Faundder And ,CEO

शनिवार, 8 मई 2021

मूर्च्छा बेहोशी का करें आयुर्वेद से सफल एवं जड़ से इलाज


मूर्च्छा बेहोशी रोग का वर्णन मूर्च्छा का स्वरूप।


जब मनुष्य में सुख-दुःख आदि का अनुभव करने की सामर्थ्य नहीं रहती-जब उसे सुख-दुःख आदि का ज्ञान नहीं रहता और वह काठ की तरह, बेहोश हो कर, जमीन पर गिर पड़ता है, तब कहते हैं कि उसे 'मूर्च्छा' या 'मोह' रोग हो गया है। साधारण बोलचाल की भाषा में मूर्च्छा को बेहोश होना, गश आना या जोफ़ आना कहते हैं।

» नोट-थोड़ी-सी बेहोशी को 'मोह' और एकदम बेहोश हो जाने को 'मूर्च्छा' कहते हैं।

मूर्च्छा के निदान कारण।


इन कारणों से मूर्च्छा बेहोशी रोग होता है-(१) क्षीणता होना, (२) पित्त-दोष का

बहुत ही बढ़ जाना , (३) विरुद्ध भोजन करना, (४) मल-मूत्रादि के वेगों को रोकना,

(५) लकड़ी वगैरः की चोट लगना, (६) सत्वगुण की कमी होना।


निदानपूर्वक सम्प्राप्ति।


जो मनुष्य क्षीण हो जाता है, जिसका पित्त-दोष बहुत ही बढ़ जाता है, जो विरुद्ध आहार सेवन करता है, जो मल-मूत्र आदि वेगों को रोकता है, जिसके किसी तरह की चोट लग जाती है और जो हीन-सत्य हो जाता है, उस मनुष्य की इन्द्रियों के बाहरी और भीतरी स्थान में जब उन दोष जम जाते हैं, तब मनुष्य मूर्छित या बेहोश हो जाता है।

खुलासा-जो आदमी क्षीण हो जाते हैं, जो दूध-मछली प्रभृति को एक साथ खाते हैं, जो दिशा-पेशाब वगैरः को रोकते हैं, जिनको लट्ठ वगैरः की भारी चोट लग जाती है, जिनमें सतोगुण की कमी और तमोगुण की अधिकता होती है, उनके

बाहरी और भीतरी-नेत्र प्रभृति इन्द्रियवाही और मनोवाही स्रोतों में जब दोष कुपित होकर ठहर जाते हैं, तब उन्हें 'मूर्छा होती है।


" नोट-१. कोई ज्ञानेन्द्रियों का स्थान हृदय को मानते हैं और कोई दिमाग को।

" नोट-२. एक-एक दोष से मूर्छा होती है। तीनों दोषों के समुदाय से मूर्छा होती है, ऐसा नहीं समझना चाहिये।

" नोट-३. "अल्प सत्वगुणं वाले को मूर्छा होती है", इसका अर्थ यह है कि अधिक तमोगुण वाले को मूर्छा होती है; क्योंकि मूर्छा में पित्त और तमोगुण की अधिकता होती है।

" नोट-४. 'हारीत-संहिता' में लिखा है-मनुष्य की पाँचों इन्द्रियों से बारहबारह माड़ियों का सम्बन्ध है; यानी कुल मिला कर १२४५-६० नाड़ियाँ हैं, जिनका इन्द्रियों से लगाव है। जब कुपित हुए दोष इन नाड़ियों के द्वारों को रोकते हैं, तब मनुष्य मूच्छित होता है।


मूर्च्छा बेहोशी के सामान्य लक्षण।


संज्ञा को बहाने वाली नाड़ियों के, वायु आदि दोनों से पीड़ित होने पर एकाएक, सुख और दुःख का ज्ञान नाश करने वाला तमोगुण प्राप्त होता है। जब तमोगुण का दौर-दौरा हो जाता है, तब मनुष्य को सुख दुख का ज्ञान नहीं रहता और वह काठ या लकड़ी की तरह जमीन पर गिर पड़ता है। इस रोग को 'मूर्छा' या 'मोह' कहते हैं। मूर्छा के पर्याय शब्द-संजोपघात, मूनि, मूछो, मूर्छन, कश्मल, प्रलय और मोह हैं। जिस मोह से मनुष्य मुर्दे के समान हो जाता है, उसे 'संन्यास' कहते हैं।

मूर्च्छा के भेद।

मूर्च्छा-रोग छह प्रकार का होता है। ''सुश्रुत'' में लिखा है।


वातादिभिः शोणितेन मोन च विषेण च।

षट्स्वपि तासु पित्तं हि प्रभुत्वेनावतिष्ठते॥

वात से, पित्त से, खून से, शराब से और विप से इस तरह छह प्रकार की मूर्च्छा- होती है। इन सभी तरह की मूर्च्छाओं में ही पित्त की प्रधानता होती है। कहा है- "मूळ पित्ततमः प्रायेति"।  अर्थात् मूर्चा में पित्त और तमोगुण की अधिकता होती है।

खुलासा यह है कि यों तो बात से, कफ से, खून से, शराब से और विष से मूर्छा होती है; पर सभी तरह की मूर्च्छाओं में पित्त का जोर ज़्यादा होता है। खाली पित्त से ही मूर्च्छा नहीं होती; वात से भी होती है और कफ़ से भी होती है; पर इनमें राजा पित्त ही रहता है। पित्त तो सभी मूर्च्छाओं में रहता है, पर जिसमें बात का ज़ोर ज़्यादा होता है, वह वातज मूर्च्छा कहलाती है। इसी तरह जिसमें कफ पयादा होता है,वह कफ़ज मूर्च्छा कहलाती है। 


मूर्च्छा के छह भेद ये हैं।


(१) वातज (३) कफज (५) मधज, और

(२) पित्तज (४) रक्तज (६) विषज।

» नोट-यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि पित्त तो सत्वगुण-प्रधान और चैतन्यता का कारण है, फिर उससे मूर्च्छा क्यों होती है? इसका जवाब यह है कि अपने स्थान पर रहा हुआ शुद्ध पित्त सत्वगुण-प्रधान और चैतन्यता का हेतु होता है, पर दूषित और उद्विक्त (फूटा हुआ या चिहित) पित्त अज्ञानकारक हो जाता है।

मूर्च्छा के पूर्वरूप- (१) हृदय में पीड़ा या कलमलाहट-सी होना,

(२) जंभाइयाँ आना, (३) ग्लानि होना, (४) संज्ञा का नाश होना या होश-हवास

विगड़ना, (५) बल का नाश होना या कमज़ोरी आना।

वातज मूर्च्छा.. के लक्षण-जिसे बात की मूछा होती है, वह मनुष्य आकाश

को नीला, काला या लाल देखता-देखता बेहोश हो जाता है और फिर तत्काल ही होशमें आ जाता है। ऐसे रोगी के शरीर में कँपकँपी आती है, अगों में तोड़ने की पीड़ा होती है, हृदय में वेदना होती है, शरीर दुर्बल हो जाता है और उसका रंग स्याहीमाइल लाल हो जाता है।

पित्तज मूर्च्छा.. के लक्षण-अगर रोगी आकाश को लाल, हरा अथवा पीले रंग का

देखता-देखता बेहोश हो जाय और पसीने आकर फिर होश में आ जाय, प्यास लगे, सन्नतापहो, आँखें लाल और पित्त से व्याकुल हो जायें, दस्त पतला होने लगे और शरीर का रङ्ग पीला हो जाय, तो समझो कि पित्त की मूर्च्छा है।

कफ़ज मूर्च्छा.. के लक्षण-अगर आदमी आकाश को सफ़ेद बादलों से बका

हुआ देख कर अथवा घोर अन्धकार से घिरा हुआ देख कर बेहोश हो जाय और फिर बहुत देर बाद होश में आये, शरीर गीले चमड़े से ढके हुए की तरह भारी जान पड़े,मुँह में पानी भर-भर आये, उबकाइयाँ आयें, तो समझो कि कफज मूर्च्छा है।

त्रिदोष की मूर्च्छा के लक्षण-जो मूर्छा सत्रिपात या वात, पित्त और कफतीनों दोषों से होती है, उसमें तीनों ही दोषों के लक्षण देखने में आते हैं। इस मूर्ख वाला, अपस्मार या मृगी वाले की तरह, बड़े जोर से गिर जाता और गिर कर बहुत समय बाद होश में आता है। कहा है

सर्वापात को मूर्च्छा में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं। यह रोग दूसरा अपस्मार या मृगी है। यह मूछो तत्काल प्राण- नाश करती है, इसका इलाज होशियारी से करना

" नोट- यहाँ यह सबाल होता है कि जब मृगी और सभिपात की मूर्च्छा के

लक्षण एक ही से हैं, तब इन दोनों में फ़र्क कैसे समझा जाय? इसका जवाब चरक मुनि इस तरह देते हैं कि मृगी-रोगी झागदार वमन करता है, दाँत चबाता है और उसके नेत्रों का ढा और ही तरह का हो जाता है आदि-आदिः पर सन्निपात की मूर्च्छा में ये लक्षण और चेष्टायें नहीं होती।

खून की मूर्च्छा के कारण-पृथ्वी और पानी में तमोगुण के अंश बहुत ज़्यादा हैं, और गन्ध तथा यून पृथ्वी और पानी के पदार्थ रूप हैं यानी गन्ध और खून पृथ्वी और पानी के अंशों से बनेहैं-तत्व् हैं। इसलिये सतोगुणी और रजोगुणी नहीं हैं, किन्तु तमोगुणी मनुष्य खून की बू या रुधिर की गन्ध सूंघने या सुंघाने से बेहोश हो जाते हैं। इस विषय में बहुत से मत हैं। कोई-कोई कहते हैं कि यह युक्ति ठीक नहीं है, क्योंकि चम्पा की गन्ध भी तो पृथ्वी-सम्बन्धी है, अत: उसको गन्ध से भी मूर्च्छा होनी चाहिये, पर उसको गन्ध से मूर्च्छा नहीं होती।

कोई-कोई कहते हैं कि खून की गन्ध से नहीं, किन्तु देखने से मूर्च्छा होती है। यह मूर्च्छा रुधिर या खून के ऐसा स्वभाव होने से होती है। किन्तु भोज' कहता है कि खून के देखने से भी मूर्च्छा होती है और उसके गन्ध से भी

मूर्च्छा-रोग में पथ्यापथ्य -

पथ्य-शीतल जल के छींटे देना, मणि अथवा हार पहनना, शीतल पदार्थों का लेप करना, तिल का तेल मलवाना, बहती हुई नदी या तालाब में स्नान कराना, पंखे की हवा, शीतल सुगन्धित द्रव्य मिले हुए पानी के पदार्थ, फव्वारे वाला मकान, चन्द्रमा की शीतल किरणें, धूमपान-धुआँ पीना, अंजन आँजना, नस्य लेना, फ़स्द खोलना,  कहानियाँ कहना, ऊँची आवाज से बोलना, मनोहर बाजे ज़ोर से बजाना, रोगी को भूली हुई बातों की याद कराना, आत्मज्ञान में लगाना और धीरज धराना-ये सब मूर्च्छा-रोग में पथ्य हैं।


छाया, वर्षा का पानी, सौ बार का धोया घी, कोमल और तीखे रस, खीलों का मॉड, पुराने जौ, लाल चावल, हाँड़ी का घी, मूंग और मटर का यूष, राग-खांडव, गाय का दूध, मिश्री, पुराना पेठा, परवल, केले की गहर,अनार, नारियल, चौलाई, हल्के अन्न, नदी-तट के कुएं का पानी, सफ़ेद चंदन, कपूर का जल, नेत्रबाला और शीतल बालू-ये सब मूर्च्छा रोग में पथ्य हैं।

दिन के समय पुराने चावलों का भात; मूंग, मसूर, चना और उड़द की दाल; परवल, पका कुम्हड़ा, बैंगन और गूलर आदि का साग; दही, मक्खन, दाण, अनार,पके आम, पका पपीता, शरीफा और कच्चा नारियल वगैरह मूर्छा-रोगी को पथ्य हैं। रात के समय पूरी, रोटी, हलवा, मोहन भोग, दूध, घी, मैदा या सूजी के पदार्थ और मिठाई देना पथ्य है।

सवेरे के समय गाय का धारोष्ण दूध और शर्वत पीना पथ्य है। अन्य समय मिली-मिला और कपूर से सुवासित किया हुआ आमले आदि का पना, मधुर औषधियों के द्वारा पकाया हुआ दूध, अनार का रस ये सब भी पथ्य और रोग नाशक हैं।


अपथ्य-ताम्बूल (पान), मेथी आदि पत्तों के साग, दाँत घिसना; धूप में फिरना, विरुद्ध अन-पान, स्त्री-प्रसंग, पसीने निकालना, चरपरे रस सेवन करना; प्यास,नींद और मल-मूत्र आदि के वेग को रोकना, माठा या छाछ पीना-ये सब मूळ-रोग में अपथ्य हैं। देर में हजम होने वाले, तीक्ष्ण-वीर्य, रूखे और खट्टे पदार्थ खाना; अधिक मिहनत करना, चिन्ता करना, उरना, क्रोध या शोक करना, शराब पीना, रात-दिन बैठा रहना, आग तापना, इच्छा-विरुद्ध काम करना, घोड़े आदि की सवारी करना, रात को जागना और दाँतुन करना-ये सब भी मूर्च्छा-रोग में अपथ्य हैं।

👉👉 इसे भी पढ़े दाह रोग शरीर कि जलन का आयुर्वेदिक उपचार

मूर्छा-नाशक नुसखे

(१) बेरों का गूदा, काली मिर्च, ख़ास और नागकेशर को बराबर-बराबर ले सिल पर ठण्डे पानी के साथ महीन पीस लो और फिर ठण्डे पानी में घोल कर पिला दो। इस नुसखे से मूर्छित होश में आ जाता है। सुपरीक्षित और सर्वोत्तम नुसखा है।

(२) छोटी पीपरों का महीन चूर्ण शहद' में मिला कर चटाने से मूर्च्छा-रोग नष्ट हो जाता है। हमारे द्वारा सुपरीक्षित है।

(३) पंचमूल का कषाय (काढ़ा) 'मित्री और शहद' में मिला कर पिलाने से मूर्च्छा नष्ट हो जाती है। परीक्षित है।

(४) कमल का कन्द या जड़, कमल की नाल, पीपर और हरड़-इनको बराबर-बराबर ले कर और पीस-छान कर शहद के साथ चटाने से मूर्च्छा नष्ट हो जाती है।

(५) दाख, चीनी, अनार, धान की खीलें, दही का तोड़ या दही का पानी,नीले कमल और सफेद कमल-इन सब का हिम या शीत-कषाय पीने से मूर्छा नष्ट हो जाती है।

 'पित्त-ज्वर-नाशक

काढ़े' पिलाने से मूर्च्छा-रोग चला जाता है।

(६) आमलों के स्वरस के साथ पकाया हुआ घी पिलाने से मूर्च्छा रोग आराम हो जाता है।

(७) सिरस के बीज, पीपर, काली मिर्च, सेंधा नमक, लहसन, मैनसिल और बच-इनको बराबर-बराबर ले कर, गो-मूत्र में महीन पीस लो और अंजन-सा बना कर आँखों में आँजो। इस अंजन से मूर्छित होश में आ जाता है।

(८) शहद, सेंधा नोन, मैनसिल, काली मिर्च-इनको बराबर-बराबर लेकर, काजल के समान महीन पीस लो और आँखों में आँजो। इस अञ्जन से भी मूर्च्छा नष्ट होता है।


आगर् आपका कोई प्रश्न् है तो आप हमें कमेंट या ईमेल कर सकते है

धन्यवाद Gk Ayurved