा देर तक रहती है। मूत्रकच्छु में पेशाब करते समय बहुत ही ज़्यादा तकलीफ़ होती है, परन्तु मूत्राघात में पेशाब करते समय बहुत ही कम तकलीफ़ होती है। मतलब यह है कि मूत्रकृच्छु की अपेक्षा मूत्राघात में पेशाब करते समय दर्द कम होता है। मूत्राघात में पेशाब रुक-रुक कर थोड़ाथोड़ा होता है या बन्द ही हो जाता है किन्त मूत्रकृच्छ में पेशाब इतनी देर नहीं रुकता। 


मूत्रकृच्छु के निदान--बहुत ही ज़्यादा कसरत करने, राई आदि तीक्ष्ण यदार्थ या तीक्ष्ण दवा खाने, रूखा अन्न खाने, रूखी शराब पीने, बहुत नाचने, घोड़ा आदि की सवारी करने और उन्हें बहुत दौड़ाने, बरसात में पानी में डूबे हुए स्थानों के जानवरों का मांस खाने अथवा अनूप देश की मछलियों का मांस खाने, भोजन पर भोजन करने, अजीर्ण होने और मल-मूृत्रादि के वेग रोकने से मूत्रकृच्छु-रोग पैदा होता है। यह रोग आठ तरह का होता है।' 


मूत्रकृच्छ की किस्में--मूत्रकृच्छू रोग आठ तरह का होता है-


(१) वातज, (२) पित्तज, ( 3 ) कफज, (४) सन्निपातज, (५ ) आगन्तुक, (६) पुरीषज, ( ७) अश्मरीज, ( ८ ) शुक्रज।


वातज मूत्रकृच्छ के लक्षण-- वातज मूत्रकृच्छ के होने से दोनों वंक्षण या पट्टों, पेडू या मूत्राशय और लिंग में अत्यन्त वेदना होती और बारम्बार थोड़ा-थोड़ा पेशाब होता है। पित्तज मूत्रकृच्छ के लक्षण--पित्तज मृत्रकृच्छु में दर्द और जलन के साथ बारम्बार पीला या लाल पेशाब आता है। 


> नोट--भावप्रकाश में लिखा है, बारम्बार, पीला, खून मिला हुआ, वेदना और जलन के साथ पेशाब होता है। 


कफज मूत्रकृच्छु के लक्षण--  कफज मूत्रकृच्छ में लिंग या पेडू में भार या बोझासा मालूम होता है। सूजन होती है और पेशाब चिकना-सा या लिबलिबा-सा होता है। 


सन्निषातज मूत्रकृच्छु के लक्षण--  त्रिदोषज मूत्रकृच्छू में ऊपर लिखे हुए तीनों दोषों के लक्षण मिलते हैं। 


आगन्तुक मूत्रकृच्छ के लक्षण--  पेशाब बहाने वाली नली में चोट वगैरे लगने से लगने से घाव हो जाने और मुट्ठी वगैरे की चोट लगने से जो रोग होता है, उसे आगन्तुक या शल्यज मूत्रक॒च्छ कहते हैं। इसमें मृत्यु के समान घोर वेदना होती है। इस मृत्रकृच्छु के लक्षण वातज मृत्रकुच्छ के जैसे होते हैं।


पुरीषज मूत्रकृच्छ के लक्षण-- मल का वेग रोकने से दूषित हुई वायु पेट में 

अफारा करती है और पेशाब करते समय शूल चलते हैं। 


अश्मरीज मृत्रकृच्छु के लक्षण-- पथरी होने से जो मूृत्रकृच्छ होता है, उसे अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ या पथरी का मूत्रकृच्छु कहते हैं। छाती में दर्द, कम्प, कोखशुल, मन्दाग्नि, मूर्छा दारुण मूत्रकृच्छ--ये पथरी या शर्करा के उपद्रव हैं। 


> नोट--सुश्रुत में शर्कराजन्य मूत्रकृच्छ नवाँ लिखा है; लेकिन और आचार्यों ने आठ की गिनती रखने के लिए शर्करा के मूत्रकृष्छु को अलग नहीं लिखा। फिर पथरी और शर्करा में विशेष भेद भी नहीं है। पित्त से पक कर, वायु से सूख कर और कफ के संयोग से पथरी बनती है। मूत्र, वीर्य और कफ के समुदाय को पथरी कहते हैं। जब वही पथरी कफ के संयोग से छूट कर, मूत्र-मार्ग से had के रूप में झरने लगती है, तब उसे शर्करा या कंकरी कहते हैं। 


 सुक्रज् मृत्रकृच्छ के लक्षण-- दूषित वीर्य के मूत्राशय में रहने मे रहने से सुक्रज् मृत्रकृच्छ होता है। इस रोग में पेडू और लिंग में शूल के समान दर्द होता है और बड़े कष्ट से पेशाब होता है। 


'भावप्रकाश' में लिखा है, वीर्य के दोष से दूषित हो कर मूत्र-मार्ग सिकुड़ जाता है, तब पेशाब थोड़ा-थोड़ा होता है, मृत्र के साथ वीर्य निकलता है और मूत्राशय तथा लिंग में दर्द होता है। 


आईये अब जाने मृत्रकृच्छ के आयुर्वेदिक उपचार


(१) हुलहुल के ६ माशे बीज 'बासी पानी में” पीस-छान कर और पीने से सब तरह के असाध्य मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं।* 


(२) तीन माशे जवाखार और चीनी मिला हुआ सफ़ेद कुम्हड़े का एक तोला रस पीने से सब तरह के मूत्रकृष्छ आराम हो जाते हैं। परीक्षित है। 


(३) माठे के साथ ४ माशे शुद्ध गन्धक खाने से सब तरह के मृत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं। 


(४) ६ माशे जवाखार और १ तोले शहद मिला कर खाने से सब तरह के मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है। 


(५) fata की जड़ का काढ़ा पीने से सब तरह के मूत्रकृच्छु नष्ट हो जाते हैं। 


(६) खीरे के बीज और तिल--एकत्र पीस कर घी और दूध के साथ पीने से समस्त मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं। 


(७) इलायची, पाषाणभेद, शुद्ध शिलाजीत, पीपर, खीरे के बीज, सैंधानोन और केसर--इनको समान-समान ले कर पीस छान लो। इसमें से ४ या ६ माशे चूर्ण ‘aac के धोवन' के साथ खाने से मरता हुआ मूत्रकृच्छु रोगी भी आराम हो जाता है। 


> नोट--इलायची, फाषाणभेद, शुद्ध शिलाजीत और पीपर--इन सब का चूर्ण चावलों के धोवन के साथ लेने से भी मरता हुआ मूत्रकृच्छू-रोगी आराम हो जाता है। 

(८) लोहे की भस्म महीन पीस कर और शहद में मिला कर ३ दिन खाने से मृत्रकृच्छ रोग निश्चय ही आराम हो जाता है। इसमें ज़रा भी शक नहीं। 


(९) कतेरी का सोलह तोले रश 'शहद' मिला कर पीने से मूत्रकृच्छ नष्ट हो कर सुख होता है। परीक्षित है। 


(१०) हरड़, बहेड़े और आमले को पानी के साथ सिल पर पीस लो । फिर इसमें बेरों की मींगी और सैंधानोन मिला कर पी लो। इससे भी मूत्रकृच्छु आराम हो जाता है। 


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