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गुरुवार, 20 मई 2021

आमवात वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 आमवात वर्णन


आम का स्वरूप-भोजन किये हुए अन्न के न पचने से जो अपक्व या कच्चा रस बनता है, वह क्रम-क्रम से इकट्ठा हो जाता है। उसे ही 'आम' कहते हैं। वह ' आम! सिर और शरीर में वेदना उत्पन्न करता है। 


खुलासा यह.. है कि आम और वात--इन दोनों पदों के मिलाने से ' आमवात ” शब्द बनता है। जठराग्नि की कमज़ोरी से, भोजन का सार-रस जब खून में परिणत नहीं होता; यानी रस का खून नहीं बनता, तब वह 'रस” आमाशय आदि स्थानों में जमा हो जाता है। उस संचित हुए पदार्थ को ही “आम” कहते हैं। जो शरीर के भीतर विचरण करती है, जिसकी ताक़त से शरीर की सारी शक्तियाँ अपना-अपना काम करती हैं और जो इन्द्रियों और अतीन्द्रिय के द्वारा जानी जाती है, उसे ही वायु’ कहते हैं। 


आमवात के सामान्य लक्षण--कुपित हुए आम और वात, दोनों ही त्रिक स्थानों में सन्धियों में प्रवेश करके, पीड़ा करते हुए शरीर को जकड़ देते हैं; तब कहते हैं कि ' आमवात' रोग हुआ है। 


शरीर टूटना, अरुचि, प्यास, आलस्य, भारीपन, ज्वर, अन्न का न पचना और अंगों का सूनापन या सूजन--ये आमवात के सामान्य लक्षण हैं। 


नोट--दुष्ट वायु द्वारा आमाशय प्रभृति में जमा हुआ आम रस चलायमान हो कर--कफपित्त के साथ मिल कर--विदग्ध या खट्टा'हो जाता है। फिर वही खट्टा रस शरीर की सन्धियों या जोड़ों प्रभृति में अवस्थित हो कर, ज्वर और तोड़ने कौ-सी पीड़ा आदि लक्षणों वाले जिस रोग को पैदा करता है, उसी को 'आमवात ' कहते हैं | उसे हिन्दी में गठिया या ग्रन्थिवात कहते हैं। 


निदान-पूर्वक सम्प्राप्ति--दूध-मछली संयोग-विरुद्ध भोजन करने, विरुद्ध चेष्टा करने, कसरत न करने, अग्नि मन्द रहने, भोजन में लम्पटता करने और चिकना भोजन करके कसरत करने से ' आम ' या खाये हुए पदार्थों का कच्चा रस, वायु द्वारा आमाशय और सन्धिस्थल प्रभृति स्थानों में एकत्र और दूषित हो कर ' आमवात' रोग पैदा करता है। 


'वैद्य-विनोद' में लिखा है, विरुद्ध आहार-विहार करने वाले और मंदाग्नि वाले मनुष्य के अत्यन्त चिकने पदार्थ खाने से "आम ' दूषित हो कर, वायु की प्रेरणा से धमनियों में घुस कर, सन्धियों में दौड़ता है। 


खुलासा निदान--लक्षणादि--प्रकृति विरुद्ध, समय-विरुद्ध और संयोगविरुद्ध आहार; विरुद्ध चेष्ठा, * आमुख-कारक कर्म, मिहनत न करना, चिकने अन्न-पान सेवन करने के बाद तत्कीलः घोर् परिश्रम करना, गीले, भीगे या सील के घर में रहना, गरमी या धूप में तपे हुये शरीर में शीतल जल से नहाना अथवा शीतल जल पीना, शीतल हवा में रात के समय बिना कपड़े ओढ़े खुले अंग सोना, एक साथ आते हुये पसीनों को रोकना, अग्नि का मन्दापन और आम एवं वायु को कुपित करने वाले देश तथा आमवात की अनुकूलता वाली प्रकृति आदि आमवात के कारण हैं। इन समस्त कारणों से आम रस का संचार होता और वायु का कोप होता है। इनके साथ ही कफ और पित्त भी कुपित हो जाते हैं। 


कुपित हुई बायु--कफ और पित्त को अपने मददगारों की तरह साथ ले कर, और आम रस को उसके स्थान से रस बहाने वाले स्रोतों या छेदों में ले जा कर, उससे उनको बन्द कर देती है। तब वे छेद बन्द हो जाते हैं, तब शरीर में कमज़ोरी, हृदय में भारीपन, काम में दिल न लगना, शरीर के अनेक स्थानों में अनवस्थित-अस्थिर बेदना और भोजन पर अनिच्छा आदि लक्षण आमवात के पहले होते हैं। इसके बाद, आम रस खट्टा हो कर, शरीर की सन्धियों या जोड़ों वगैर में ठहर कर, स्पष्ट लक्षण वाली पीड़ा करता है। हाथ-पाँव, सिर, गुल्फ, (एड़ी के ऊपर की गाँठ) त्रिक, जानु और घुटनों की सन्धियों में पीड़ायुक्त सूजन और ज्वर पैदा होते हैं। यही आमवात के विशेष लक्षण हैं। 


कुपित आमवात के उपद्रब--कुपित हुआ ' आम” मन्या, कमर, पीठ, हाथ, . aa, और गुल्फ एवं उनकी सन्धियों को संकुचित करके सूजन पैदा करता है, जिसमें बिच्छू के काटने के जैसा दर्द होता है। इसी को वैद्य आमवात’ कहते हैं। 


नोट--' भावप्रकाश” में ऊपर वर्णित लक्षणों के अलावा लिखा है कि आमवात से जठराग्नि मंद हो जाती है, मुँह में थूक आता है, अथवा मुँह और नाक से पानी गिरता है, अरुचि होती है, शरीर में भारीपन होता है, उत्साह नष्ट होता है, मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है, दाह या जलन होती है, पेशाब ज़्यादा आता है, पेट कड़ा हो जाता है, शूल चलता है, नींद नहीं आती, प्यास लगती है, वमन होती है, बेहोशी आती है, हृदय में जड़ता होती है, मल रुक जाता है, शरीर जड़ हो जाता है, आंते कूजती हैं, पेट पर अफारा आ जाता है तथा कलाय-खंज आदि दूसरे दुःखदायी रोग हो जाते हैं; यानी बहुत बढ़ जाने पर सन्धियों में संकोच, लूलापन, टेढ़ापन, पैरों में सूजन आदि उपद्रव हो जाते हैं। 


दोष-भेद से आमवात के विशेष लक्षण---अधिक शूल चलने से वायु की आमवात समझनी चाहिये। शरीर में दाह और लाली होने से पित्त की आमवात समझनी चाहिए। शरीर गीले कपड़े से लिपटा हुआ-सा हो तथा खुजली चलती हो, तो कफ़ की आमवात समझनी चाहिये। दो या तीन दोषों के लक्षण मिले हुए पाये जाने से उन-उन दोषों की आमवात समझनी चाहिये। 


नोट--पित्त की अधिकता होने से, सुजन से फुला हुआ शरीर एकदम से लाल हो जाता है और उसमें बड़ी जलन होती है। वात की अधिकता में सूजन बहुत नहीं बढ़ती, पर तोड़ने-फोड़ने की-सी घोर पीड़ा होती है। कफ़-प्रधान आमवात में सूजन, गीली, भारी और खुजली-युक्त होती है। 



साध्यासाध्य--एक दोष का आमवात साध्य, दो दोषों का याप्य और तीन दोषों का असाध्य जानना चाहिए। तीन दोषों के आमवात में सारे शरीर में सूजन होती है। ऐसी आमवात आराम नहीं होती। आमवात-रोग होते ही फ़ौरन इलाज करना चाहिये, क्योंकि देर होने से रोग कष्ट-साध्य हो जाता है। 


आमवात चिकित्सा में याद रखने योग्य बातें..


 (१) लंघन, स्वेदन और विरेचन--आमवात की प्रधान चिकित्सा है; यानी लंघन कराने, पसीने निकालने और दस्त कराने से आमवात-रोग आसानी से आराम हो जाता है। 


'भाव-प्रकाश' में लिखा है, आमवात-रोग में पहले सेक  करो, तिक्त अग्नि-दीपक और तीक्ष्ण पदार्थ सेवन कराओ, जुलाब दो, ईस्हन कर्म करो और पिचकारी लगाओ; क्योंकि ये उपचार इस रोग में हितकारी हैं। 


(२) अगर आमतवात में दर्द हो, तो दर्द की शान्ति के लिए एक कपड़े की पोटली में बालू भर कर उसे आग पर तपाओ और दर्द की जगह सेक करो | इसे 'बालू की पोटली का रूखा स्वेद्’ कहते हैं | । 


अथवा 


कपास के बिनौले, कुलथी, तिल, जौ, लाल अरण्ड की जड़, अलसी, मसीना (मोटा घटिया अनाज), पुनर्नवा और सन के बीज--ये सब चीज़ें या इनमें से जो-जो मिलें, उन्हें कूट कर काँजी में तर कर लो और एक कपड़े में बाँध कर पोटली बना लो। फिर एक हाँड़ी में काँजी भर कर, उस पर अनेक छेद वाला शकोरा रख कर ढक दो। हाँडी और ढकने की सन्धियों को मिट्टी से बन्द कर दो, ताकि सन्धियों में हो कर भाफ न निकले। फिर उस हाँडी को आग पर रख दो। उस पोटली को ढकने पर रखो। जब वह गरम हो जाय, तब उससे आमवात को सेको। बारम्बार सेक करने से दर्द अवश्य दूर हो जायगा। इसे ‘शंकर स्वेद्’ कहते हैं। 


(३ ) उरुस्तम्भ-रोग और आमवात के पथ्यापथ्य एक समान हैं। आमवात में स्नान करना मना है; यहाँ तक कि गरम पानी से भी नहाना निषेध है। अगर आम-वात में ज्वर हो, तो रोटी, दाल-भात आदि न दे कर, साबूदाना आदि हल्के भोजन देने चाहियें। दर्द की जगहों को रूई से बाँधना चाहिये। दही आदि अभिष्यन्दी, भारी और पिच्छिल पदार्थ आमवात-रोगी को भूल कर भी न खाने चाहिये। दही अपथ्य है। 



 आमवात-नाशक आयुर्वेदिक नुसख़े  



(१) पुनर्नवादि चूर्ण 

पुनर्नवा या सोंठ, गिलोय, शतावर, गोरखमुण्डी, कचूर, सोंठ और देवदारुइनको समान-समान ले कर पीस-छान लो। इस चूर्ण को 'काँजी' के साथ खाने से आमवात और पुराना गृप्नसी-रोग ये दोनों नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है। 


नोट--इस नुसखे में कोई देवदारु और कोई विधारा लेते हैं। 


(२) रसोनदशक 

लहसन, हींग, त्रिकुय, सैंधानोन, सफ़ेद जीरा, संचरनोन, बिड़नोन और कचियानोन--इन दसों को चार-चार तोले ले कर बारीक पीस लो फिर तेल में मिला कर, एक-एक तोला सवेरे खाओ। इससे आमवात-रोग नष्ट हो जाता है। परीक्षित है। 


(३) हरीतकी योग 

हरड़ का चूर्ण 'अरण्डी के तेल' में मिला कर ख़ाने से आमवात-रोग नष्ट हो जाता है। परीक्षित है।


(४) राज़ा, गिलोय, अरण्डी की जड़, देवदारु और सोंठ--इनका काढ़ा सर्वांगगत वायु, गठिया वात, सन्धिवात और मज्जागत वात को नष्ट करता है। आमवात पर परीक्षित है। 


(५) अगर आमवात-रोगी को प्यास बहुत हो, तो पीपर, पीपरामूल, चव्य, चीता और सोंठ--श्नसे पकाया हुआ पानी देना चाहिये। 


(६) सोया, बच, सोंठ, गोखरू, बरना की छाल, पुनर्नवा, देवदारु, कचूर और गोरखमुण्डी--इन सब को समान-समान लेकर सेवन करने से आमवात रोग नष्ट हो जाता है। 


(७) प्रसारिणी, अरणी और मैनफल--इनको सिरके की काँजी में पीस कर सुहाता-सुहाता लेप करने से आमवात नष्ट हो जाती है। 


(८) चीता, कुटकी, पाढ, इन्द्रजी, अतीस, गिलोय, देवदारु, बच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस और हरड़--इनको एकत्र पीस कर नित्य पीने से आमवात रोग नष्ट हो जाता है। 


(९) कचूर, सोंठ, हरड़, बच, देवदार, अतीस और गिलोय--इनका काढ़ा पीने और रूखा भोजन करने से आमवात नष्ट हो जाता है। 


(१०) पुनर्नवा; कटाई, अरण्डी की जड़, मरुआ, मूर्वा और सँहजने का पंचाग--इनका काढ़ा आमवाते-रोगी को पिलाने से आमवात नष्ट हो जाती है।


 (११) पीपर का चूर्ण डाल कर 'दशमूल का काढ़ा' पीने से आमवात नष्ट हो जाती है। परीक्षित है। 


(१२) सोंठ और हरड़ का चूर्ण अथवा सोंठ और गिलोय का चूर्ण खाने से आमवात चली जाती है। 


(१३) अरण्डी के तेल में 'जवाखार' मिला कर पीने से मूत्रकृच्छ रोग नष्ट हो जाता है। अरण्डी के अढ़ाई तोले या कम तेल में 'दशमूल का काढ़ा' या 'सोंठ का काढ़ा' मिला कर पीने से कमर का दर्द जाता रहता है। ये नुसखे दस्तावर हैं। 


(१४) सॉठ और गिलोय के काढ़े में 'पीपर का चूर्ण' डाल कर पीने से आम, कोठे की पीड़ा और कमर की जकड़न तथा सूजन--ये सब आराम हो जाते हैं। परीक्षित है। 


धन्यवाद Gk Ayurved