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शुक्रवार, 21 मई 2021

उबटन लगाना आयुर्वेद मे वर्णन

 उबटन लगाना 


तेल की माशिल करने के बाद, उसकी चिकनाई छुड़ाने और मैल उतारने को उबटन मलना चाहिए। अगर उबटन न लगा सकें, तो चने का चून यानी बेसन ही मल लें। आचार्य भावमिश्र लिखते हें--“चूर्ण के माफिक कोई चीज़ मलने से कफ और मेद नष्ट होते हैं, वीर्य पेदा होता है, बल बढ़ता है, खून की चाल ठीक होती हे तथा चमड़ा साफ और कोमल हो जाता है। उबटन मुँह पर मलने से आँखें मज़बूत और गाल पुष्ट होते हैं तथा मुँहासे ओर झाँई नहीं होतीं। अगर मुख पर झाँई आदि पड़ गई हों, तो नष्ट हो जाती हैं और मुख कमल के समान शोभायमान हो जाता है।” 


आजकल उबटन की चाल बिलकुल कम हो गई है। जिसे देखते हैं, वही गोरों क॑ माफिक गोरा बनने को विलायती साबुन लगाते पाया जाता है। इस बात पर कोई जान बूुझ कर भी ध्यान नहीं देता कि विदेशी साबुन जिन घृणित पदार्थों से बनते हें, उन्हें धर्मभीरु हिन्दू छूने या देखने से भी नाक सिकोड़ते हैं। अगर साबुन बिना काम ही न चले, तो स्वदेशी पवित्र साबुन काम में लाना चाहिए। लेकिन हमारी समझ में, जितना लाभ उबटन से होता है, उतना साबुन से कदापि नहीं हो सकता।* 

 स्नान करना 

स्नान करने यानी नहाने की जैसी चाल भारतवर्ष में है, वैसी और देशों में नहीं है। यूरोप, अमेरिका आदि मुल्कों में भी स्नान करने की चाल है तो सही, किन्तु हिन्दुस्तान के समान नहीं है। यूरोप आदि देशों की आबोहवा या जलवायु सर्द है। वहाँ अक्सर बर्फ पड़ती रहती है, इस कारण वहाँ के लोग स्नान कम करते हैं। किन्तु भारतवर्ष उष्ण-प्रधान देश है*, इसलिए यहाँ के लोग बहुत स्नान करते हैं। वहाँ वाले, यदि यहाँ वालों के समान स्नानों की धूम मचा दें, तो सर्दी के मारे अकड़ जाये आजकल अधिकांश लोग समझते हैं, कि बारम्बार स्नान करने से स्वर्ग मिलता है। स्नान करने से ही स्वर्ग नहीं मिल सकता। मनुष्य-शरीर में नाक, कान, आँख प्रभृति इन्द्रियों से जो मैल निकलता है---बाहर की धूल, गर्द आदि उड़ कर शरीर पर जम जाती है--उस मैल को दूर करने के लिये ही स्नान करना ज़रूरी समझा गया है; क्योंकि . स्नान न करने से शरीर के छिद्र* बन्द हो जाते हैं, वायु का आवागमन रुक जाता है जिससे रक्त-विकार--खून-फिसाद--.प्रभृति अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। देखिये, चरक जी सूत्रस्थान में लिखते हैं--

पवित्र वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम। शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्‌॥ 

“सान--पवित्रता-कारक, वीर्य बढ़ाने वाला, आयु-वद्धक, थकान ओर प्सीगा-वाशक, मेल दूर करने वाला, बल बढ़ाने वाला और अत्यन्त तेज्ञ करने वाला है।” सुश्रुव जी चिकित्सा-स्थान में लिखते हैं +-

निद्रादाहअभ्रमहरं स्वेदकण्ड्तृषापहम। हद्यं मलहरं श्रेष्ठ सर्वेन्द्रियविशों धनम्‌। तन्द्रापापोपशमन तुष्टिदं॑ पुस्त्ववर्द्धनम्‌॥ रक्तप्रसादन॑ चापि स्नानमग्नेश्य दीपनम्‌॥ 

“स्नान करना--ठिद्रा, दाह (जलन), थकान, पसीना, खाज, खुजली और प्यास को नष्ट करता है। स्नान हृदय को हितकारक है; मेल दूर करने वाले उपायों मे परमोत्तम है; समस्त इद्धियों का शोधन करता है; तन्द्रा (ऊँघना) और पाप (दु:ख) का नाश करता है। स्नान करने से चित्त प्रसत्र होता है, पुरुषार्थ बढ़ता है, खूत साफ होता है और अगिन दीप्त होती है।” शीतल जलादि के सींचने से शरीर के बाहर की गर्मी दब कर भीतर जाती है और इसी से मनुष्य की जठराग्नि प्रबल होती है। देखते हैं कि भूख केसी ही कम क्‍यों न हो, स्तान कर चुकते ही कुछ न कुछ अवश्य बढ़ जाती है। 


चरक आदि ऋषियों ने “स्नान” की जैसी प्रशंसा की है, वास्तव में स्नान करना वैसा ही लाभदायक है; परन्तु जितनी बार पाख़ाने जाना या पेशाब करना, उतनी ही बार स्नान करना स्वास्थ्य के हक में लाभदायक नहीं है। एक दिन में कई बार स्नान करने से निस्सन्देह अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यूनानी इलाज करने वाले भी बार-बार स्नान करने को हानिकारक बताते हैं। “इलाजुल गुरबा” हिकमत का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। उसमें लिखा है, “नहाना चाहे गर्म पानी से हो या ठण्डे पानी से, पुट्ठों को अवश्य क्षीण करता है। गर्म पानी से त्वचा (चमड़ा) और रगें ढीली हो जाती हैं और ठण्डे पानी से रगों में शीतमयी सर्दी बढ़ जाती है। बहुत से हिन्दुओं को, जो सदा नहाते हैं, जवानी में गर्मी होने से चाहे हानि नहीं भी मालूम होती हो, परन्तु जब वह जवानी को पार कर जाते हैं, तब रगों और गुर्दों , में निर्बलता के चिह्न प्रकट होते हैं ओर वीर्य क्षीण हो जाता है। आज धर्मान्थ हिन्दू कई बार नहाते हैं, पाखाने (दिशा) जाने के पीछे भी नहाते हैं। यह नहाना उनके शरीर को बहुत ही दुःखदायक है।” 


“इलाजुल-गुरबा” के लेखक ने जो कुछ लिखा है, वह उस देश के लिये बिल्कुल ही ठीक है, जिस देश से यूनानी चिकित्सा सम्बन्ध रखती है। हमारे देश के लिये यह बात ठीक नहीं है। भारतवासियों को नित्य स्नान करना ही लाभदायक है; किन्तु बारम्बार स्नान करना “इलाजुल-गुरबा” के लेखक के मतानुसार बेशक हानिकारक है। हमारे यहाँ मैथुन के बाद, ऊख, जल, कन्द, मूल, फल, दूध, पान॑ और दवा सेवन करने के पीछे भी स्नान करना लिखा है; किन्तु यह भी ठीक नहीं है। धर्म-मत से चाहे ऐसा स्नान स्वर्ग और मुक्ति का देने वाला हो, किन्तु तन्दुरुस्ती के लिये नुकसानमन्द है। “इलाजुलगुरबा” में ही लिखा है---भोजन कर चुकते हीं था मैथुन के उपरान्त शीघ्र ही नहाना हानि करता है। भोजन करके स्नान करने को हमारे वैद्यक में भी बुरा लिखा है। मैथुन करने के पीछे बदन एकदम गर्म हो जाता है। उस समय स्नान करना निस्संदेह नुकसान करेगा; इसी वजह से हकीमों ने मैथुन करने के बाद तत्काल ही, स्नान करने की मनाही की है और यह बात हम भारतवासियों के लिये भी ठीक है। 


*इलाजुल-गुरबा” में लिखा है कि ठण्डे पानी की अपेक्षा गुनगुने पानी से नहाना उत्तम है। हवा में शीतल जल से स्नान करना, विशेष सर्द मिज्ाज-वालों को अवगुण करता है। कफ के स्वभाव वाले को अधिक नहाना मना है। नजले बालों, अतिसार वालों, रोगियों, लड़कों और बूढ़ों को शीतल जल से नहाना विशेष हानिकारक है। हमारे आयुर्वेद में भी गर्म जल के स्नान को अच्छा लिखा है। भावमिश्र जी अपने “भावप्रकाश” में लिखते हैं, “गर्म जल के स्नान से बल बढ़ता एवं वात और कफ का नाश होता है।” हरिश्चन्द्र नामक कोई अनुभवी वैद्य हो गये हैं। उन्होंने लिखा है-

अशीतेनाम्भसा स्नान पय:पानं नवा: स्त्रिय:। एतद्ठो मानवा: पशथ्यं स्निग्धमल्पं च भोजनम्‌॥ 


“हे मनुष्यों । गर्म जल से स्तान करना, दूध प्रीना, जवान स्त्री से सम्भोग करना और घी वगौर चिकने पदार्थों से बढाया हुआ थोड़ा भोजन करना,--ग्रे सदा प्रथ्य अर्थात्‌ हितकारी हो” 


गर्म जल से स्नान करने में इस बात पर खूब ध्यान रखना चाहिये कि गर्म जल सिर पर न डाला जाय; क्योंकि सिर पर गर्म जल डालने से नेत्रों को नुकसान पहुँचता है। किन्तु यदि वात और कफ का कोप हो, तो सिर पर गर्म जल डालने से हानि नहीं है। सुश्रुत कहते हैं :-

उष्णेन शिरसः स्नानमहितं चक्षुष: सदा। शीतेन शिरस: स्तान॑ चश्नुष्यमितिनिर्दिदशेत्‌॥ 

“गर्म जल पिर पर डाल कर स्नान करना आँखों को सदा हानिकारक हैँ। शीतल जल पिर पर डाल कर स्‍तान करना आँखों को लाभदायक है।” 


आजकल, जब कि धातु की क्षीणता से १०० में से ९० मनुष्यों का मिजाज गरम रहता है; शीतल जल से स्नान करना लाभदायक है। विशेष कर गर्मी को ऋतु में तो शीतल जल से स्नान करना परम पथ्य है। जिनकी प्रकृति गर्म हो, उन्हें सब ऋतुओं में ही ठण्डे पानी से नहाना उचित है। शीतल जल के स्नान से उष्णवात (गरम बादी), सूजाक, मृगी, उन्माद, रक्त-पित्त और मूर्च्छा आदि रोगों में बड़ा उपकार होता है। बिनका मिज़ाज सर्द हो, या जिन्हें शीतल जल के स्तान से नुकसान नज़र आता हो, उन्हें गर्म जल से ही नहाना चाहिये। गर्मी में दो बार और जाड़ों में सिर्फ एक बार स्नान करना सब तरह के मिजाज वालों को हितकारी है। 


मनुष्य को सदा साफ जल से स्नान करना चाहिये। मैले कुओं,, सड़े हुए तालाबों या नदी के बिगड़े हुए जल में स्नान करना रोग मोल लेना है। यद्यपि गड्ढ पवित्र, पापनाशिनी ओर मोक्षदायिनी है, तथापि यदि उसका जल भी मैला हो, तो उसमें भी स्नान न करना चाहिये। ऋषियों ने लिखा है-..“ वर्षा ऋतु में सब नदियाँ, स्त्रियों की भाँति, रजस्वला होती हैं, अतएव वर्षा में नदियों में स्नान न करें।” नदियाँ क्या रजस्वला होंगी ? ऋषियों ने जो बात हम लोगों के हक में अच्छी समझी है, उसमें धर्म का पक्ष लगा दिया है। नदियों के रजस्वला होने का यही मतलब हे, कि वर्षा में समस्त नदियाँ चढ़ती हैं। उनमें स्थान-स्थान का मैला, कूडा-करकट, अनेक प्रकार के सर्प आदि विषैले जानवर बह आते हैं, जिससे नदियों का पानी बहुत ही गन्दा हो जाता है। विषैले जीवों और पानी के ज़ोर से मनुष्यों को रोग होने ओर कभी-कभी उनकी जान जाने की भी सम्भावना हो जाती है। बस, यही कारण है कि ऋषियों ने वर्षा में नदियों को रजस्वला कह कर उसमें स्नान करना मना किया है। चरक-संहिता, सूत्रस्थान के २७वें अध्याय में लिखा है :-

बसुधाकीटसर्पाखुमलसंदूषितोदका:। वर्षाजलवहा नद्यः सर्वदोषसमीरणा:॥ 

“पट्टी, कीडे, साँप ओर चूहो आदि को मल (विष्ठा) से दूषित जल वर्षाकाल में, नदियों में मिल जाता है, इस वास्ते वषाकालीन सब नदियों का जल समस्त रोगों की खान होता है।” सुश्रुत-संहिता, सूत्रस्थान के ४५ वें अध्याय में लिखा है +-


कीटमूत्रपुरीषाण्डशवको थप्रदूषितम्‌। 

तृणपर्णोत्करयुतं कलुषं विषसंयुतम्‌॥ योउवगाहेत वर्षासु पिवेद्वापि नवं॑ जलम। स बाह्माभ्यन्तरान्‌ रोगान्‌ प्राणुयात्‌ क्षिप्रमेव तु॥। 


“कीड़े, मूत्र, विष्ठा (पाखाना), जानवरों को अण्डे, लाशें, कीच, घास-पात और कूड़ा करकट वर्षा को जल में मिले रहते हैं। वर्षा का नवीन जल गदला और विषयुक्त होग है। जो मनुष्य उस जल में स्तान करता है या उस नवीन जल को पीता है, उसके शरीर में बाहर होने वाले फ़ोड़े, फुन्सी, नारू (बाला) आदि चमड़े को रोग हो जाते हैं तथा उदर विकार, अजीर्ण, ज्वर आदि भीतरी रोग तत्काल ही हो जाते हो।” 


आजकल इन बातों पर विरला ही ध्यान देता हे। कलकत्ते में ही, जहाँ गंगा में घास पात, सर्प आदि बह आने के सिवा हजारों मल्लाह गंगा की छाती पर मल-मूत्र त्याग करते हैं; लोग घोर वर्षा में भी उसी गंगा में स्नान करते हैं। नतीजा यह निकलता है, कि हज़ारों गंगा-स्नान करने वाले दाद, खुजली, खाज आदि चर्म रोगों में सड़ते दिखाई देते हैं। बुद्धिमान को चाहिये कि नदी, तालाब, कुआँ, बावली या घर पर--जहाँ भी स्नान करे, साफ जल से स्नान करे; क्योंकि जिस तरह मैले जल के पीने से रोग होते हैं, उसी तरह मैले जल के स्नान से भी अनेक बीमारियाँ होती हैं। 


नहाने के समय सिर्फ दो लोटे जल डाल लेना ही अच्छा नहीं है। बदन को खूब मोटे कपड़े से रगड़ना और मल-मल कर नहाना चाहिये ताकि शरीर का मैल अच्छी तरह उतर जाये। स्नान करके चटपट सूखे कपडे से बदन पोंछ लेना उचित है। अपनी गीली धोती से शरीर पोंछना उचित नहीं है। बदन पोंछ कर साफ धुले हुए कपड़े पहन लेने चाहिये। इस तरह स्नान करने से कोई रोग नहीं होता। 

 नहाने की मनाही

 स्नान ज्वरेउतिसारे चर नेत्रकर्णानिलारत्तिषु। आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम्‌॥ 

“बुखार, अतिसार, नेत्र-रोग, कान के रोग, वायु-रोग, पेट का अफ़ारा, पीनस और अजीर्ण रोग वाले स्नान न करें तथा भोजन करको भी स्नान न करें” कसरत करके, स्त्री प्रसंग करके, या कहीं से आ कर भी पसीनों में तत्काल स्नान करना रोग-कारक है। 

 अनुलेप

स्नान करके मनुष्य को किसी-न-किसी तरह का लेप अवश्य करना चाहिये। इससे चित्त प्रसन्न होता और शरीर की बदबू वगैर: नष्ट हो जाती है। सुश्रुत कहते हें: 

सौभाग्यदं वर्णकरं॑ प्रीत्योजोबलवर्द्धनम्‌ स्वेददौर्गन्ध्यवैवर्ण्य॑ भ्रमघ्नमनुलेपनम॥। 

“चन्दन आदि किसी तरह का भी लेप करने से सौभाग्य होता हे, शरीर का र्गे सुन्दर होता है, प्रीति, ओज* और बल बढ़ता है तथा पसीना, थकावट, बदबू एव विवर्णवा--इन सब का नाश होता है।” 

भावमिश्र भी कहते हैं कि लेप करने से प्यास, मूर्च्छा (बेहोशी), दुर्गन्ध पसीना, दाह (जलन) आदि नष्ट होते हैं, सौभाग्य और तेज बढ़ता है, चमडे का रंग निखरता है, तथा प्रीति, उत्साह और बल बढ़ता है। जिन लोगों को स्नान करना मना है, उनको लेप करना भी मना है। 

अब हम नीचे “ भावप्रकाश” से यह दिखलाते हैं कि कौन-सी ऋतु में कौन-सा लेप करना हितकारी है। 

ऋतु अनुसार लेपन की विधि 

* शीतकाल यानी जाड़े के मौसम में “केशर, चन्द्र और काली अगर”-.इन तीनों को घिस कर लेप करना चाहिये, क्योंकि यह लेप गर्म है और वात-कफ-नाशक है। 

ग्रीष्म ऋतु यानी गर्मी के मौसम में “चन्दन, कपूर और सुगन्धबाला ”-...इन तीनों का लेप करना चाहिये, क्‍योंकि ये चीज़ें सुगन्धित और खूब शीतल हैं। 

वर्षा काल यानी मौसम-बरसात में “चन्दन, केसर और कस्तूरी” को घिस कर लेप करना उचित है; क्‍योंकि यह लेप न तो गर्म है, न शीतल है; अर्थात्‌ मातदिल है। 

 अंजन लगाना

आजकल अज्जन लगाने की चाल घटती जाती है। अज्जन या सुर्मा लगाना एक प्रकार का ज़नाना श्रृंगार या आजकल के फैशन के खिलाफ समझा जाता है।* कोई कुछ ही क्यों न समझे, लेकिन सुर्मा लगाने से अनेक प्रकार के नेत्र-रोग निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं। नियमपूर्वक सुर्मा लगाने से किसी प्रकार की आँखों की बीमारी नहीं होती और जवानी में ही चश्मा लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। 


सफेद सुर्मा नेत्रों के लिये परम हितकारी है। इसे नित्य लगाना चाहिये। इसके लगाने से नेत्र-मनोहर और सूक्ष्म वस्तु देख सकने योग्य हो जाते हैं। सिन्ध देश में उत्पन्न हुआ “काला सुर्मा” यदि शुद्ध भी न किया जाय, तो भी उत्तम होता है। इसके लगाने से आँखों की जलन, खाज और कीचडु इत्यादि आना नष्ट हो जाता है। आँखों से जल बहना और उनकी पीड़ा भी दूर हो जाती है। आँखें सुन्दर और रसीली हो जाती हैं। नेत्रों में हवा और धूप सहने की शक्ति आ जाती है और उनमें कोई रोग नहीं होता। 

अज्जन लगाना मना 

रात में जगा हुआ, वमन करने वाला, जो भोजन कर चुका हो, ज्वर-रोगी, और जिसने सिर से स्नान किया हो, उनको सुर्मा लगाना नुकसानमन्द है। 

नेत्र-रक्षक उपाय

अज्जन लगाना निस्सन्देह लाभदायक हे, किन्तु खाली अज्जन ही लगाने से नेत्र-रक्षा नहीं हो सकती। जिन भूलों के कारण नेत्र-रोग होते हैं, अर्थात्‌ जो नेत्र-रोगों के हेतु हैं, बुद्धिमानों को उनसे भी बचना परमावश्यक है; क्योंकि कारण का नाश हुए बिना कार्य का नाश होना असम्भव है। 'सुश्रुत' उत्तर-तन्त्र में लिखा है-../गर्मी से तपते हुए शरीर से एकाएक शीतल जल में घुस जाने या धूप से तपते हुए सिर पर ठण्डा पानी डालने, दूर की चीज़ें बहुत ध्यान लगा कर देखने, दिन में सोने और रात को जागने या नींद आने पर न सोने, अत्यन्त रोने या बहुत दिन तक रोने, रंज या शोक करने, क्रोध या गुस्सा करने, क्लेश सहने, चोट वगैरः लग जाने, अत्यन्त मैथुन यानी बहुत ही स्त्री-प्रसंग करने, सिरका, आरनाल नामक काँजी, खटाई, कुलथी ओर उड़द वगैरः के अधिक खाने, मल, मूत्र और अधोवायु आदि के वेगों* को रोकने, अधिक पसीना लेने, अधिक धूल यानी आँखों में धूल गिरने, अधिक धूप में फिरने, आती हुई वमन यानी कय के रोकने, अत्यन्त वमन (उल्टी) करने, किसी चीज़ की भाफ लेने या जहरीली चीज़ों की भाफ लेने, आँसुओं के रोकने, बहुत ही बारीक चीज़ों के देखने आदि-आदि कारणों से, वात आदि दोष कुपित हो कर, आँखों की अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा करते हैं।” 


''भावप्रकाश” में ऊपर लिखे हुए कारणों के सिवा,  (१) “बहुत तेज़ सवारी पर चढ़ने से भी नेत्र-रोग होना लिखा है।” “इलाजुलगुरबा” में लिखा है-आँखों को झाँप, धुआँ और गन्दी हवा से बचाना चाहिये। ज़्यादा रोना, ज़्यादा मैथुन करना ओर अधिक नशा करना भी नेत्रों को हानिकारक है। हमेशा सूक्ष्म वस्तुओं का देखना भी मना है।” इसके सिवा, बहुत महीन अक्षरों के लिखने-पढ़ने, सिर को रूखा रखने यानी सिर पर तेल न लगाने, सन्ध्या समय पढ़ने, अति परिश्रम करने, दिमाग में अधिक सर्दी या गर्मी पहुँचने, लेटे-लेटे गाने या पढ़ने-लिखने, किरासिन तेल की रोशनी या बिजली की कम रोशनी में पढ़ने लिखने वगैर: कारणों से भी नेत्र-ज्योति  मंद पड़ जाती है। उपरोक्त सब कारणों को टालना नेत्र-रक्षा का पहला उपाय है। 

(२) हरी चीज़ें देखने से नेत्रों का तेज़ बढ़ता है। इस वास्ते बागों की सैर करना या दूसरी हरी-हरी चीज़ों को देखना आँखों के लिये लाभदायक है। 

(३) ऋतु के अनुसार सिर पर चन्दन आदि का लेप करना भी फायदेमन्द है। यही कारण है कि ऋषियों ने चन्दन आदि के तिलक लगाने को भी धर्म में शामिल कर दिया है। 

(४) हर रोज़ दिन में तीन दफे ठण्डे जल से मुँह को भर कर, आँखों को ठण्डे यानी से सींचना या जितनी बार पानी पीना, उतनी बार मुँह धोना ओर आँखों में शीतल जल के छपके देना भी आँखों के लिये मुफीद है। 

(५) मस्तक में रोज़ तेल लगाना चाहिये। यदि रोज़-रोज़ न भी हो सके, तो कैसरे-चोथे दिन तो अवश्य ही लगाना चाहिये। विशेष कर हजामत बनवा कर तो 

तत्काल ही सिर में तेल लगाना उचित है। इस तरह तेल लगाने से नेत्रों का बहुत उपकार होता है। 

(६) सिर पर “मक्खन” रखने और “मक्खन-मिश्री' खाने से भी नेत्रों को बहुत लाभ होता है। “भावप्रकाश” के पूर्वखण्ड में लिखा है-दुग्धोत्थं नवनीतं तु चक्षुष्यं रक्तपित्तनुत!। वृष्यं बल्यमतिस्निग्धं मधुरं ग्राहि शीतलम॥ “दूध से निकला हुआ मक्खन नेत्रों को हितकारी, रक्त-फित्त-गाशक*, धातु पैदा करने वाला, बलदायक, अत्यन्त चिकना, मीठा, ग्राही और शीतल है।” 

(७) पैरों को खूब धो कर साफ रखने, सदा जूता पहनने और पैरों में तेल की मालिश करने से आँखों को बहुत लाभ होता है, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। पाँव की दो मोटी-मोटी नसें मस्तक में गई हैं और ब्रहुत-सी नसें आँखों तक पहुँचती हैं। इसी कारण पाँवों में जो चीज़ें मालिश की जाती हैं, जो सींची जाती हैं या जिन चीज़ों का लेप किया जाता है, वह सब उन नसों के द्वारा आँखों में पहुँचती हैं। 

(८) हमारे यहाँ भोजन के पहले और पीछे, मल-मूत्र त्याग कर और सोते समय जो पैर धोने की चाल है, वह आँखों के लिये लाभदायक समझ कर ही चलाई गई है। दिन में कई बार पैर धोने से आँखों में बड़ी तरावट पहुँचती है और तत्काल ही चित्त प्रसन्‍न हो जाता है। 

(९) त्रिफले (हरड़, बहेड़ा और आमला) के जल से नेत्र धोने से आँखों की ज्योति मन्दी नहीं होती। त्रिफले के काढ़े से आँखें धोने से नेत्र-रोग नष्ट हो जांते हैं। 

(१०) नित्य आमले मल कर स्नान करने से आँखों का तेज़ बढ़ता है। 

(११) काले तिलों को पीस कर, सिर में मल कर स्नान करने से नेत्र उत्तम हो जाते हैं और वायु की पीड़ा शान्त हो जाती है। 

(१२) बुढ़ापे में, भेजे की कमज़ोरी और अग्नि मन्द होने से भी, अक्सर नेत्र-ज्योति कम हो जाती है। बुद्धिमान को चाहिये कि पहले से ही ऐसे उपाय करता रहे, कि दिमागी ताकृत कम न हो तथा अग्नि सदा दीप्त रहे। 

(१३) महीने में एक-दो बार किसी प्रकार का नस्य या सूँघनी सूँघ कर, भेजे का मल निकालते रहने से आँखों को नुकसान नहीं पहुँचता। 

(१४) “इलाजुलगुरबा” में दिन में कई बार सिर में कंघी करना भी नेत्र-ज्योति के लिए उत्तम लिखा है; विशेष कर बूढ़ों के लिए बहुत ही उत्तम लिखा है। 

(१५) हकीम शेखउल्रईस ने कहा है कि साफ पानी में तैरना और उसमें आँखें खोलना भी लाभदायक है। 

(१६) नाक के बाल उखाड़ने से नेत्र-ज्योति कमज़ोर हो जाती है; इस वास्ते नाक के बाल कदापि न उखाड़ने चाहिये। 

(१७) वृद्ध वाग्भट ने कहा है--.“मल, मूत्र, अधोवायु आदि वेगों को जो नहीं रोकते, अज्जन लगाने और नस्य सूँघने का जो यथायोग्य अभ्यास रखते हैं, क्रोध और शोक को जो त्याग देते हैं, उन मनुष्यों को “तिमिर-रोग” नहीं होता है।” 

(१८) देशी तेल का दीपक जला कर पढ़ने-लिखने से आँखों को बहुत लाभ होता है; किन्तु मिट्टी के तेल के लैम्प बगैर: जला कर पढ़ने-लिखने से मनुष्य जवानी में ही अन्धा-सा हो जाता है। 

(१९) वृद्ध वाग्भट में “घी” पीना भी नेत्रों के लिये अच्छा लिखा है। वास्तव 


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धन्यवाद Gk Ayurved