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रविवार, 23 मई 2021

हिचकी-रोग का वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 हिचकी-रोग का वर्णन

निदान-कारण 

दाहकारक--छाती और कण्ठ में जलन करने वाले, भारी, अफारा करने वाले, रूखे और अभिष्यन्दी पदार्थ खाने, शीतल जल पीने, शीतल अन्न खाने, शीतल जल में नहाने, धूल और धुआओँ के मुँह और नाक में जाने, गरमी और हवा में घूमने-फिरने,कसरत-कुश्ती करने, बोझ उठाने, बहुत राह चलने, मलमूत्रादि के वेग रोकने और उपवास-ब्रत करने से मनुष्यों को हिचकी, श्वास और खाँसी रोग होते हैं। 


नोट--.सुश्रुत में लिखा है.. कि आम-दोष, छाती वगैर: में चोट लगने, क्षय रोग की पीड़ा, विषम भोजन करने, भोजन-पर-भोजन करने वगैर: से हिचकी, श्वास और खाँसी की उत्पत्ति होती है। 

सामान्य लक्षण 

'प्राण और उदान जायु' कुपित हो कर, बआरम्बार ऊपर की तरफ जाती है। इससे हैक हिक शब्द के साथ वायु निकलती रहती है। 

हिचकी के भेद '

वायु' कफ से मिल कर पाँच तरह की हिचकियाँ पैदा करती है-(१) अन्नजा, (२) यमला, (३) क्षुद्रा, (४) गम्भीरा, (५) महती।

 पूर्वरूप 

हिचकी रोग होने से पहले कण्ठ और हृदय भारी रहते हैं, बादी से मुँह का स्वाद कसैला रहता है, कोख में अफार रहता या पेट में गुड़गुड़ शब्द होता है। 

अन्नजा हिचकी के लक्षण

 अनाप-शनाप खाने-पीने से 'वायु” अकस्मात कुपित हो कर ऊपर की तरफ जा कर अन्नजा नाम की हिचकी पैदा करती है। 

नोट--जल्दी-जल्दी बहुत ही ज़्यादा खाने-पीने से, आमाशय की वायु हठातू 

कूपित हो जाती है और ऊपर की राह से निकलती है। उसके निकलने से हिगू-हिग्‌ आवाज होती है, उसे ही 'हिचकी' कहते हैं। चूँकि यह हिंचकी अन्न के ज़्यादा खाने से होती है, अतः इसे अन्नजा यानी अन्न से पैदा हुई हिचकी कहते हैं। इस हिचकी की दवा-दारु नहीं करनी पड़॒ती। यह चन्द मिनट में आप ही शान्त हो जाती है। 

यमला हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी सिर और गर्दन को कॉँपाती हुई दो-दो बार निकलती है अथवा रुक-रुक कर दो-दो हिचकियाँ आती हैं और उनके आने से सिर और गर्दन काँपते हैं, उन्हें 'यमला' कहते हैं। शक्षः नोट--यमला शब्द का अर्थ दो है, इसी से इसे 'यमला' कहते हैं, क्योंकि एक बार में दो-दो हिचकियाँ आती हैं। यमला हिचकी कष्टसाध्य होती है, पर कभी-कभी असाध्य भी हो जाती है। इसके साथ प्रदाह्, दाह, प्यास और मूर्च्छा का होना घातक है।

क्षुद्रा हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी कंठ और हृदय के समन्धि-स्थान से पैदा होती तथा मन्दे वेग और देर से निकलती है ठसे ' धुद्रा' कहते हैं। 

नोट--्रुद्रा हिचकी देर-देर में और धीरे-धीरे ठठती है। यह सुखमाध्य होती है। कहते हैं, यह जत्रु-मूल अर्थात्‌ काँख और हृदय की सन्धि से उठती है। 

गंभीरा हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी नाभि के पास से उठती है, घोर गंभीर शब्द करती है और जिस के साथ प्यास, श्वास, पसली का दर्द और ज्वर आदि नाना ठपद्रव होते हैं, ठसे 'गंभीरा' कहते हैं। 

नोट--यह हिचकी रोगों के अन्त में प्राय: उपद्रव-रूप से होती है। बहुत करके अन्तिम काल में पैदा होती और मनुष्य को मार डालती है। यह असाध्य समझी जाती है। 

महती हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी वस्ति--पेडू, हदय और मस्तक आदि प्रधान मर्म-स्थानों में पीड़ा करती हुई, शरीर के सब अंगों को कँपाती हुई, लगातार चलती रहती है, उसे “महती” या “महाहिक्का' कहते हैं। 

नोट--इस हिचकी में पेडू, हदय और मस्तक आदि मर्म फटते-से जान पड़ते हैं और हिचकी का तार नहीं टूटता। यह हिचकी भी प्राय: रोग के उपद्रव के तौर पर, अन्तकाल में पैदा होती और मनुष्य को मार डालती है। 

असाध्य लक्षण 

गम्भीरा और महाहिक्का पैदा होने से रोगी की मृत्यु में सन्‍्देह करना वृथा है, यानी अवश्य मृत्यु होती है। इसके सिवा और हिचकियों में भी रोगी का शरीर फैल जाय, तन जाय, नजुर ऊपर की तरफ ज़्यादा रहे, नेत्र खड्डों में घुस जाये, देह क्षीण हो जाय और खाँसी चलती हो, तो रोगी के बचने की उम्मीद नहीं। जिस हिचकी में रोगी की देह तन जाय, दृष्टि ऊँची हो जाय, मोह या बेहोशी हो, रोगी क्षीण हो जाय, भोजन से अरुचि हो और छोंक ज़्यादा आयें, उस हिचकी वाला रोगी आरोग्य लाभ नहीं करता। जिस रोगी के वातादि दोष अत्यन्त सज्चित हों, जिसका अन्न छूट गया हो, जो दुबला हो गया हो, जिसकी देह नाना प्रकार की व्याधियों से क्षीण हो रही हो, जो बूढ़ा हो और जो बहुत ही ज़्यादा मैथुन करने वाला हो--ऐसे आदमी के कोई एक हिचकी पैदा हो कर प्राणनाश करती है। अगर यमला हिचकी के साथ प्रलाप, दाह, प्यास और बेहोशी हो, तो यह भी प्राण नष्ट करती है। जिस रोगी का बल क्षण न हो कर मन प्रसन्न हो, जिसकी धातुएँ स्थिर हों और इन्द्रियों में भरपूर ताकत हो--वह यमला हिचकी वाला आराम हो सकता है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों-वाला आराम हो नहीं सकता। 

हिचकी की भयंकरता 

यों तो हैजा और सन्निपात ज्वर आदि अनेक रोग-प्राण नाशक हैं, पर श्वास और हिचकी-रोग जैसी जल्दी मनुष्य के प्राण नाश करते हैं, वैसी जल्दी और रोग प्राण-संहार नहीं करते। अतः हिचकी और श्वास में गफ़लत हरगिजु न करनी चाहिये। 

हिचकी-चिकित्सा में याद रखने योग्य बातें 

(१) जो औषधि या अन्न-पान “कफ और वायु' को हरने वाले, गरम और वायु को अनुलोमन करने वाले हों--वे सब श्वास और हिचकी में हित हैं। 


(२) हिचकी और श्वास-रोगी के शरीर में पहले तेल की मालिश करनी चाहिये। इसके बाद स्वेदन-क्रिया यानी पसीने को निकालने के उपाय करने चाहिये तथा वमन ओर विरेचन कराना चाहिये। लेकिन अगर हिचकी और श्वास-रोगी कमज़ोर हों, तो वमन-विरेचन न करा कर रोग-नाशक औषधि दे देनी चाहिये। 

सुश्रुत में लिखा है -

विरेचनं पथ्यतमं ससैन्धवं, घृतं सुखोष्णं च सितोपलायुतम। 

हिचकी रोग में सैंधानोन मिला हुआ विरेचन या जुलाब अत्यन्त पथ्य है। निवाया घी मिश्री मिला कर पीना भी हितकारी है। 

और भी कहा है -

सर्पि; कोर्ष्ण क्षीरमिक्षो रसो वा, नातिक्षीणे रत्रंसनं छर्दनं ज। 

हिचकी रोग में निवाया घी या ईख का रस हितकारक है। अगर हिचकौ-रोगी अठि क्षीण या कमजोर न हो, तो उसे दस्त और क॒य कराने चाहियें; यानी बलवान रोगी को वमन-विरेचन कराने चाहिये, कमजोर को नहीं। 

हिचकी में पथ्यापथ्य 

पथ्य 

पसीना देना, कय कराना, नस्य देना, धुआँ पिलाना, जुलाब देना, दिन में सुलाना, शीतल पानी के छींटे मारना, एकाएक डराना-धमकाना, भुलाना, गुस्सा दिलाना और खुश करने वाली बात कहना, प्राणायाम कराना, जली हुई गरम मिट्टी सूँघधाना, कुशा की कूँची या धारा से जल छोड़ना, नाभि के ऊपर दबाना, चिराग पर जलाई हुई हल्दी की गाँठ से दागना, पैरों से ऊपर दो अंगुल पर अथवा नाभि से ऊपर दो अंगुल पर दाग देना--ये सब काम हिचकी रोगी को पथ्य या हितकर हैं। 

पुरानी कुलथी, पुराने गेहूँ, पुराने साँठी चावल, जौ, पका कैथा, लहसन, परवल, नरम मूली, पोहकरमूल, काली तुलसी, शराब, खस का जल, गरम जल, बिजौरा नीबू, शहद, गोमूत्र तथा और सब वात-कफ्‌-नाशक अन्न-पान हिचकी वाले को पथ्य हैं। 

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बहुत कर के जिन आहार-विहारों से वायु का अनुमोल हो, वायु का नाश हो वे अथवा उष्णवीर्य क्रियाएँ हिचकी और श्वास में पथ्य हैं। हिचकी रोग में पेट पर और श्वास रोग में छाती पर तेल मल कर पसीना निकालना और कय कराना पथ्य है, परन्तु कमज़ोर रोगी को वमन कराना नुकसानमन्द है। अगर वायु का उपद्रव ज़्यादा हो, तो इमली का भिगोया पानी पीना, नीबू निचोड़ कर मिश्री का शर्बत पीना और नदी या तालाब में स्नान करना पथ्य है, पर अगर कफ बढ़ा हुआ हो, तो ये सब हानिकारक है। इसलिये दोष का विचार करके ये पदार्थ देने चाहियें। 

हिचकी और श्वास वाले को रात को बहुत ही हल्का भोजन देना चाहिये। हिचकी वाले को गरम घी मिला हुआ पुराना चावलों का गरमागर्म भात बहुत ही उपकारी है। अनेक बार ऐसे भात से ही हिचकी नष्ट हो जाते देखी है। 

अपथ्य 

अधोवायु, मल-मूत्र, डकार और खाँसी आदि के वेग रोकना, धूल में रहना, धूप में बैठना या घूमना, मेहनत करना, हवा में रहना, विलम्ब या देर में हजम होने वाले पदार्थ खाना, दाहकारी या जलन करने वाली चीजें खाना, चौला, उड़द, पिट्ठी के पदार्थ, तिल के पदार्थ खाना, भेड़ का दूध पीना, अनूप देश या बहुत पानी वाले देशों के पशु पक्षियों का मांस खाना, दाँतुन करना, गुदा में पिचकारी लगाना, मछली, सरसों, खटाई, तुम्बी का फल, कन्दों के साग, तेल में छौंका हुआ चौलाई का साग, भारी और शीतल खाने-पीने के पदार्थ हिचकी रोग में अपथ्य या हानिकारक हैं। भारी ओर देर में पचने वाले पदार्थ खाना, ज़्यादा खाना, रात मेंजागना,चिन्ता-फिक्र या क्रोध करना, रंज करना, लाल मिर्च, अमचूर और दही आदि भी अपथ्य हैं। 


 हिचकी-नाशक आयुर्वेदिक नुसखे


(१) बिजौरे नीबू के २ तोले रस में ६ माशे शहद और ३ माशे कालानोन मिला कर पीने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(२) मुँगा-भस्म, शंख-भस्म, हरड, बहेड़ा, आमला, पीपर और गेरू-.इन दवाओं का चूर्ण, ना-बराबर घी और शहद में मिला कर चाटने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(३) रेणुका और पीपर के काढ़े में 'हींग' डाल कर पीने से हिचकी निस्सन्देह शान्त हो जाती है। धन्वन्तरि का वचन हे। 

(४) एक पाव बकरी के दूध में दो तोले सोंठ और एक सेर पानी डाल कर औटाने और दूध मात्र रहने पर छान कर पीने से हिचकी नष्ट हो जाती हेै। परीक्षित हे। 

नोट... सुश्रुत' में लिखा हे, यह दूध 'मिश्री' मिला कर खूब पेट भर कर पीना चाहिये। 

(५) सैंधानोन और खीलों का सत्तू मिला कर खाने और ऊपर से खट्टा रस पीने से हिचको नष्ट हो जाती है। 

(६) सोंठ, पीपर और आमले का चूर्ण शहद में मिला कर चाटने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(७) काँस की जड़ का चूर्ण शहद में मिला कर चाटने से भयंकर हिचकी नष्ट हो जाती हे।



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