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सोमवार, 24 मई 2021

अजीर्ण-वर्णन अजीर्ण का आयुर्वेदिक उपचार

 अजीर्ण-वर्णन

   साधारण लक्षण 


सभी तरह के अजीरणों में ग्लानि होती है, शरीर और पेट भारी रहते हैं, पेट में शूल-से चलते हैं, अपान वायु नहीं सरकती यानी हवा रुक जाती है, कभी दस्त-कब्ज हो जाता है तो कभी अजीर्ण या बदहजमी के दस्त होते हैं, खट्टी-खट्टी हकारें आती हैं, खाने के बाद कय होती हैं या जी मिचलाता है। बस यही अजीर्ण की सीधी पहचान है। 

वैद्यविनोद' में लिखा..

 हैग्लानिवम्धप्रवृत्तिवाँ सामान्याजीर्ण लक्षणम। 

शर में ग्लानि या मल का अवगेध अथवा दस्तो का ज्यादा होना-अजीर्ण के धरगमान्य' लक्षण हैं। | भोजन पचने का लक्षण प्यास और भूख का अथवा शरीर हलका मालूम होना-ये जीर्णाहर या भोजन पचने के लक्षण हैं। 

अजीर्ण की किसें अजीर्ण ६ तरह के होते हैं :आम अरजीर्ण, (२) विद अजीर्ण, (३) विष्टद्य अजीर्ण, (४ शेष अजीर्ण, (५) दिनपाकी अजीर्ण, (६) प्राकृत अजीर्ण। कौन अजीर्ण किस तर होता है ? 

(१) कफ के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है। (२) पित्त के प्रकोष से विदाधाजीर्ण होता है। (३) वायु के प्रकोष से विष्टभाजीर्ण होता है। (४) रसे के शेष रहने, यानी रक्तादि रूप में परिणत ने होने से रसशेषाजीर्ण होता है। (५) दिन भर में भोजन न पचने से दिनपाकी अजीर्ण होता है। (६) स्वाभाविक या प्राकृत अजीर्ण स्वभाव से नित्य होता है। . 

अजीर्ण के कारण

(१) दैहिक कारण 

(१) बहुत जल पीना, (२) भोजन के समय के बाद भोजन करना, (३) मलमूत्रादि वेगों को रोकना, (४) रात को जागना, (५) दिन में सोना, ये पाँच तो देह से सम्बन्ध रखने वाले कारण हैं। 

 (२) मानसिक कारण 

(१) ईर्ष्या, (२) भय, (३) क्रोध, (४) लोभ, (५) शोक, (६) दीनता, और (७) मत्सरता-ये अजीर्ण के मानसिक कारण हैं। उपरोक्त दैहिक और मानसिक कारणों से, भोजन के समय किया हुआ स्वभाव के अनुकूल भोजन भी नहीं पचता; अजीर्ण हो जाता है। 

अजीर्णों के लक्षण 

(१) आम अजीर्ण के लक्षण

 इस अजीर्ण के होने से पेट और शरीर में भारीपन होता है, जी मिचलता है, गालों और आँखों पर सूजन आ जाती है। खट्टा, मीठा प्रभृति जैसा भोजन किया जाता है, उसी तरह की डकारें आती हैं।

 (२) विदग्ध अजीर्ण के लक्षण 

इस अर्जीर्ण में भ्रम, प्यास, मूर्च्छा, पित्त के अनेक रोग, धुएँ के साथ खट्टी डकारें, पसीना और दाह-ये लक्षण होते हैं। 

(३) विष्टब्ध अजीर्ण के लक्षण - 

इस अजीर्ण में शूल, अफारा, अनेक प्रकार की बादी की पीड़ायें, मल और अधोवायु का रुकना, शरीर का जकड़ जाना, मोह और देह में दर्द-ये लक्षण होते हैं। का" नोट--याद रखो, पहला कफ से, दूसरा पित्त से और तीसरा विष्टब्धाजीर्ण वायु के कोप से होता है। 

(४) रस-शेष अजीर्ण के लक्षण « 

इस अजीर्ण में अन्न में अरुचि, हृदय में जड़ता और देह में भारीपन होता है।

 (५) दिनपाकी अजीर्ण के लक्षण 

इस अजीर्ण वाले को रात-दिन में भोजन पचता है और इसमें अफारा और हड़-फूड़न आदि कुछ नहीं होता। 

(६) प्राकृत अजीर्ण 

यह अजीर्ण नित्य ही रहता है, क्योंकि स्वाभाविक है; विकृतिजन्य नहीं है। इसके पचाने के लिए 'सुश्रुत” ने ये उपाय लिखे हैं-

(१) भोजन करके सौ कदम टहलना, (२) बाईं करवट सोना, (३) अपने दिल को भाने वाले पदार्थों को छूना, देखना, सुनना, सूँघना और चखना; जैसे मनोहर कामिनियों पर हाथ फेरना, रूपवती स्त्रियों को या अन्य सुन्दर चीजों को देखना, गाना सुनना, फूल और इत्र आदि सूँघना तथा स्वादिष्ट पदार्थ चखना। यह अजीर्ण इन उपायों से पच जाता है। इसके लिए दवा की जरूरत नहीं। 

अजीर्ण के उपद्रव 

मूर्छा-बेहोशी, आनतान बकना, वमन, मुँह से लार गिरना, ग्लानि, भ्रम और मरण-ये अजीर्ण के उपद्रव हैं। 

नोट-मरण का यह मतलब है, कि अजीर्ण बहुत बढ़ जाने से मनुष्य को मार भी डालता है। 

अजीर्ण का असल कारण क्‍या हैं ? 

जो अनाप-शनाप नाक तक दूस-ठूस कर खाते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ उनके अपने वश में नहीं हैं, जो पशुओं की तरह खाते हैं, उनको अनेक रोग पैदा करने वाला अजीर्ण' होता है। 

 अजीर्ण की साधारण चिकित्सा 

(१) आमाजीर्ण में वमन करा देने से लाभ होता है। (२) विदग्धाजीर्ण में लंघन या उपवास से लाभ होता है। (३) विष्टब्धाजीर्ण में पसीना कराने से लाभ होता है। (४) रस-शेषाजीर्ण में भोजन से पहले दिन में सोने से, लाभ होता है। . 

विशेष आयुर्वेदिक चिकित्सा 

आमाजीर्ण की चिकित्सा

 (१) सेंधानोन १ तोला और बच २ तोला ले कर पीस लो और गरम जल में मिला कर रोगी को पिला दो और कय कराओ। कय में दूषित पदार्थ निकल जायँंगे और रोग आराम हो जायगा। यह वमनकारक दवा रोगी को उस हालत में दो, जबकि आमाशय बहुत भारी मालूम होता हो।

नोट--अजीर्ण में सबसे पहले अजीर्ण पैदा करने वाले कारणों को त्याग दो। बिना कारण त्यागे, अजीर्ण कभी आराम न होगा। सभी अजीर्णों में उपवास करना सर्वोत्तम उपाय है। विशेष कर, आमाजीर्ण की पहली हालत में तो लंघन हितकारी है। परन्तु बालक, बूढ़े और दुर्बलों को उपवास कराना अच्छा नहीं। उनको, उनकी प्रकृति के अनुसार, हल्का और थोड़ा भोजन देना उचित है। अजीर्ण में क्या-क्या पथ्य और अपथ्य हैं, यह हमने आगे लिखा है। जो पथ्य हो उसके देने में हानि नहीं; पर विचार की सर्वत्र दरकार है। 

(२) धनिया और सोंठ का काढ़ा पीने से आमाजीर्ण शान्त होता है, शूल नष्ट होता है और मूत्राशय साफ होता है। 

(३) दिन में चार बार गर्म जल पीने से आमाजीर्ण में लाभ होता है। 

(४) सोंठ और सौंफ-दोनों को बराबर-बराबर ले कर, पीस-कूट-छान कर और मिश्री मिला कर, सेवन करने से आमाजीर्ण शान्त होता है। 

(५) सौंफ, पोदीना, गुलाब के फूल, तेजपात और बड़ी इलायबी-सबको तीन-तीन माशे ले कर, एक सेर जल में पका कर रख लो। उसी में से ज़रा-जरा-सा जल पीने से आमाजीर्ण नष्ट होता है। 

(६) हींग, सेंधानोन, सोंठ, कालीमिर्च और पीपल--इनको बराबर-बराबर ले कर, जल के साथ सिल पर पीस कर, लेप-सा बना लो और पेट पर बारम्बार इसी का लेप करो। इससे आमाजीर्ण की पीड़ा शान्त हो जायगी। 

(७) छोटी हरड़, सोंठ, नागकेसर और कालानोन-इनमें से प्रत्येक को चार-चार माशे ले कर, पाव-भर जल में पीस कर, जरा सी हींग डाल कर दिन में कई बार, जरा-जरा-सा पीने से आमाजीर्ण शान्त होता है। 

(८) बड़ी इलायची ३ माशे, दालचीनी ६ माशे, नागकेसर ९ माशे, काली-मिर्च १२ माशे, पीपल १५ माशे और सोंठ १८ माशे-इन सबको एकत्र कूट-पीस कर चूर्ण बना लो। इसको दिन में २-३ बार सेवन करने से आमाजीर्ण नष्ट हो जाता है। 

(९) सज्जीख़ार, जवाख़ार, कालानोन, साँभरनोन, सेंधानोन, कचियानोन, बिड़नोन, भुना सुहागा, आमलासार गन्धक, सोंठ, मिर्च, पीपलामूल, चीता, अजवायन और बायबिड़ंग-इन सब दवाओं को समान भाग ले कर, कूट-पीस लो और पीछे आक के पत्तों के रस में खरल करो। इसके बाद सेंहुड़ या थूहर का एक डण्डा पोला करके, उसमें खरल किये चूर्ण को भर दो और ऊपर से कपड़-मिट्टी चढ़ा दो। इसके बाद २५ उपलों की आग में उस कपड़-मिट्टी चढ़े डण्डे को रख कर पकाओ। जब आग ठण्डी हो जाय, निकाल लो। डण्डे के ऊपर की मिट्टी उतार कर, डण्डे में से दवा को निकाल लो। इस नमक के सेवन करने से आमाजीर्ण और हर प्रकार के अजीर्ण नष्ट होते हैं। मात्रा--४ रत्ती। अनुपान--माठा या दही का तोड़। 

(१०) शुद्ध मीठा विष १ भाग, सोंठ २ भाग, कालीमिर्च ३ भाग और पीली कौड़ी की भस्म ४ भाग-इन सबको कूट-पीस, खरल में डाल, जम्भीरी नीबू के रस में, उड़द के दाने-बराबर गोलियाँ बना लो। इनको सेवन करने से अजीर्ण नष्ट होता और तत्काल भूख लगती है।  मात्रा-२ या ३ गोली। अनुपान-ताजा जल। 

नोट-ये सब नुसखे परीक्षित हैं। 

विदग्धाजीर्ण की चिकित्सा 

(११) लिख चुके हैं कि विदग्धाजीर्ण में लंघन उपकारी है, पर बहुधा इसमें शीतल जल पीने से भी लाभ होता है। अत: दिन में कुछ न खा कर, केवल थोड़ा-थोड़ा शीतल जल पीना चाहिए। इस अजीर्ण में गुलकन्द-गुलाब प्रभृति से हल्का दस्त करा देना भी अच्छा है। लिखा है-


श्लैष्मिके वमनं पूर्व पैत्तिके मृदु रेचनम्‌। वातिके स्वेदन॑ चाथ यथावस्थं हित॑ च तत्‌॥ 

कफ से उत्पन्न मंदाग्नि या अजीर्ण में पहले वमन करानी चाहिए। पित्त से उत्पन अजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए और बादी से हुए अजीपर्ण में स्वेदन कर्म, बफारा या सेक वगैरः करना चाहिए अथवा जिस समय जैसी अवस्था हो और जो काम उस अवस्था में हितकारी हो, वही करना चाहिए। कहीं लघन से काम हो जाता है, क्रहीं शीवल जल के पीने से और कहीं हलके जुल्गब से। चिकित्सा करने में विचार्बुद्धि और तर्क से क्षण-क्षण॑ पर काम लेना चाहिए। किसी एक ही कायदे को प्रकड़ कर अन्धाधन्ध काम करने से हानि की सम्भावना रहती है।

(१२) सफेद जीरा ४ माशे, सफेद इलायची ४ माशे, सूखा अनारदाना ४ माशे, आल-बुखारा ४ माशे और मुनक्का (बीज निकाला) ४ माशे--इन सबकों एक जगह पीस कर और थोड़ा सेंधानोन मिला कर सेवन करने से पित्त की 'विदश्धाजीर्ण नष्ट होता है। 

(१३) धनिया ४ माशे, इलायची ४ माशे, गुलाब की केसर ४ माशे और सौंफ ४ माशे-सबको पीस कर, इनके वजन के बराबर मिश्री मिला लो। इस चूर्ण को शीतल जल के साथ सेवन करने से पित्त का 'विदग्धाजीर्ण” आराम होता है। 

(१४) छोटी हरड़ का चूर्ण १ माशे, दाख २ माशे, मिश्री ४ माशे और शहद ६ माशे-इन सबको पीस कर और शहद में मिला कर चाटने से पित्त का विदग्धाजीर्ण नष्ट होता है। 

(९५) सोंठ ५ माशे, जीरा ४ माशे, छोटी इलायची ३ माशे, कालीमिर्च २ माशे, पीपल १ माशे और शुद्ध आमलासार-गन्धक ९ माशे-सबको एक जगह मिला कर पीस लो और फिर खरल में डाल कर नीबू का रस दे-दे कर चार-चार रत्ती की गोलियाँ बना लो। एक-एक गोली सुबह-शाम या दिन में ३-४ बार खाने से विदग्धाजीर्ण” और सब तरह के अजीर्ण नष्ट हो जाते हैं। 

(६) बड़ी इलायची का चूर्ण और मिश्री मिला कर तीन-तीन माशे की _ मात्रा से सेवन करने से पित्त का अजीर्ण नष्ट होता है। 

(९७) पोदीना ४ माशे, अम्लवेत ४ .माशे, छोटी इलायची ४ माशे, दाल-चीनी ३ माशे और तालीसपत्र ३ माशे-इन सबको एकत्र कूट-पीस लो और चूर्ण के बराबर मिश्री मिला दो। इस चूर्ण का सेवन करने से पित्त का विदग्धाजीर्ण! नष्ट होता है। 

(१८) नीबू, नारंगी और अनार प्रभूति फलों का सेवन करने से भी विटग्धाजीर्ण नष्ट हो जाता है। 

 मन्दाग्नि और अजीर्ण में पथ्य 

 कफ से उत्पन्न मन्दाग्नि और अजीर्ण-आमाजीर्ण में, नमक मिले गरम जल से वमन करानी चाहिए। पित्त से उत्पन्न विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए और वातज अजीर्ण-विष्टब्ध-अजीर्ण-में स्वेदकर्म-बफूरे प्रभृति से काम लेना चाहिए। अथवा समय पर जैसी जरूरत हो, विचार कर काम करना चाहिए। अजीर्ण की पहली अवस्था में उपवास करना सबसे अच्छा उपाय है। 

 नोट-जहाँ तक हो, जुलाब न देना ही अच्छा है। हाँ, एक दस्त साफ करा देना बुरा नहीं। अजीर्ण में नीचे लिखे आहार और विहार पथ्य या हितकारी हैं:-कसरत, कुश्ती, मिहनत, हल्के और अग्नि प्रदीप्त करने वाले भोजन, बहुत पुराने महीन लाल चावल, यवागू, लाजामंड-खीलों का माँड, मूँग का रस, मदिरा, शाली चावल, बथुआ, छोटी मूली, लहसन, पुराना पेठा, नवीन केले की फली, सहँजना, करेला, परवल, बैंगन, ककोड़ा, ख़स का सुगन्धित जल, आमला, नारंगी, अनार, पापड़, अम्लवेत, जंभीरी नीबू, बिजौरा नीबू, शहद, माठा, काँजी, हींग, नमक, सोंठ, अजवायन, मिर्च, मेथी, धनिया, जीरा, पान, गर्म जल (विदग्धाजीर्ण में शीतल जल), कड़वे और चरपरे रस, बारली, अरारूट और साबूदाना प्रभृति हल्के पदार्थ। मोंठ की दाल में पिसी हुई सोंठ और भुनी हुई हींग डाल कर खाने से पेट का दर्द और अफारा मिटता है। 

भुनी हुई मोंठ नमक-मिर्च लगा कर खाने से शीघ्र ही पच जाती और रुचि बढ़ाती है। 

पहली अवस्था में उपवास करने से, जब अजीर्ण के दोष शान्त हों,रोगी को . साबूदाना, बारली या अरारूट पका कर दो। जब अग्नि बढ़े, सवेरे के भोजन में पुराने चावल का भात, परवल का साग, कच्चे केले की तरकारी, मसूर की दाल, माठा, कागजी नीबू और अदरख के टुकड़े नमक लगा कर दो। शाम के भोजन या ब्यालू में, यदि भूख लगी हो, तो साबूदाना या बारली अथवा और कोई हल्का खाना दो। अगर खूब भूख लगने लगी हो और अजीर्ण न हो, तो आटे में 'अजवायन और नमक' डाल कर पतली-पतली पूरियाँ बना दो और साग तोरई या परवल का दो। रोगी से कह दो; कि भोजन में लोटे-के-लोटे जल न चढ़ा जाये बल्कि उतना ही जल पिये, जितने से गले का ग्रास उतर जाय। वह भी उस दशा में, जब पानी बिना रहे ही नहीं। इस रोग में जितना ही थोड़ा जल पिया जाय, उतना ही अच्छा। हो सके तो खाना खाने के घण्टे-दो-घण्टे या तीन घण्टे बाद थोड़ा-थोड़ा जल पिया जाय। सवेरे, तारों की छाया में, पेट-भर शीतऊू जल पीना अच्छा है। 

राजमण्ड 

चावलों के गरम माँड में' हींग और संचरनोन मिला कर पिलाने से विषम 

और मन्द अग्नि पूर्ण रूप से बढ़ती है। 

८-८ तोले मूँग या चावलों को ३२ तोले जल में पकाओ। जब यह पक जाय, माँड को पसा लो और उसे गाय के घी में भून लो। इसके बाद उसमें भुनी हींग, सेंधा नोन, सोंठ, मिर्च, पीपर और धनिया-इन सब का एक माशा चूर्ण मिला दो और खूब स्वच्छ चमकदार चाँदी या काँच के बर्तन में रख कर, एक चतुरा विलासिनी कामिनी के हाथ में दे कर रोगी के पास भेज दो। वह स्थान निर्जल, निर्वात और निर्जन हो; यानी वहाँ न तो कोई आदमी हो, न बाहरी हवा आती हो और न जल हो। वह स्त्री रोगी के पास जा कर, मधुर-मधुर कटाक्ष करती हुई, रोगी को उस अमृत-तुल्य माँड के बर्तन को प्रेम से दिखाये। अगर इस तरह राजमण्ड पिया जाय, तो वह अग्नि दीप्त करके तीनों दोषों को हरेगा। कहा है :-

किचित्कटाक्षं सा दत्वा सुंधातुल्य॑ प्रकाशयेत्‌। ततः पिवेद्राजमण्ड दोषत्रयविनाशनम्‌।। 


मन्दाग्नि और अजीर्ण में अपथ्य

मन्दाग्नि और अजीर्ण में नीचे लिखे हुए पदार्थ या आहार-विहार अपथ्य या हानिकारक हैं :-। 


जुलाब लेना (पित्त के विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब बुरा नहीं), मल, मूत्र और अधोवायु के वेगों को रोकना, भोजन-पर-भोजन करना, यानी बिना एक भोजन पचे टूसरा भोजन करना, रात में जागना, मैथुन करना, तेल लगाना, स्नान करना, कभी कम और कभी अधिक खाना, कभी किसी समय और कभी किसी समय भोजन करना और खून निकालना। 

दाल के अनन-मूँग, मोंठ, उड़द, चना वगैर:, मछली, मांस, बहुत जल पीना, पोई का साग, लालमिर्च, पिट्ठी के पदार्थ, घी में पके पदार्थ, तत्काल ब्याई गाय का दूध, विकृत दूध, या घी में पके हुए चावल, दूध, खोया, इमली आदि का पना या और पतले पदार्थ, ईख-रस, ताड़-फल की मींगी, नारियल, धनिया, नेत्रबाला, - ख़राब या गन्दा पानी, अपनी प्रकृति के विरुद्ध अन्न और जल, भारी और देर में हजम होने वाले पदार्थ, भूने-सेके पदार्थ, दाख-मुनक्का या अन्य दस्तावर पदार्थ। 

उड़द मन्दाग्नि रोग में महा अपथ्य हैं; क्योंकि यह पहले दर्जे के गरिष्ट हैं। उड़द की पिट्ठी के लड्डू ताकतवर होते हैं, पर मन्दाग्नि वाले के लिए हानिकारक हैं। ज्वर, वात-प्रकृति वाले और मन्दाग्नि वाले को उड़द नुकसानमन्द और अफारा करने वाली है। 


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धन्यवाद Gk Ayurved





रविवार, 23 मई 2021

हिचकी-रोग का वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 हिचकी-रोग का वर्णन

निदान-कारण 

दाहकारक--छाती और कण्ठ में जलन करने वाले, भारी, अफारा करने वाले, रूखे और अभिष्यन्दी पदार्थ खाने, शीतल जल पीने, शीतल अन्न खाने, शीतल जल में नहाने, धूल और धुआओँ के मुँह और नाक में जाने, गरमी और हवा में घूमने-फिरने,कसरत-कुश्ती करने, बोझ उठाने, बहुत राह चलने, मलमूत्रादि के वेग रोकने और उपवास-ब्रत करने से मनुष्यों को हिचकी, श्वास और खाँसी रोग होते हैं। 


नोट--.सुश्रुत में लिखा है.. कि आम-दोष, छाती वगैर: में चोट लगने, क्षय रोग की पीड़ा, विषम भोजन करने, भोजन-पर-भोजन करने वगैर: से हिचकी, श्वास और खाँसी की उत्पत्ति होती है। 

सामान्य लक्षण 

'प्राण और उदान जायु' कुपित हो कर, बआरम्बार ऊपर की तरफ जाती है। इससे हैक हिक शब्द के साथ वायु निकलती रहती है। 

हिचकी के भेद '

वायु' कफ से मिल कर पाँच तरह की हिचकियाँ पैदा करती है-(१) अन्नजा, (२) यमला, (३) क्षुद्रा, (४) गम्भीरा, (५) महती।

 पूर्वरूप 

हिचकी रोग होने से पहले कण्ठ और हृदय भारी रहते हैं, बादी से मुँह का स्वाद कसैला रहता है, कोख में अफार रहता या पेट में गुड़गुड़ शब्द होता है। 

अन्नजा हिचकी के लक्षण

 अनाप-शनाप खाने-पीने से 'वायु” अकस्मात कुपित हो कर ऊपर की तरफ जा कर अन्नजा नाम की हिचकी पैदा करती है। 

नोट--जल्दी-जल्दी बहुत ही ज़्यादा खाने-पीने से, आमाशय की वायु हठातू 

कूपित हो जाती है और ऊपर की राह से निकलती है। उसके निकलने से हिगू-हिग्‌ आवाज होती है, उसे ही 'हिचकी' कहते हैं। चूँकि यह हिंचकी अन्न के ज़्यादा खाने से होती है, अतः इसे अन्नजा यानी अन्न से पैदा हुई हिचकी कहते हैं। इस हिचकी की दवा-दारु नहीं करनी पड़॒ती। यह चन्द मिनट में आप ही शान्त हो जाती है। 

यमला हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी सिर और गर्दन को कॉँपाती हुई दो-दो बार निकलती है अथवा रुक-रुक कर दो-दो हिचकियाँ आती हैं और उनके आने से सिर और गर्दन काँपते हैं, उन्हें 'यमला' कहते हैं। शक्षः नोट--यमला शब्द का अर्थ दो है, इसी से इसे 'यमला' कहते हैं, क्योंकि एक बार में दो-दो हिचकियाँ आती हैं। यमला हिचकी कष्टसाध्य होती है, पर कभी-कभी असाध्य भी हो जाती है। इसके साथ प्रदाह्, दाह, प्यास और मूर्च्छा का होना घातक है।

क्षुद्रा हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी कंठ और हृदय के समन्धि-स्थान से पैदा होती तथा मन्दे वेग और देर से निकलती है ठसे ' धुद्रा' कहते हैं। 

नोट--्रुद्रा हिचकी देर-देर में और धीरे-धीरे ठठती है। यह सुखमाध्य होती है। कहते हैं, यह जत्रु-मूल अर्थात्‌ काँख और हृदय की सन्धि से उठती है। 

गंभीरा हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी नाभि के पास से उठती है, घोर गंभीर शब्द करती है और जिस के साथ प्यास, श्वास, पसली का दर्द और ज्वर आदि नाना ठपद्रव होते हैं, ठसे 'गंभीरा' कहते हैं। 

नोट--यह हिचकी रोगों के अन्त में प्राय: उपद्रव-रूप से होती है। बहुत करके अन्तिम काल में पैदा होती और मनुष्य को मार डालती है। यह असाध्य समझी जाती है। 

महती हिचकी के लक्षण 

जो हिचकी वस्ति--पेडू, हदय और मस्तक आदि प्रधान मर्म-स्थानों में पीड़ा करती हुई, शरीर के सब अंगों को कँपाती हुई, लगातार चलती रहती है, उसे “महती” या “महाहिक्का' कहते हैं। 

नोट--इस हिचकी में पेडू, हदय और मस्तक आदि मर्म फटते-से जान पड़ते हैं और हिचकी का तार नहीं टूटता। यह हिचकी भी प्राय: रोग के उपद्रव के तौर पर, अन्तकाल में पैदा होती और मनुष्य को मार डालती है। 

असाध्य लक्षण 

गम्भीरा और महाहिक्का पैदा होने से रोगी की मृत्यु में सन्‍्देह करना वृथा है, यानी अवश्य मृत्यु होती है। इसके सिवा और हिचकियों में भी रोगी का शरीर फैल जाय, तन जाय, नजुर ऊपर की तरफ ज़्यादा रहे, नेत्र खड्डों में घुस जाये, देह क्षीण हो जाय और खाँसी चलती हो, तो रोगी के बचने की उम्मीद नहीं। जिस हिचकी में रोगी की देह तन जाय, दृष्टि ऊँची हो जाय, मोह या बेहोशी हो, रोगी क्षीण हो जाय, भोजन से अरुचि हो और छोंक ज़्यादा आयें, उस हिचकी वाला रोगी आरोग्य लाभ नहीं करता। जिस रोगी के वातादि दोष अत्यन्त सज्चित हों, जिसका अन्न छूट गया हो, जो दुबला हो गया हो, जिसकी देह नाना प्रकार की व्याधियों से क्षीण हो रही हो, जो बूढ़ा हो और जो बहुत ही ज़्यादा मैथुन करने वाला हो--ऐसे आदमी के कोई एक हिचकी पैदा हो कर प्राणनाश करती है। अगर यमला हिचकी के साथ प्रलाप, दाह, प्यास और बेहोशी हो, तो यह भी प्राण नष्ट करती है। जिस रोगी का बल क्षण न हो कर मन प्रसन्न हो, जिसकी धातुएँ स्थिर हों और इन्द्रियों में भरपूर ताकत हो--वह यमला हिचकी वाला आराम हो सकता है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों-वाला आराम हो नहीं सकता। 

हिचकी की भयंकरता 

यों तो हैजा और सन्निपात ज्वर आदि अनेक रोग-प्राण नाशक हैं, पर श्वास और हिचकी-रोग जैसी जल्दी मनुष्य के प्राण नाश करते हैं, वैसी जल्दी और रोग प्राण-संहार नहीं करते। अतः हिचकी और श्वास में गफ़लत हरगिजु न करनी चाहिये। 

हिचकी-चिकित्सा में याद रखने योग्य बातें 

(१) जो औषधि या अन्न-पान “कफ और वायु' को हरने वाले, गरम और वायु को अनुलोमन करने वाले हों--वे सब श्वास और हिचकी में हित हैं। 


(२) हिचकी और श्वास-रोगी के शरीर में पहले तेल की मालिश करनी चाहिये। इसके बाद स्वेदन-क्रिया यानी पसीने को निकालने के उपाय करने चाहिये तथा वमन ओर विरेचन कराना चाहिये। लेकिन अगर हिचकी और श्वास-रोगी कमज़ोर हों, तो वमन-विरेचन न करा कर रोग-नाशक औषधि दे देनी चाहिये। 

सुश्रुत में लिखा है -

विरेचनं पथ्यतमं ससैन्धवं, घृतं सुखोष्णं च सितोपलायुतम। 

हिचकी रोग में सैंधानोन मिला हुआ विरेचन या जुलाब अत्यन्त पथ्य है। निवाया घी मिश्री मिला कर पीना भी हितकारी है। 

और भी कहा है -

सर्पि; कोर्ष्ण क्षीरमिक्षो रसो वा, नातिक्षीणे रत्रंसनं छर्दनं ज। 

हिचकी रोग में निवाया घी या ईख का रस हितकारक है। अगर हिचकौ-रोगी अठि क्षीण या कमजोर न हो, तो उसे दस्त और क॒य कराने चाहियें; यानी बलवान रोगी को वमन-विरेचन कराने चाहिये, कमजोर को नहीं। 

हिचकी में पथ्यापथ्य 

पथ्य 

पसीना देना, कय कराना, नस्य देना, धुआँ पिलाना, जुलाब देना, दिन में सुलाना, शीतल पानी के छींटे मारना, एकाएक डराना-धमकाना, भुलाना, गुस्सा दिलाना और खुश करने वाली बात कहना, प्राणायाम कराना, जली हुई गरम मिट्टी सूँघधाना, कुशा की कूँची या धारा से जल छोड़ना, नाभि के ऊपर दबाना, चिराग पर जलाई हुई हल्दी की गाँठ से दागना, पैरों से ऊपर दो अंगुल पर अथवा नाभि से ऊपर दो अंगुल पर दाग देना--ये सब काम हिचकी रोगी को पथ्य या हितकर हैं। 

पुरानी कुलथी, पुराने गेहूँ, पुराने साँठी चावल, जौ, पका कैथा, लहसन, परवल, नरम मूली, पोहकरमूल, काली तुलसी, शराब, खस का जल, गरम जल, बिजौरा नीबू, शहद, गोमूत्र तथा और सब वात-कफ्‌-नाशक अन्न-पान हिचकी वाले को पथ्य हैं। 

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बहुत कर के जिन आहार-विहारों से वायु का अनुमोल हो, वायु का नाश हो वे अथवा उष्णवीर्य क्रियाएँ हिचकी और श्वास में पथ्य हैं। हिचकी रोग में पेट पर और श्वास रोग में छाती पर तेल मल कर पसीना निकालना और कय कराना पथ्य है, परन्तु कमज़ोर रोगी को वमन कराना नुकसानमन्द है। अगर वायु का उपद्रव ज़्यादा हो, तो इमली का भिगोया पानी पीना, नीबू निचोड़ कर मिश्री का शर्बत पीना और नदी या तालाब में स्नान करना पथ्य है, पर अगर कफ बढ़ा हुआ हो, तो ये सब हानिकारक है। इसलिये दोष का विचार करके ये पदार्थ देने चाहियें। 

हिचकी और श्वास वाले को रात को बहुत ही हल्का भोजन देना चाहिये। हिचकी वाले को गरम घी मिला हुआ पुराना चावलों का गरमागर्म भात बहुत ही उपकारी है। अनेक बार ऐसे भात से ही हिचकी नष्ट हो जाते देखी है। 

अपथ्य 

अधोवायु, मल-मूत्र, डकार और खाँसी आदि के वेग रोकना, धूल में रहना, धूप में बैठना या घूमना, मेहनत करना, हवा में रहना, विलम्ब या देर में हजम होने वाले पदार्थ खाना, दाहकारी या जलन करने वाली चीजें खाना, चौला, उड़द, पिट्ठी के पदार्थ, तिल के पदार्थ खाना, भेड़ का दूध पीना, अनूप देश या बहुत पानी वाले देशों के पशु पक्षियों का मांस खाना, दाँतुन करना, गुदा में पिचकारी लगाना, मछली, सरसों, खटाई, तुम्बी का फल, कन्दों के साग, तेल में छौंका हुआ चौलाई का साग, भारी और शीतल खाने-पीने के पदार्थ हिचकी रोग में अपथ्य या हानिकारक हैं। भारी ओर देर में पचने वाले पदार्थ खाना, ज़्यादा खाना, रात मेंजागना,चिन्ता-फिक्र या क्रोध करना, रंज करना, लाल मिर्च, अमचूर और दही आदि भी अपथ्य हैं। 


 हिचकी-नाशक आयुर्वेदिक नुसखे


(१) बिजौरे नीबू के २ तोले रस में ६ माशे शहद और ३ माशे कालानोन मिला कर पीने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(२) मुँगा-भस्म, शंख-भस्म, हरड, बहेड़ा, आमला, पीपर और गेरू-.इन दवाओं का चूर्ण, ना-बराबर घी और शहद में मिला कर चाटने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(३) रेणुका और पीपर के काढ़े में 'हींग' डाल कर पीने से हिचकी निस्सन्देह शान्त हो जाती है। धन्वन्तरि का वचन हे। 

(४) एक पाव बकरी के दूध में दो तोले सोंठ और एक सेर पानी डाल कर औटाने और दूध मात्र रहने पर छान कर पीने से हिचकी नष्ट हो जाती हेै। परीक्षित हे। 

नोट... सुश्रुत' में लिखा हे, यह दूध 'मिश्री' मिला कर खूब पेट भर कर पीना चाहिये। 

(५) सैंधानोन और खीलों का सत्तू मिला कर खाने और ऊपर से खट्टा रस पीने से हिचको नष्ट हो जाती है। 

(६) सोंठ, पीपर और आमले का चूर्ण शहद में मिला कर चाटने से हिचकी आराम हो जाती है। 

(७) काँस की जड़ का चूर्ण शहद में मिला कर चाटने से भयंकर हिचकी नष्ट हो जाती हे।



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शुक्रवार, 21 मई 2021

उबटन लगाना आयुर्वेद मे वर्णन

 उबटन लगाना 


तेल की माशिल करने के बाद, उसकी चिकनाई छुड़ाने और मैल उतारने को उबटन मलना चाहिए। अगर उबटन न लगा सकें, तो चने का चून यानी बेसन ही मल लें। आचार्य भावमिश्र लिखते हें--“चूर्ण के माफिक कोई चीज़ मलने से कफ और मेद नष्ट होते हैं, वीर्य पेदा होता है, बल बढ़ता है, खून की चाल ठीक होती हे तथा चमड़ा साफ और कोमल हो जाता है। उबटन मुँह पर मलने से आँखें मज़बूत और गाल पुष्ट होते हैं तथा मुँहासे ओर झाँई नहीं होतीं। अगर मुख पर झाँई आदि पड़ गई हों, तो नष्ट हो जाती हैं और मुख कमल के समान शोभायमान हो जाता है।” 


आजकल उबटन की चाल बिलकुल कम हो गई है। जिसे देखते हैं, वही गोरों क॑ माफिक गोरा बनने को विलायती साबुन लगाते पाया जाता है। इस बात पर कोई जान बूुझ कर भी ध्यान नहीं देता कि विदेशी साबुन जिन घृणित पदार्थों से बनते हें, उन्हें धर्मभीरु हिन्दू छूने या देखने से भी नाक सिकोड़ते हैं। अगर साबुन बिना काम ही न चले, तो स्वदेशी पवित्र साबुन काम में लाना चाहिए। लेकिन हमारी समझ में, जितना लाभ उबटन से होता है, उतना साबुन से कदापि नहीं हो सकता।* 

 स्नान करना 

स्नान करने यानी नहाने की जैसी चाल भारतवर्ष में है, वैसी और देशों में नहीं है। यूरोप, अमेरिका आदि मुल्कों में भी स्नान करने की चाल है तो सही, किन्तु हिन्दुस्तान के समान नहीं है। यूरोप आदि देशों की आबोहवा या जलवायु सर्द है। वहाँ अक्सर बर्फ पड़ती रहती है, इस कारण वहाँ के लोग स्नान कम करते हैं। किन्तु भारतवर्ष उष्ण-प्रधान देश है*, इसलिए यहाँ के लोग बहुत स्नान करते हैं। वहाँ वाले, यदि यहाँ वालों के समान स्नानों की धूम मचा दें, तो सर्दी के मारे अकड़ जाये आजकल अधिकांश लोग समझते हैं, कि बारम्बार स्नान करने से स्वर्ग मिलता है। स्नान करने से ही स्वर्ग नहीं मिल सकता। मनुष्य-शरीर में नाक, कान, आँख प्रभृति इन्द्रियों से जो मैल निकलता है---बाहर की धूल, गर्द आदि उड़ कर शरीर पर जम जाती है--उस मैल को दूर करने के लिये ही स्नान करना ज़रूरी समझा गया है; क्योंकि . स्नान न करने से शरीर के छिद्र* बन्द हो जाते हैं, वायु का आवागमन रुक जाता है जिससे रक्त-विकार--खून-फिसाद--.प्रभृति अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। देखिये, चरक जी सूत्रस्थान में लिखते हैं--

पवित्र वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम। शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्‌॥ 

“सान--पवित्रता-कारक, वीर्य बढ़ाने वाला, आयु-वद्धक, थकान ओर प्सीगा-वाशक, मेल दूर करने वाला, बल बढ़ाने वाला और अत्यन्त तेज्ञ करने वाला है।” सुश्रुव जी चिकित्सा-स्थान में लिखते हैं +-

निद्रादाहअभ्रमहरं स्वेदकण्ड्तृषापहम। हद्यं मलहरं श्रेष्ठ सर्वेन्द्रियविशों धनम्‌। तन्द्रापापोपशमन तुष्टिदं॑ पुस्त्ववर्द्धनम्‌॥ रक्तप्रसादन॑ चापि स्नानमग्नेश्य दीपनम्‌॥ 

“स्नान करना--ठिद्रा, दाह (जलन), थकान, पसीना, खाज, खुजली और प्यास को नष्ट करता है। स्नान हृदय को हितकारक है; मेल दूर करने वाले उपायों मे परमोत्तम है; समस्त इद्धियों का शोधन करता है; तन्द्रा (ऊँघना) और पाप (दु:ख) का नाश करता है। स्नान करने से चित्त प्रसत्र होता है, पुरुषार्थ बढ़ता है, खूत साफ होता है और अगिन दीप्त होती है।” शीतल जलादि के सींचने से शरीर के बाहर की गर्मी दब कर भीतर जाती है और इसी से मनुष्य की जठराग्नि प्रबल होती है। देखते हैं कि भूख केसी ही कम क्‍यों न हो, स्तान कर चुकते ही कुछ न कुछ अवश्य बढ़ जाती है। 


चरक आदि ऋषियों ने “स्नान” की जैसी प्रशंसा की है, वास्तव में स्नान करना वैसा ही लाभदायक है; परन्तु जितनी बार पाख़ाने जाना या पेशाब करना, उतनी ही बार स्नान करना स्वास्थ्य के हक में लाभदायक नहीं है। एक दिन में कई बार स्नान करने से निस्सन्देह अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यूनानी इलाज करने वाले भी बार-बार स्नान करने को हानिकारक बताते हैं। “इलाजुल गुरबा” हिकमत का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। उसमें लिखा है, “नहाना चाहे गर्म पानी से हो या ठण्डे पानी से, पुट्ठों को अवश्य क्षीण करता है। गर्म पानी से त्वचा (चमड़ा) और रगें ढीली हो जाती हैं और ठण्डे पानी से रगों में शीतमयी सर्दी बढ़ जाती है। बहुत से हिन्दुओं को, जो सदा नहाते हैं, जवानी में गर्मी होने से चाहे हानि नहीं भी मालूम होती हो, परन्तु जब वह जवानी को पार कर जाते हैं, तब रगों और गुर्दों , में निर्बलता के चिह्न प्रकट होते हैं ओर वीर्य क्षीण हो जाता है। आज धर्मान्थ हिन्दू कई बार नहाते हैं, पाखाने (दिशा) जाने के पीछे भी नहाते हैं। यह नहाना उनके शरीर को बहुत ही दुःखदायक है।” 


“इलाजुल-गुरबा” के लेखक ने जो कुछ लिखा है, वह उस देश के लिये बिल्कुल ही ठीक है, जिस देश से यूनानी चिकित्सा सम्बन्ध रखती है। हमारे देश के लिये यह बात ठीक नहीं है। भारतवासियों को नित्य स्नान करना ही लाभदायक है; किन्तु बारम्बार स्नान करना “इलाजुल-गुरबा” के लेखक के मतानुसार बेशक हानिकारक है। हमारे यहाँ मैथुन के बाद, ऊख, जल, कन्द, मूल, फल, दूध, पान॑ और दवा सेवन करने के पीछे भी स्नान करना लिखा है; किन्तु यह भी ठीक नहीं है। धर्म-मत से चाहे ऐसा स्नान स्वर्ग और मुक्ति का देने वाला हो, किन्तु तन्दुरुस्ती के लिये नुकसानमन्द है। “इलाजुलगुरबा” में ही लिखा है---भोजन कर चुकते हीं था मैथुन के उपरान्त शीघ्र ही नहाना हानि करता है। भोजन करके स्नान करने को हमारे वैद्यक में भी बुरा लिखा है। मैथुन करने के पीछे बदन एकदम गर्म हो जाता है। उस समय स्नान करना निस्संदेह नुकसान करेगा; इसी वजह से हकीमों ने मैथुन करने के बाद तत्काल ही, स्नान करने की मनाही की है और यह बात हम भारतवासियों के लिये भी ठीक है। 


*इलाजुल-गुरबा” में लिखा है कि ठण्डे पानी की अपेक्षा गुनगुने पानी से नहाना उत्तम है। हवा में शीतल जल से स्नान करना, विशेष सर्द मिज्ाज-वालों को अवगुण करता है। कफ के स्वभाव वाले को अधिक नहाना मना है। नजले बालों, अतिसार वालों, रोगियों, लड़कों और बूढ़ों को शीतल जल से नहाना विशेष हानिकारक है। हमारे आयुर्वेद में भी गर्म जल के स्नान को अच्छा लिखा है। भावमिश्र जी अपने “भावप्रकाश” में लिखते हैं, “गर्म जल के स्नान से बल बढ़ता एवं वात और कफ का नाश होता है।” हरिश्चन्द्र नामक कोई अनुभवी वैद्य हो गये हैं। उन्होंने लिखा है-

अशीतेनाम्भसा स्नान पय:पानं नवा: स्त्रिय:। एतद्ठो मानवा: पशथ्यं स्निग्धमल्पं च भोजनम्‌॥ 


“हे मनुष्यों । गर्म जल से स्तान करना, दूध प्रीना, जवान स्त्री से सम्भोग करना और घी वगौर चिकने पदार्थों से बढाया हुआ थोड़ा भोजन करना,--ग्रे सदा प्रथ्य अर्थात्‌ हितकारी हो” 


गर्म जल से स्नान करने में इस बात पर खूब ध्यान रखना चाहिये कि गर्म जल सिर पर न डाला जाय; क्योंकि सिर पर गर्म जल डालने से नेत्रों को नुकसान पहुँचता है। किन्तु यदि वात और कफ का कोप हो, तो सिर पर गर्म जल डालने से हानि नहीं है। सुश्रुत कहते हैं :-

उष्णेन शिरसः स्नानमहितं चक्षुष: सदा। शीतेन शिरस: स्तान॑ चश्नुष्यमितिनिर्दिदशेत्‌॥ 

“गर्म जल पिर पर डाल कर स्नान करना आँखों को सदा हानिकारक हैँ। शीतल जल पिर पर डाल कर स्‍तान करना आँखों को लाभदायक है।” 


आजकल, जब कि धातु की क्षीणता से १०० में से ९० मनुष्यों का मिजाज गरम रहता है; शीतल जल से स्नान करना लाभदायक है। विशेष कर गर्मी को ऋतु में तो शीतल जल से स्नान करना परम पथ्य है। जिनकी प्रकृति गर्म हो, उन्हें सब ऋतुओं में ही ठण्डे पानी से नहाना उचित है। शीतल जल के स्नान से उष्णवात (गरम बादी), सूजाक, मृगी, उन्माद, रक्त-पित्त और मूर्च्छा आदि रोगों में बड़ा उपकार होता है। बिनका मिज़ाज सर्द हो, या जिन्हें शीतल जल के स्तान से नुकसान नज़र आता हो, उन्हें गर्म जल से ही नहाना चाहिये। गर्मी में दो बार और जाड़ों में सिर्फ एक बार स्नान करना सब तरह के मिजाज वालों को हितकारी है। 


मनुष्य को सदा साफ जल से स्नान करना चाहिये। मैले कुओं,, सड़े हुए तालाबों या नदी के बिगड़े हुए जल में स्नान करना रोग मोल लेना है। यद्यपि गड्ढ पवित्र, पापनाशिनी ओर मोक्षदायिनी है, तथापि यदि उसका जल भी मैला हो, तो उसमें भी स्नान न करना चाहिये। ऋषियों ने लिखा है-..“ वर्षा ऋतु में सब नदियाँ, स्त्रियों की भाँति, रजस्वला होती हैं, अतएव वर्षा में नदियों में स्नान न करें।” नदियाँ क्या रजस्वला होंगी ? ऋषियों ने जो बात हम लोगों के हक में अच्छी समझी है, उसमें धर्म का पक्ष लगा दिया है। नदियों के रजस्वला होने का यही मतलब हे, कि वर्षा में समस्त नदियाँ चढ़ती हैं। उनमें स्थान-स्थान का मैला, कूडा-करकट, अनेक प्रकार के सर्प आदि विषैले जानवर बह आते हैं, जिससे नदियों का पानी बहुत ही गन्दा हो जाता है। विषैले जीवों और पानी के ज़ोर से मनुष्यों को रोग होने ओर कभी-कभी उनकी जान जाने की भी सम्भावना हो जाती है। बस, यही कारण है कि ऋषियों ने वर्षा में नदियों को रजस्वला कह कर उसमें स्नान करना मना किया है। चरक-संहिता, सूत्रस्थान के २७वें अध्याय में लिखा है :-

बसुधाकीटसर्पाखुमलसंदूषितोदका:। वर्षाजलवहा नद्यः सर्वदोषसमीरणा:॥ 

“पट्टी, कीडे, साँप ओर चूहो आदि को मल (विष्ठा) से दूषित जल वर्षाकाल में, नदियों में मिल जाता है, इस वास्ते वषाकालीन सब नदियों का जल समस्त रोगों की खान होता है।” सुश्रुत-संहिता, सूत्रस्थान के ४५ वें अध्याय में लिखा है +-


कीटमूत्रपुरीषाण्डशवको थप्रदूषितम्‌। 

तृणपर्णोत्करयुतं कलुषं विषसंयुतम्‌॥ योउवगाहेत वर्षासु पिवेद्वापि नवं॑ जलम। स बाह्माभ्यन्तरान्‌ रोगान्‌ प्राणुयात्‌ क्षिप्रमेव तु॥। 


“कीड़े, मूत्र, विष्ठा (पाखाना), जानवरों को अण्डे, लाशें, कीच, घास-पात और कूड़ा करकट वर्षा को जल में मिले रहते हैं। वर्षा का नवीन जल गदला और विषयुक्त होग है। जो मनुष्य उस जल में स्तान करता है या उस नवीन जल को पीता है, उसके शरीर में बाहर होने वाले फ़ोड़े, फुन्सी, नारू (बाला) आदि चमड़े को रोग हो जाते हैं तथा उदर विकार, अजीर्ण, ज्वर आदि भीतरी रोग तत्काल ही हो जाते हो।” 


आजकल इन बातों पर विरला ही ध्यान देता हे। कलकत्ते में ही, जहाँ गंगा में घास पात, सर्प आदि बह आने के सिवा हजारों मल्लाह गंगा की छाती पर मल-मूत्र त्याग करते हैं; लोग घोर वर्षा में भी उसी गंगा में स्नान करते हैं। नतीजा यह निकलता है, कि हज़ारों गंगा-स्नान करने वाले दाद, खुजली, खाज आदि चर्म रोगों में सड़ते दिखाई देते हैं। बुद्धिमान को चाहिये कि नदी, तालाब, कुआँ, बावली या घर पर--जहाँ भी स्नान करे, साफ जल से स्नान करे; क्योंकि जिस तरह मैले जल के पीने से रोग होते हैं, उसी तरह मैले जल के स्नान से भी अनेक बीमारियाँ होती हैं। 


नहाने के समय सिर्फ दो लोटे जल डाल लेना ही अच्छा नहीं है। बदन को खूब मोटे कपड़े से रगड़ना और मल-मल कर नहाना चाहिये ताकि शरीर का मैल अच्छी तरह उतर जाये। स्नान करके चटपट सूखे कपडे से बदन पोंछ लेना उचित है। अपनी गीली धोती से शरीर पोंछना उचित नहीं है। बदन पोंछ कर साफ धुले हुए कपड़े पहन लेने चाहिये। इस तरह स्नान करने से कोई रोग नहीं होता। 

 नहाने की मनाही

 स्नान ज्वरेउतिसारे चर नेत्रकर्णानिलारत्तिषु। आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम्‌॥ 

“बुखार, अतिसार, नेत्र-रोग, कान के रोग, वायु-रोग, पेट का अफ़ारा, पीनस और अजीर्ण रोग वाले स्नान न करें तथा भोजन करको भी स्नान न करें” कसरत करके, स्त्री प्रसंग करके, या कहीं से आ कर भी पसीनों में तत्काल स्नान करना रोग-कारक है। 

 अनुलेप

स्नान करके मनुष्य को किसी-न-किसी तरह का लेप अवश्य करना चाहिये। इससे चित्त प्रसन्न होता और शरीर की बदबू वगैर: नष्ट हो जाती है। सुश्रुत कहते हें: 

सौभाग्यदं वर्णकरं॑ प्रीत्योजोबलवर्द्धनम्‌ स्वेददौर्गन्ध्यवैवर्ण्य॑ भ्रमघ्नमनुलेपनम॥। 

“चन्दन आदि किसी तरह का भी लेप करने से सौभाग्य होता हे, शरीर का र्गे सुन्दर होता है, प्रीति, ओज* और बल बढ़ता है तथा पसीना, थकावट, बदबू एव विवर्णवा--इन सब का नाश होता है।” 

भावमिश्र भी कहते हैं कि लेप करने से प्यास, मूर्च्छा (बेहोशी), दुर्गन्ध पसीना, दाह (जलन) आदि नष्ट होते हैं, सौभाग्य और तेज बढ़ता है, चमडे का रंग निखरता है, तथा प्रीति, उत्साह और बल बढ़ता है। जिन लोगों को स्नान करना मना है, उनको लेप करना भी मना है। 

अब हम नीचे “ भावप्रकाश” से यह दिखलाते हैं कि कौन-सी ऋतु में कौन-सा लेप करना हितकारी है। 

ऋतु अनुसार लेपन की विधि 

* शीतकाल यानी जाड़े के मौसम में “केशर, चन्द्र और काली अगर”-.इन तीनों को घिस कर लेप करना चाहिये, क्योंकि यह लेप गर्म है और वात-कफ-नाशक है। 

ग्रीष्म ऋतु यानी गर्मी के मौसम में “चन्दन, कपूर और सुगन्धबाला ”-...इन तीनों का लेप करना चाहिये, क्‍योंकि ये चीज़ें सुगन्धित और खूब शीतल हैं। 

वर्षा काल यानी मौसम-बरसात में “चन्दन, केसर और कस्तूरी” को घिस कर लेप करना उचित है; क्‍योंकि यह लेप न तो गर्म है, न शीतल है; अर्थात्‌ मातदिल है। 

 अंजन लगाना

आजकल अज्जन लगाने की चाल घटती जाती है। अज्जन या सुर्मा लगाना एक प्रकार का ज़नाना श्रृंगार या आजकल के फैशन के खिलाफ समझा जाता है।* कोई कुछ ही क्यों न समझे, लेकिन सुर्मा लगाने से अनेक प्रकार के नेत्र-रोग निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं। नियमपूर्वक सुर्मा लगाने से किसी प्रकार की आँखों की बीमारी नहीं होती और जवानी में ही चश्मा लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। 


सफेद सुर्मा नेत्रों के लिये परम हितकारी है। इसे नित्य लगाना चाहिये। इसके लगाने से नेत्र-मनोहर और सूक्ष्म वस्तु देख सकने योग्य हो जाते हैं। सिन्ध देश में उत्पन्न हुआ “काला सुर्मा” यदि शुद्ध भी न किया जाय, तो भी उत्तम होता है। इसके लगाने से आँखों की जलन, खाज और कीचडु इत्यादि आना नष्ट हो जाता है। आँखों से जल बहना और उनकी पीड़ा भी दूर हो जाती है। आँखें सुन्दर और रसीली हो जाती हैं। नेत्रों में हवा और धूप सहने की शक्ति आ जाती है और उनमें कोई रोग नहीं होता। 

अज्जन लगाना मना 

रात में जगा हुआ, वमन करने वाला, जो भोजन कर चुका हो, ज्वर-रोगी, और जिसने सिर से स्नान किया हो, उनको सुर्मा लगाना नुकसानमन्द है। 

नेत्र-रक्षक उपाय

अज्जन लगाना निस्सन्देह लाभदायक हे, किन्तु खाली अज्जन ही लगाने से नेत्र-रक्षा नहीं हो सकती। जिन भूलों के कारण नेत्र-रोग होते हैं, अर्थात्‌ जो नेत्र-रोगों के हेतु हैं, बुद्धिमानों को उनसे भी बचना परमावश्यक है; क्योंकि कारण का नाश हुए बिना कार्य का नाश होना असम्भव है। 'सुश्रुत' उत्तर-तन्त्र में लिखा है-../गर्मी से तपते हुए शरीर से एकाएक शीतल जल में घुस जाने या धूप से तपते हुए सिर पर ठण्डा पानी डालने, दूर की चीज़ें बहुत ध्यान लगा कर देखने, दिन में सोने और रात को जागने या नींद आने पर न सोने, अत्यन्त रोने या बहुत दिन तक रोने, रंज या शोक करने, क्रोध या गुस्सा करने, क्लेश सहने, चोट वगैरः लग जाने, अत्यन्त मैथुन यानी बहुत ही स्त्री-प्रसंग करने, सिरका, आरनाल नामक काँजी, खटाई, कुलथी ओर उड़द वगैरः के अधिक खाने, मल, मूत्र और अधोवायु आदि के वेगों* को रोकने, अधिक पसीना लेने, अधिक धूल यानी आँखों में धूल गिरने, अधिक धूप में फिरने, आती हुई वमन यानी कय के रोकने, अत्यन्त वमन (उल्टी) करने, किसी चीज़ की भाफ लेने या जहरीली चीज़ों की भाफ लेने, आँसुओं के रोकने, बहुत ही बारीक चीज़ों के देखने आदि-आदि कारणों से, वात आदि दोष कुपित हो कर, आँखों की अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा करते हैं।” 


''भावप्रकाश” में ऊपर लिखे हुए कारणों के सिवा,  (१) “बहुत तेज़ सवारी पर चढ़ने से भी नेत्र-रोग होना लिखा है।” “इलाजुलगुरबा” में लिखा है-आँखों को झाँप, धुआँ और गन्दी हवा से बचाना चाहिये। ज़्यादा रोना, ज़्यादा मैथुन करना ओर अधिक नशा करना भी नेत्रों को हानिकारक है। हमेशा सूक्ष्म वस्तुओं का देखना भी मना है।” इसके सिवा, बहुत महीन अक्षरों के लिखने-पढ़ने, सिर को रूखा रखने यानी सिर पर तेल न लगाने, सन्ध्या समय पढ़ने, अति परिश्रम करने, दिमाग में अधिक सर्दी या गर्मी पहुँचने, लेटे-लेटे गाने या पढ़ने-लिखने, किरासिन तेल की रोशनी या बिजली की कम रोशनी में पढ़ने लिखने वगैर: कारणों से भी नेत्र-ज्योति  मंद पड़ जाती है। उपरोक्त सब कारणों को टालना नेत्र-रक्षा का पहला उपाय है। 

(२) हरी चीज़ें देखने से नेत्रों का तेज़ बढ़ता है। इस वास्ते बागों की सैर करना या दूसरी हरी-हरी चीज़ों को देखना आँखों के लिये लाभदायक है। 

(३) ऋतु के अनुसार सिर पर चन्दन आदि का लेप करना भी फायदेमन्द है। यही कारण है कि ऋषियों ने चन्दन आदि के तिलक लगाने को भी धर्म में शामिल कर दिया है। 

(४) हर रोज़ दिन में तीन दफे ठण्डे जल से मुँह को भर कर, आँखों को ठण्डे यानी से सींचना या जितनी बार पानी पीना, उतनी बार मुँह धोना ओर आँखों में शीतल जल के छपके देना भी आँखों के लिये मुफीद है। 

(५) मस्तक में रोज़ तेल लगाना चाहिये। यदि रोज़-रोज़ न भी हो सके, तो कैसरे-चोथे दिन तो अवश्य ही लगाना चाहिये। विशेष कर हजामत बनवा कर तो 

तत्काल ही सिर में तेल लगाना उचित है। इस तरह तेल लगाने से नेत्रों का बहुत उपकार होता है। 

(६) सिर पर “मक्खन” रखने और “मक्खन-मिश्री' खाने से भी नेत्रों को बहुत लाभ होता है। “भावप्रकाश” के पूर्वखण्ड में लिखा है-दुग्धोत्थं नवनीतं तु चक्षुष्यं रक्तपित्तनुत!। वृष्यं बल्यमतिस्निग्धं मधुरं ग्राहि शीतलम॥ “दूध से निकला हुआ मक्खन नेत्रों को हितकारी, रक्त-फित्त-गाशक*, धातु पैदा करने वाला, बलदायक, अत्यन्त चिकना, मीठा, ग्राही और शीतल है।” 

(७) पैरों को खूब धो कर साफ रखने, सदा जूता पहनने और पैरों में तेल की मालिश करने से आँखों को बहुत लाभ होता है, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। पाँव की दो मोटी-मोटी नसें मस्तक में गई हैं और ब्रहुत-सी नसें आँखों तक पहुँचती हैं। इसी कारण पाँवों में जो चीज़ें मालिश की जाती हैं, जो सींची जाती हैं या जिन चीज़ों का लेप किया जाता है, वह सब उन नसों के द्वारा आँखों में पहुँचती हैं। 

(८) हमारे यहाँ भोजन के पहले और पीछे, मल-मूत्र त्याग कर और सोते समय जो पैर धोने की चाल है, वह आँखों के लिये लाभदायक समझ कर ही चलाई गई है। दिन में कई बार पैर धोने से आँखों में बड़ी तरावट पहुँचती है और तत्काल ही चित्त प्रसन्‍न हो जाता है। 

(९) त्रिफले (हरड़, बहेड़ा और आमला) के जल से नेत्र धोने से आँखों की ज्योति मन्दी नहीं होती। त्रिफले के काढ़े से आँखें धोने से नेत्र-रोग नष्ट हो जांते हैं। 

(१०) नित्य आमले मल कर स्नान करने से आँखों का तेज़ बढ़ता है। 

(११) काले तिलों को पीस कर, सिर में मल कर स्नान करने से नेत्र उत्तम हो जाते हैं और वायु की पीड़ा शान्त हो जाती है। 

(१२) बुढ़ापे में, भेजे की कमज़ोरी और अग्नि मन्द होने से भी, अक्सर नेत्र-ज्योति कम हो जाती है। बुद्धिमान को चाहिये कि पहले से ही ऐसे उपाय करता रहे, कि दिमागी ताकृत कम न हो तथा अग्नि सदा दीप्त रहे। 

(१३) महीने में एक-दो बार किसी प्रकार का नस्य या सूँघनी सूँघ कर, भेजे का मल निकालते रहने से आँखों को नुकसान नहीं पहुँचता। 

(१४) “इलाजुलगुरबा” में दिन में कई बार सिर में कंघी करना भी नेत्र-ज्योति के लिए उत्तम लिखा है; विशेष कर बूढ़ों के लिए बहुत ही उत्तम लिखा है। 

(१५) हकीम शेखउल्रईस ने कहा है कि साफ पानी में तैरना और उसमें आँखें खोलना भी लाभदायक है। 

(१६) नाक के बाल उखाड़ने से नेत्र-ज्योति कमज़ोर हो जाती है; इस वास्ते नाक के बाल कदापि न उखाड़ने चाहिये। 

(१७) वृद्ध वाग्भट ने कहा है--.“मल, मूत्र, अधोवायु आदि वेगों को जो नहीं रोकते, अज्जन लगाने और नस्य सूँघने का जो यथायोग्य अभ्यास रखते हैं, क्रोध और शोक को जो त्याग देते हैं, उन मनुष्यों को “तिमिर-रोग” नहीं होता है।” 

(१८) देशी तेल का दीपक जला कर पढ़ने-लिखने से आँखों को बहुत लाभ होता है; किन्तु मिट्टी के तेल के लैम्प बगैर: जला कर पढ़ने-लिखने से मनुष्य जवानी में ही अन्धा-सा हो जाता है। 

(१९) वृद्ध वाग्भट में “घी” पीना भी नेत्रों के लिये अच्छा लिखा है। वास्तव 


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गुरुवार, 20 मई 2021

दूध का वर्णन आयुर्वेद के अनुसार दूध इस लोक का अमृत है

 दूध का वर्णन

दूध इस लोक का अमृत है


ईश्वर ने अपनी अनुपम सृष्टि में जीवधारियों की प्राण-रक्षा के लिए जल, फल-फूल, शाक-पात और अनाज आदि जितने उत्तमोत्तम पदार्थ बनाये हैं उनमें 'दूध' सर्वश्रेष्ठ है। दूध समस्त जीवधारियों का जीवन और सब प्राणियों के अनुकूल है। बालक जब तक अन्न नहीं खाता और जल नहीं पीता, तब तक केवल दूध के आश्रय से ही बढ़ता और जीता रहता है। इसी कारण से संस्कृत में दूध को 'बालजीवन' भी कहते हैं। बालकों को जिन्दा रखने, निर्यलों को बलवान करने, जवानों को पहलवान बनाने, बूढों को बुढ़ापे से निर्भय करने, रोगियों को रोग-मुक्त करने और कामियों की काम-वासना पूरी करने की जैसी शक्ति दूध में है, वैसी और किसी चील में नहीं। यह बात निश्चित रूप से मान ली गई है कि दूध के समान पौष्टिक और गुणकारी पदार्थ इस भूतल पर दूसरा नहीं है। सच पूछो तो दूध इस मृत्युलोक का "अमृत" है। जो मनुष्य बचपन से युद्धापे तक दूध का सेवन करते हैं, वे निस्सन्देह शक्तिशाली, बलवान, वीर्यवान और दीर्घजीवी होते हैं।

बाजारू दूध साक्षात् विष है

प्राचीन काल में, इस देश में गोवंश की खूब उन्नति थी। घर-घर गौएँ रहती थीं। जिस घर में गाय नहीं रहती थी, वह घर मनहूस समझा जाता था। गृहस्थ शय्या-परित्याग करते ही, गौ का दर्शन करना अपना पहला धर्म समझते थे। उस जमाने में यहाँ गो-दूधइ तनी अधिकता से मिलता था कि लोग इसको बेचना बुरा समझते थे और गाँव-गाँव में राहगीरों या अतिथियों को मनमाना दूध पिला कर, आतिथ्य सत्कार किया करते थे। यह चाल राजपूताना प्रान्त के कितने ही गाँवों में अब तक पाई जाती है। जैसलमेर और सिन्ध के दान के गाँव-गवई वाले अब भी दूध बेचना बुरा समझते हैं। सन्ध्या समय, जो कोई जिस गृहस्थ के घर पर विश्राम करने जा पहुँचता है, उसका दूध से ही आतिथ्य सत्कार किया जाता है। जो बात आजकल भारत के किसी-किसी कोने में पाई जाती है, वही किसी जमाने में सारे हिन्दुस्तान में थी। उस समय के धनी और निर्धन, सबको दूध इफरात से मिलता था। इस वजह से उस समय के मनुष्य इष्ट-पुष्ट, दीर्घकाद और चलवान होते थे। लेकिन जब से इस देश में विधर्मी और गो-भक्षकों का राज होने लगा, तब से गो वंश का नाश होना, आरम्भ हुआ। गो-वंश के दिन-प्रतिदिन घटते जाने से अब वह समय आ गया है कि भारत के किसी भी नगर में रुपये का चार सेर से अधिक दूध नहीं मिलता। जिसमें भी कलकत्ता, बम्बई और दिल्ली आदि नगरों में तो दूध इस समय रूपये का दो सेर भी मुश्किल से मिलता है। जो दूध रुपये का तीन सेर मिलता है वह भी ठीक नहीं होता। उसमें भी एक चौथाई जल मिला रहता है। इसके सिवा, दुकानदार लोग दूध में और भी कितनी ही खराबियों करते हैं, जिससे स्वास्थ्य-लाभ होने के बदले मनुष्य रोगास्त होते चले जाते हैं। सच बात तो यह है कि इस सराब दूध ने ही आजकल अनेक नये-नये रोग पैदा कर दिये हैं। आजकल जो दूध बाजारों में हलवाइयों की दुकानों पर मिलता है, वह महा निकम्मा और रोगों का खजाना होता है। दूध दुहने वाले चाहे जैसे बिना मंजे, मैले-कुचले वर्तनों में दूध को दुह लेते हैं। ग्वाले या हलवाई उसमें जैसा पानी हाथ लगता है, वैसा ही मिला देते हैं। दूसरे; जो दूध का व्यापार करते हैं, वे गाय-भैसों के स्वास्थ्य की ओर जरा भी ध्यान नहीं देते और रोगीले जानवरों का भी दूध निकालते और बेचते चले जाते हैं। जानवरों के रहने-चरने के स्थान और उनके स्वास्थ्य को वे लोग जरा भी परवाह नहीं करते। जब आजकल बाजारों में दूध का यह हाल है, तब समें स्वण्छ, पवित्र, सुथा समान दूध कहाँ से मिल सकता है ? ऐसे दूध से तो किसी उत्तम कुएँ का जल पीना ही लाभदायक है। आजकल बाजार का दूध पीना और रोग मोल ले कर मृत्यु-मुख में पड़ने की राह साफ करना, एक ही बात है। जिस दूध को हमारे शास्त्रकार " अमृत" लिख गये हैं, वह यह वातारू दूध नहीं। इसे तो यदि हम साक्षात् "विष" कहें, तो भी अत्युक्ति न समझनी चाहिये।

बाजारू दूध बीमारियों की खान है

जो दूध-रूपी अमृत को पान करके, दीर्घजीवी, निरोग और बलवान होना चाहते हैं, उन्हें बाजारू दूध भूल कर भी न पीना चाहिए। सिर्फ उन दुकानों का दूध पीना चाहिये, जिनके यहाँ निरोग जानवरों का दूध आता है; जो दूध दुहने, रखने आदि में हर तरह सफाई का ध्यान रखते हैं और जो जानवरों के रहने का स्थान भी साफ एवं हवादार रखते हैं। कलकले में जो दूध मिलता है, वह ऐसा खराब है कि उसके दुर्गुण लिखते हुए लेखनी काँपती है। कलकतिये ग्वाले, स्थान की कमी के कारण, गायों को ऐसे स्थान में रखते हैं कि, बेचारी जब तक कसाई के हवाले नहीं की जाती, सारी जिन्दगी घोर दुःख भोगती हैं। दूसरे; जिस विधि से दूध निकाला जाता है यह महा घृणित है। जिनको अपने स्वास्थ्य का जरा भी ख्याल हो, उनको ऐसा दूध कभी न पीना चाहिये; क्योंकि ऐसे बाजारू दूध से क्षय, राजयक्ष्मा, जलन्धर, अतिसार, शीतज्वर और हैजा आदि रोग फैलते हैं।

गो-रक्षा बहुत जरूरी है

अव्वल तो आजकल दूध मिलता ही नहीं, और जो मिलता है, वह इतना महंगा होता है कि, धनियों के सिवा गरीब और साधारण अवस्था के लोग उसे खरीद ही नहीं सकते। दूध-घी की कमी के कारण से ही आजकल की भारत-सन्तान आल्पजीवी, क्षुद्रकाय, हतवीर्य और निर्बल होती है। हिन्दू मात्र का ही नहीं, बल्कि भारतवासी मात्र का कर्तव्य है, कि वे गो-वंश की रक्षा और उसकी वृद्धि के उपाय करें; अन्यथा थोड़े दिनों में यह श्लोक पूर्ण रूप से चरितार्थ हो जायगा— “घृतं न भूयते कणे, दधि स्वप्ने न दृश्यते। दुग्धस्य तर्हिका वार्ता तक्रशक्रस्य दुर्लभम्।।" यानी लोग कहने लगेंगें कि हमने तो यी का नाम भी नहीं सुना और दही को स्वज में भी नहीं देखा, इत्यादि। अब भी समय है कि भारतवासी विशेषकर हिन्दू, जो गौ को माता से भी बढ़ कर मानते हैं और उसके दर्शन मात्र से पापों का नाश होना समझते हैं, कृष्ण को साक्षात् भगवान मानते हैं और उनके उपदेश को सबसे बढ़-चढ़ कर समझते हैं, गो-रक्षा की ओर ध्यान दें तथा नगर-नगर और गाँव-गाँव में गौशालायें स्थापित करें; गौओं को कसाइयों के हाथों में जाने से रोके और जो नीच पातकी हिन्दू ऐसा घृणित काम करें, उसे जातिच्युत कर दें; उससे रोटी-बेटी और खान-पान का व्यवहार छोड़ दें; तो निस्सन्देह गो-वंश की रक्षा होने से उनको दूध-घी बहुतायत से मिल सकेगा,उनके देश में अनाज की पैदावार अति से अधिक हो जायगी। अन्यथा कोई समय ऐसा आयेगा, जब हिन्दुओं को दूध ही नहीं, बल्कि अत्र भी न मिलेगा और उनकी भावी सन्तान अन्न की कमी के कारण, अकाल मृत्यु के पंजे में फंस कर, शायद भारत से हिन्दू जाति का नाम ही लोप कर देगी। गाय के दूध, घी, मक्यान और माते से हम लोग पलते हैं और रोग-रूपी राक्षसों के पंजे से छुटकारा पाते हैं। गप का गोचर हो हमारे देश में खेती के लिए अच्छी बार का काम देता है। गाय के चमड़े से हम लोगों के पाँवों की रक्षा होती है। गाय के दूध घी, मक्खन आदि से कितनी ही जटिल और असाध्य मीमारियाँ आराम होती हैं। जिस गो-वंश पर हमारा और हमारी भावी सन्तानों का जीवन-निर्भर है, उसकी रक्षा और वृद्धि का उपाय न करना, अपने लिए भायी आपत्ति की राह साफ़ करना और अपने गई मृत्यु-मुख में डालने की तैयारी करना नहीं तो और क्या है ? यदि हम लोग अपने आप गो-वंश-रक्षा पर कमर कस से तो मुसलमान हमारा कुछ भी नहीं विराट सको, यरिक समय पा कर वे हमको सहायता देने लगेंगे और इस काम में भारत गवर्नमेंट को सहायता की तो कुछ जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन जो लोग आप कुछ नहीं कर सकते, केवल दूसरों का आत्रम ताकते हैं: उनसे कुछ भी नहीं हो सकता और उनको कोई सहायता भी नहीं देता। हमारा इस लेख को इतना बढ़ाने का विचार न था. किन्तु यह हमारी इच्छा से अधिक बढ़ गया। अब हमारे पास इसे और बढ़ाने के लिये स्थान नहीं है। अलमन्दों को इशारा ही काफी होता है। यदि हिन्दू लोग ऐसे समय में, जब कि उनके सिर पर एक समदर्शी और न्यायशीला गवर्नमेंट का हाथ है, कोई काम गोवंश की रक्षा और वृद्धि का न कर सकोगे, तो कब कर सकेंगे? ऐसा राम-राग्य और सुयोग उन्हें फिर न मिलेग। उन्हें यह भूल कर भी न कहना चाहिये कि जब राजा स्वयं गो-भक्षी है, जब हम क्या कर सकते हैं? राजा निस्सन्देह गो-भक्षक है, किन्तु उसने हम लोगों को, हमारे धर्म की रक्षा के पूर्णाधिकार दे रखे हैं। हम कानून को मानते हुए, उसकी सीमा के अन्दर, गो-वंश की भलाई के बहुत कुछ काम कर सकते हैं।

गो-रक्षा पर भारतवासियों को, खास कर हिन्दुओं को, विशेष रूप से ध्यान देना चाहिये; क्योंकि उनके करने योग्य कामों में "गो-रक्षा" सबसे अधिक जरूरी काम है।

दूध के गुण.

हम ऊपर दूध की बहुत कुछ तारीफ़ लिख आये हैं; किन्तु नीचे हम शास्त्रानुसार उसके लाभ और भी दिखाना चाहते है। आजकल के लोग कमजोरी मिटाने के लिये वैद्य, हकीमों और डाक्टरों की शरण में जाते हैं, उनकी खुशामद करते हैं और उनके आगे भेंट-पर-भेंट घरते हैं, तो भी अपने मन को मुराद नहीं पाते। इसका यही कारण है कि असल ताकृत लाने वाली चीज़ की ओर ध्यान नहीं देते और अण्ट-शर औषधियों को रखा कर अपने तई दूसरे रोगों में फंसा लेते हैं। जो चौत उनके लिये

अध्यर्थ महोौषधि है, जो उनकी कमजोरी हरने में रामबाण का काम कर सकती है, उसकी ओर उनकी नज़र ही नहीं जाती। 

प्रिय पाठकों ) संसार में जितनी धातुपौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, बुढ़ापे और बीमारियों को जीतने वाली एवं स्त्री-प्रसंग की शक्ति बढ़ाने वाली दवाइयाँ हैं, उनमें “दूध” ही प्रथम स्थान पाने योग्य है। पंडितवर लोलिम्बराज अपनी कान्ता से कहते हैं-

सौभाग्यपुष्टिबलशुक्रविवर्धनानि, कि सन्ति नो भुवि बहूनि रसायनानि। कन्दर्पवर्धिनि ! परन्तु सिताज्ययुक्ताद दुग्धादृते न मम को5पि मतः प्रयोग:॥ 

“ हे कन्दर्प को बढ़ाने वाली / इस पृथ्वी पर सौभाग्य, एष्टि, बल ओरे वीर्य बढ़ाने वाली अनेक ओषधियाँ है। मगर मेरी राय में “घी ओर पिश्री मिले हुए दूध” से बढ़ कर कोई नहीं हे।” 

कोकशास्त्र में कोक के रचयिता “कोका” पण्डित ने भी लिखा हे-... 

धातुकरन और बलधरन, मोहि पूछे जो कोय। “'पय' समान या जगत में, है नहीं दूसर कोय॥ 

भावप्रकाश में दुध की गुणावली इस प्रकार लिखी है-

दुग्धं॑ सुमधुरं स्निग्धं वातपित्तहरं सरम। सद्यः शुक्रकरं शीतं सात्म्यं सर्वशरीरिणाम!॥ जीवन वृंहणं बल्य॑ मेध्यं बाजीकरं परम!। वयस्थापनमायुष्यं सन्धिकारि रसायनम्‌। विरेकवान्तिबस्तीनां सेव्यमोजोविवर्द्धनम॥ 

“दूध--मीठा ओर चिकना, बादी ओर पित्त का नाश करने वाला, दस्तावर, वीर्य को जल्दी पैदा करने वाला, शीवल, सब प्राणियों को अनुकूल, जीव-रूप, युष्टि करने वाला, बलकारक, बुद्धि को उत्तम करने वाला, अत्यन्त वाजीकरण, आयु को स्थापन करने वाला, आयुष्य सन्‍्धानकारक, रसायन ओर वमन, विरेचन तथा वस्ति-क्रिया को समान ही ओज बढ़ाने वाला है।” उसी ग्रन्थ में और भी लिखा है--

“जीर्णज्वर, मानसिक रोग, उन्माद, शोष, मूर्च्छा, भ्रम, संग्रहणी, पीलिया, दाह, प्यास, हृदय-रोग, शूल, उदावर्त्त, गोला, वस्तिरोग, बवासीर, रक्तपित्त, अतिसार, योनि-रोग, परिश्रम, ग्लानि, गर्भर्नाव-.इनमें मुनियों ने दूध सर्वदा हितकारी कहा है।” और भी लिखा है, कि बालक, बूढ़े, घाव वाले, कमज़ोर भूख या मैथुन से दुर्बल हुए मनुष्य के लिये दुध सदा अत्यन्त लाभदायक होता है। 

वाग्भूट ने लिखा है 

स्वादु पाकरसं स्निग्धमोजम्यं धातुवर्द्धनम्‌॥ वातपित्तहर वृष्यं एलेष्मलं गुरु शीतलम्‌॥ 

“दूध पाक में स्वादु (जायकदार) स्वाद-रस से स्युक्त, चिकना, प्रराक्रम बढ़ाने-वाला, वीर्य की वृद्धि करने वाला, बादी और पित्त को हरने वाला, वृष्य, कफ-कारक, भारी और शीतल होता है।” 

इसी भाँति, समस्त शास्त्रों में दृध के गुण गाये गए हैं। वैद्यक-शास्त्र में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, ऊँटनी, घोड़ी, स्त्री.और हथिनी आदि के आठ प्रकार के दूध लिखे हैं। हम सब तरह क॑ दुूधों का संक्षिप्त वर्ण करके इस लेख को समाप्त करेंगे। 

 गाय का दूध 

आठ प्रकार के दुधों में गाय का दूध सबसे उत्तम समझा गया है। “वाग्भट! नामक ग्रन्थ के रचयिता वाग्भट लिखते हैं: 

प्राय: पयोउत्र गव्यं तु जीवनीयं रसायनम] क्षत क्षीण हित॑ मेध्यं बल्य॑ं स्तन्यकरं परम्‌॥ श्रमभ्रममदालक्ष्मीश्वासकासातितृट क्षु ध:। जीर्णज्चरं मूत्रकृच्छे रक्‍तपित्त् च नाशयेत्‌॥ 

“सब तरह के दूधों में गाय का दूध अत्यन्त बल बढ़ाने वाला और रसायन है। घाव से दुखित मनुष्य को हितकारी है, पवित्र है, बल बढ़ाने वाला है, स्त्री के स्तनों में दूध पैदा करने वाला है, रस में मीठा है, और थकान, भम, मद, दरिद्रता, श्वास, खाँसी, अति प्यास और भूख को शान्त करता तथा जीर्ण ज्वर, मूत्रकृच्छ (सूज़ाक) और रक्तपित्त का नाश करता है।” “भावप्रकाश ” में लिखा है---गाय का दूध विशेष करके रस और पाक में मीठा, शीतल, दुध बढ़ाने वाला, वात-पित्त और खून-विकार का नाश करने वाला, वात आदि दोषों, रस-रक्त आदि धातुओं, मल और नाडियों को गीला करने वाला तथा भारी होता है। गाय के दुध को जो मनुष्य हमेशा पीते हैं, उनके सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं और उन पर बुढ़ापा अपना दखल जल्दी नहीं जमा सकता।" 

ख़वासुल अदबिया” यूनानी चिकित्सा या हिकमत का निघण्टु है। उसमें लिखा “गाय का दूध किसी कृदर मीठा और सफेद मशहूर है। वह सिल, तपेदिक और फेफड़े के जख्मों को मुफीद है तथा--गम--शोक---को दूर करता और ख़फकान-पागलपन रोग में फायदा करता है; मैथुन-शक्ति बढ़ाता और चमड़े की रंगत साफ करता, शरीर को मोटा करता, तबियत को नर्म करता, दिल-दिमागू को मजबूत करता, मनी--वीर्य--पैदा करता और जल्दी हज़म होता है।” 

हम नमूने के तौर पर गाय के दूध से आराम होने वाले चन्द रोग लिख कर बताते हैं। इनके सिवा और भी बहुत-से रोग गो-दुग्ध से आराम होते हैं। “मुजर््बात अकबरी ”, “इलाजुल गुर्बा” आदि आधुनिक ग्रन्थों तथा प्राचीन वैद्यक-शास्त्र में और भी बहुत-से ऐसे तरीके लिखे हैं, जिनको हम विस्तार-भय से यहाँ नहीं लिख सकते। 

 गाय के दूध से रोग-नाश 

गाय के दूध में ना-बराबर घी और मधु (शहद) मिला कर पीने से या घी और चीनी मिला कर पीने से बदन में खूब ताकत आती है एवं बल, वीर्य ओर पुरुषार्थ इतना बढ़ता है कि लिख नहीं सकते। 

जिस मनुष्य की आँख में जलन रहती हो, यदि वह शख्स कपड़े की कई तह करके, उसे गाय के दूध में तर करके आँखों पर रक्खे और ऊपर से फिटकरी पीस कर पट्टी पर बुरक दे, तो ४-६ दिन में नेत्र की जलन कम हो जाती है। 

गाय का दूध औटा कर गरम-गरम पीने से हिचकी आराम हो जाती है। 

गाय के दूध को गरम करके, उसमें मिश्री और काली मिर्च पीस कर मिलाने और पीने से ज्ञुकाम में बहुत लाभ होते देखा गया है। 

गाय के दूध में बादाम की खीर पका कर ३-४ दिन खाने से आधासीसी या आधे सिर का दर्द आराम हो जाता है। 

अगर खून की गर्मी से सिर में दर्द हो, तो गाय के दूध में रूई का मोटा फाहा भिगो कर सिर पर रखने से फायदा होता है। किन्तु सन्ध्या समय सिर धो कर मक्खन लगाना ज़रूरी है। 

अगर किसी तरह भोजन के साथ काँच का सफूफ (चूरा) खाने में आ जाय, गाय का दूध पीने से बहुत लाभ होता है। 

 गाय के दुध में घी मिला कर पिलाने से अशुद्ध गन्धक का विष उतर जाते है

गाय के दुध में सॉठ घिस कर गाढ़ा-गाढ़ा लेप करने से, अत्यन्त प्रबल सिर-दर्द् भी आराम हो जाता है। 

 गायों की किस्मों के अनुसार दूध के गुण 

कोई गाय काली, कोई पीली, कोई लाल और कोई सफेद होती है। मतलब यह है कि, जितने प्रकार की गायें होती हैं, उतने ही प्रकार के दूध होते हैं; यानी रंग-रंग की गायों के दृध के गुण भी भिन्‍न-भिन्‍न होते हैं। अत: पाठकों के लाभार्थ, नीचे सब तरह की गायों के दूधों के गुणावगुण खुलासा लिखते हैं-

काली गाय का दूध--काली गाय का दूध विशेष रूप से वात-नाशक होता है। और रंग की गायों की अपेक्षा काली गाय का दूध गुण में श्रेष्ठ समझा जाता है। जिनको वात-रोग हो, उनको काली गाय का दुध पिलाना उचित है। 

सफेद गाय का दूध--सफेद गाय का दृध कफकारक और भारी होता है, यानी देर में पचता है। शेष गुण समान ही होते हैं। 

पीली गाय का दूध--पीली गाय का दूध और सब गुणों में तो अन्य वर्णों की गायों के समान ही होता है; केवल यह फर्क होता है कि इसका दूध विशेष करके बात-पित्त को शान्त करता है। 

लाल गाय का दूध--लाल गाय का दुध भी, काली गाय की तरह वातनाशर्क होता है। फर्क इतना ही है कि काली गाय का दुध विशेष रूप से बातनाशक होता है। चितकबरे रंग की गाय के दूध में भी लाल गौ के दूध के समान गुण होते हैं। 

जांगल देश की गायों का दूध--जिस देश में पानी की कमी हो और दरख्तों की बहुतायत न हो एवं जहाँ वात-पित्त-सम्बन्धी रोग अधिकता से होते हों, उस देश को “जांगल देश” कहते हैं। मारवाड प्रान्त जांगल देश की गिनती में है। जांगल देश की गाय का दुध भारी होता है अर्थात्‌ दिक्कत से पचता है। 

अनूप देश की गायों का दूध--जिस देश में पानी की इफरात हो, वृक्षों की बहुतायत हो और जहाँ वात-कफ के रोग अधिकता से होते हों, उस देश को “अनूप देश” कहते हैं। बंगाल प्रान्त अनूप देश गिना जाता है। अनूप देश की गायों का दूध जांगल देश की गायों के दृध से अधिक भारी होता है। 

अन्य प्रकार की गायों का दूध--छोटे बछड़े वाली या जिसका बछड़ा मर गया हो, उस गाय का दुध त्रिदोषकारक होता है। बाखरी गाय का दूध त्रिदोष-नाशक, तृप्तिकारक और बलदायक होता है। बरस दिन की ब्याई हुई गाय का दूध गाढ़ा, बलकारक, तृप्तिकारक, कफ बढ़ाने वाला और त्रिदोषनाशक होता है। खल और सानी खाने वाली गाय का दुध कफकारक होता है। कड़ब, बिनोले और घास खाने वाली गाय का दूध सब रोगों में लाभदायक होता है। जवान गाय का दूध मीठा, रसायन और त्रिदोषनाशक होता है। बूढ़ी गाय के दूध में ताकत नहीं होती। गाभिन गाय का दूध, गाभिन होने के तीन महीने पीछे पित्तकारक, नमकीन ओर मीठा तथा शोष करने वाला होता है। नई ब्याई हुई माय-का दूध रूखा, दाह-कारक, पित्त फरने-वाला-और खून-विकार पैदा करने वाला होता है। जिस गाय को ब्याये बहुत दिन हो गये हों, उस गाय का दूध मीठा, दाहकारक और नमकीन होता है। 

भैंस का दूध

 भैंस का दूृध गाय के दुध से अधिक मीठा, चिकना, वीर्य बढ़ाने वाला, भारी, नींद लाने वाला, कफकारक, भूख बढ़ाने वाला और ठण्डा है। हिकमत की 

किताबों में लिखा है, कि भैंस का दुध कुछ मीठा और सफेद होता है और तबियत को ताज़ा करता है। 

बकरी का दूध 

बकरी का दूध कसैला, मीठा, ठण्डा, ग्राही और हल्का होता है। रक्तपित्त, अतिसार, क्षय, खाँसी और बुखार को आराम करता है। बकरी चरपरे और कड॒वे पदार्थ खाती है, इसी कारण से बकरी का दूध सब रोगों का नाश करता है। यह तो वैद्यय की बात है। हिकमत की किताबों में लिखा है कि बकरी का दूध गर्मी के रोगों में बहुत फायदेमन्द है और गर्म मिज्ञाज वालों को ताकत देता है। इसके गरगरे (कुल्ले) करने से हलक यानी कण्ठ के रोगों में बहुत फायदा होता है। यह पेट को नर्म करता है; हलक (कण्ठ) की खराश और मसाने के जख्म को मुफीद हे तथा मुँह से खून आने, खाँसी, सिल (कलेजे की सूजन और उसमें मवाद पड़ना) और फेफड़े के ज़ख़्म में लाभदायक है। 


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आमवात वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 आमवात वर्णन


आम का स्वरूप-भोजन किये हुए अन्न के न पचने से जो अपक्व या कच्चा रस बनता है, वह क्रम-क्रम से इकट्ठा हो जाता है। उसे ही 'आम' कहते हैं। वह ' आम! सिर और शरीर में वेदना उत्पन्न करता है। 


खुलासा यह.. है कि आम और वात--इन दोनों पदों के मिलाने से ' आमवात ” शब्द बनता है। जठराग्नि की कमज़ोरी से, भोजन का सार-रस जब खून में परिणत नहीं होता; यानी रस का खून नहीं बनता, तब वह 'रस” आमाशय आदि स्थानों में जमा हो जाता है। उस संचित हुए पदार्थ को ही “आम” कहते हैं। जो शरीर के भीतर विचरण करती है, जिसकी ताक़त से शरीर की सारी शक्तियाँ अपना-अपना काम करती हैं और जो इन्द्रियों और अतीन्द्रिय के द्वारा जानी जाती है, उसे ही वायु’ कहते हैं। 


आमवात के सामान्य लक्षण--कुपित हुए आम और वात, दोनों ही त्रिक स्थानों में सन्धियों में प्रवेश करके, पीड़ा करते हुए शरीर को जकड़ देते हैं; तब कहते हैं कि ' आमवात' रोग हुआ है। 


शरीर टूटना, अरुचि, प्यास, आलस्य, भारीपन, ज्वर, अन्न का न पचना और अंगों का सूनापन या सूजन--ये आमवात के सामान्य लक्षण हैं। 


नोट--दुष्ट वायु द्वारा आमाशय प्रभृति में जमा हुआ आम रस चलायमान हो कर--कफपित्त के साथ मिल कर--विदग्ध या खट्टा'हो जाता है। फिर वही खट्टा रस शरीर की सन्धियों या जोड़ों प्रभृति में अवस्थित हो कर, ज्वर और तोड़ने कौ-सी पीड़ा आदि लक्षणों वाले जिस रोग को पैदा करता है, उसी को 'आमवात ' कहते हैं | उसे हिन्दी में गठिया या ग्रन्थिवात कहते हैं। 


निदान-पूर्वक सम्प्राप्ति--दूध-मछली संयोग-विरुद्ध भोजन करने, विरुद्ध चेष्टा करने, कसरत न करने, अग्नि मन्द रहने, भोजन में लम्पटता करने और चिकना भोजन करके कसरत करने से ' आम ' या खाये हुए पदार्थों का कच्चा रस, वायु द्वारा आमाशय और सन्धिस्थल प्रभृति स्थानों में एकत्र और दूषित हो कर ' आमवात' रोग पैदा करता है। 


'वैद्य-विनोद' में लिखा है, विरुद्ध आहार-विहार करने वाले और मंदाग्नि वाले मनुष्य के अत्यन्त चिकने पदार्थ खाने से "आम ' दूषित हो कर, वायु की प्रेरणा से धमनियों में घुस कर, सन्धियों में दौड़ता है। 


खुलासा निदान--लक्षणादि--प्रकृति विरुद्ध, समय-विरुद्ध और संयोगविरुद्ध आहार; विरुद्ध चेष्ठा, * आमुख-कारक कर्म, मिहनत न करना, चिकने अन्न-पान सेवन करने के बाद तत्कीलः घोर् परिश्रम करना, गीले, भीगे या सील के घर में रहना, गरमी या धूप में तपे हुये शरीर में शीतल जल से नहाना अथवा शीतल जल पीना, शीतल हवा में रात के समय बिना कपड़े ओढ़े खुले अंग सोना, एक साथ आते हुये पसीनों को रोकना, अग्नि का मन्दापन और आम एवं वायु को कुपित करने वाले देश तथा आमवात की अनुकूलता वाली प्रकृति आदि आमवात के कारण हैं। इन समस्त कारणों से आम रस का संचार होता और वायु का कोप होता है। इनके साथ ही कफ और पित्त भी कुपित हो जाते हैं। 


कुपित हुई बायु--कफ और पित्त को अपने मददगारों की तरह साथ ले कर, और आम रस को उसके स्थान से रस बहाने वाले स्रोतों या छेदों में ले जा कर, उससे उनको बन्द कर देती है। तब वे छेद बन्द हो जाते हैं, तब शरीर में कमज़ोरी, हृदय में भारीपन, काम में दिल न लगना, शरीर के अनेक स्थानों में अनवस्थित-अस्थिर बेदना और भोजन पर अनिच्छा आदि लक्षण आमवात के पहले होते हैं। इसके बाद, आम रस खट्टा हो कर, शरीर की सन्धियों या जोड़ों वगैर में ठहर कर, स्पष्ट लक्षण वाली पीड़ा करता है। हाथ-पाँव, सिर, गुल्फ, (एड़ी के ऊपर की गाँठ) त्रिक, जानु और घुटनों की सन्धियों में पीड़ायुक्त सूजन और ज्वर पैदा होते हैं। यही आमवात के विशेष लक्षण हैं। 


कुपित आमवात के उपद्रब--कुपित हुआ ' आम” मन्या, कमर, पीठ, हाथ, . aa, और गुल्फ एवं उनकी सन्धियों को संकुचित करके सूजन पैदा करता है, जिसमें बिच्छू के काटने के जैसा दर्द होता है। इसी को वैद्य आमवात’ कहते हैं। 


नोट--' भावप्रकाश” में ऊपर वर्णित लक्षणों के अलावा लिखा है कि आमवात से जठराग्नि मंद हो जाती है, मुँह में थूक आता है, अथवा मुँह और नाक से पानी गिरता है, अरुचि होती है, शरीर में भारीपन होता है, उत्साह नष्ट होता है, मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है, दाह या जलन होती है, पेशाब ज़्यादा आता है, पेट कड़ा हो जाता है, शूल चलता है, नींद नहीं आती, प्यास लगती है, वमन होती है, बेहोशी आती है, हृदय में जड़ता होती है, मल रुक जाता है, शरीर जड़ हो जाता है, आंते कूजती हैं, पेट पर अफारा आ जाता है तथा कलाय-खंज आदि दूसरे दुःखदायी रोग हो जाते हैं; यानी बहुत बढ़ जाने पर सन्धियों में संकोच, लूलापन, टेढ़ापन, पैरों में सूजन आदि उपद्रव हो जाते हैं। 


दोष-भेद से आमवात के विशेष लक्षण---अधिक शूल चलने से वायु की आमवात समझनी चाहिये। शरीर में दाह और लाली होने से पित्त की आमवात समझनी चाहिए। शरीर गीले कपड़े से लिपटा हुआ-सा हो तथा खुजली चलती हो, तो कफ़ की आमवात समझनी चाहिये। दो या तीन दोषों के लक्षण मिले हुए पाये जाने से उन-उन दोषों की आमवात समझनी चाहिये। 


नोट--पित्त की अधिकता होने से, सुजन से फुला हुआ शरीर एकदम से लाल हो जाता है और उसमें बड़ी जलन होती है। वात की अधिकता में सूजन बहुत नहीं बढ़ती, पर तोड़ने-फोड़ने की-सी घोर पीड़ा होती है। कफ़-प्रधान आमवात में सूजन, गीली, भारी और खुजली-युक्त होती है। 



साध्यासाध्य--एक दोष का आमवात साध्य, दो दोषों का याप्य और तीन दोषों का असाध्य जानना चाहिए। तीन दोषों के आमवात में सारे शरीर में सूजन होती है। ऐसी आमवात आराम नहीं होती। आमवात-रोग होते ही फ़ौरन इलाज करना चाहिये, क्योंकि देर होने से रोग कष्ट-साध्य हो जाता है। 


आमवात चिकित्सा में याद रखने योग्य बातें..


 (१) लंघन, स्वेदन और विरेचन--आमवात की प्रधान चिकित्सा है; यानी लंघन कराने, पसीने निकालने और दस्त कराने से आमवात-रोग आसानी से आराम हो जाता है। 


'भाव-प्रकाश' में लिखा है, आमवात-रोग में पहले सेक  करो, तिक्त अग्नि-दीपक और तीक्ष्ण पदार्थ सेवन कराओ, जुलाब दो, ईस्हन कर्म करो और पिचकारी लगाओ; क्योंकि ये उपचार इस रोग में हितकारी हैं। 


(२) अगर आमतवात में दर्द हो, तो दर्द की शान्ति के लिए एक कपड़े की पोटली में बालू भर कर उसे आग पर तपाओ और दर्द की जगह सेक करो | इसे 'बालू की पोटली का रूखा स्वेद्’ कहते हैं | । 


अथवा 


कपास के बिनौले, कुलथी, तिल, जौ, लाल अरण्ड की जड़, अलसी, मसीना (मोटा घटिया अनाज), पुनर्नवा और सन के बीज--ये सब चीज़ें या इनमें से जो-जो मिलें, उन्हें कूट कर काँजी में तर कर लो और एक कपड़े में बाँध कर पोटली बना लो। फिर एक हाँड़ी में काँजी भर कर, उस पर अनेक छेद वाला शकोरा रख कर ढक दो। हाँडी और ढकने की सन्धियों को मिट्टी से बन्द कर दो, ताकि सन्धियों में हो कर भाफ न निकले। फिर उस हाँडी को आग पर रख दो। उस पोटली को ढकने पर रखो। जब वह गरम हो जाय, तब उससे आमवात को सेको। बारम्बार सेक करने से दर्द अवश्य दूर हो जायगा। इसे ‘शंकर स्वेद्’ कहते हैं। 


(३ ) उरुस्तम्भ-रोग और आमवात के पथ्यापथ्य एक समान हैं। आमवात में स्नान करना मना है; यहाँ तक कि गरम पानी से भी नहाना निषेध है। अगर आम-वात में ज्वर हो, तो रोटी, दाल-भात आदि न दे कर, साबूदाना आदि हल्के भोजन देने चाहियें। दर्द की जगहों को रूई से बाँधना चाहिये। दही आदि अभिष्यन्दी, भारी और पिच्छिल पदार्थ आमवात-रोगी को भूल कर भी न खाने चाहिये। दही अपथ्य है। 



 आमवात-नाशक आयुर्वेदिक नुसख़े  



(१) पुनर्नवादि चूर्ण 

पुनर्नवा या सोंठ, गिलोय, शतावर, गोरखमुण्डी, कचूर, सोंठ और देवदारुइनको समान-समान ले कर पीस-छान लो। इस चूर्ण को 'काँजी' के साथ खाने से आमवात और पुराना गृप्नसी-रोग ये दोनों नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है। 


नोट--इस नुसखे में कोई देवदारु और कोई विधारा लेते हैं। 


(२) रसोनदशक 

लहसन, हींग, त्रिकुय, सैंधानोन, सफ़ेद जीरा, संचरनोन, बिड़नोन और कचियानोन--इन दसों को चार-चार तोले ले कर बारीक पीस लो फिर तेल में मिला कर, एक-एक तोला सवेरे खाओ। इससे आमवात-रोग नष्ट हो जाता है। परीक्षित है। 


(३) हरीतकी योग 

हरड़ का चूर्ण 'अरण्डी के तेल' में मिला कर ख़ाने से आमवात-रोग नष्ट हो जाता है। परीक्षित है।


(४) राज़ा, गिलोय, अरण्डी की जड़, देवदारु और सोंठ--इनका काढ़ा सर्वांगगत वायु, गठिया वात, सन्धिवात और मज्जागत वात को नष्ट करता है। आमवात पर परीक्षित है। 


(५) अगर आमवात-रोगी को प्यास बहुत हो, तो पीपर, पीपरामूल, चव्य, चीता और सोंठ--श्नसे पकाया हुआ पानी देना चाहिये। 


(६) सोया, बच, सोंठ, गोखरू, बरना की छाल, पुनर्नवा, देवदारु, कचूर और गोरखमुण्डी--इन सब को समान-समान लेकर सेवन करने से आमवात रोग नष्ट हो जाता है। 


(७) प्रसारिणी, अरणी और मैनफल--इनको सिरके की काँजी में पीस कर सुहाता-सुहाता लेप करने से आमवात नष्ट हो जाती है। 


(८) चीता, कुटकी, पाढ, इन्द्रजी, अतीस, गिलोय, देवदारु, बच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस और हरड़--इनको एकत्र पीस कर नित्य पीने से आमवात रोग नष्ट हो जाता है। 


(९) कचूर, सोंठ, हरड़, बच, देवदार, अतीस और गिलोय--इनका काढ़ा पीने और रूखा भोजन करने से आमवात नष्ट हो जाता है। 


(१०) पुनर्नवा; कटाई, अरण्डी की जड़, मरुआ, मूर्वा और सँहजने का पंचाग--इनका काढ़ा आमवाते-रोगी को पिलाने से आमवात नष्ट हो जाती है।


 (११) पीपर का चूर्ण डाल कर 'दशमूल का काढ़ा' पीने से आमवात नष्ट हो जाती है। परीक्षित है। 


(१२) सोंठ और हरड़ का चूर्ण अथवा सोंठ और गिलोय का चूर्ण खाने से आमवात चली जाती है। 


(१३) अरण्डी के तेल में 'जवाखार' मिला कर पीने से मूत्रकृच्छ रोग नष्ट हो जाता है। अरण्डी के अढ़ाई तोले या कम तेल में 'दशमूल का काढ़ा' या 'सोंठ का काढ़ा' मिला कर पीने से कमर का दर्द जाता रहता है। ये नुसखे दस्तावर हैं। 


(१४) सॉठ और गिलोय के काढ़े में 'पीपर का चूर्ण' डाल कर पीने से आम, कोठे की पीड़ा और कमर की जकड़न तथा सूजन--ये सब आराम हो जाते हैं। परीक्षित है। 


धन्यवाद Gk Ayurved



बुधवार, 19 मई 2021

प्रदर रोग का वर्णन प्रदर-रोग ( Wight Discharge ) आयुर्वेदिक इलाज

 स्त्री रोगों की चिकित्सा

प्रदर रोग Wight Discharge  का वर्णन 


प्रदर रोग के निदान-कारण

सभी जानते हैं कि स्त्रियों को हर महीने रजोधर्म होता है। जब स्त्रियों को रजोधर्म होता है, तब उनकी योनि से एक प्रकार का खून, चार या पाँच दिनों तक,बहता रहता और फिर बन्द हो जाता है। इसके बाद यदि उन्हें गर्भ नहीं रहता,अथवा उनको रजोधर्म बन्द हो जाने का रोग नहीं हो जाता, तो वह फिर दूसरे

महीने में रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से फिर चार-पाँच दिनों तक आर्तव या खून बहता है। यह रजोधर्म होना कोई रोग नहीं, बल्कि स्त्रियों के आरोग्य की निशानी है। जिस स्त्री को नियत समय पर ठीक रजोधर्म होता है, तो वह सदा हष्ट-पुष्ट और तन्दुरुस्त रहती है। मतलब यह, कि इस समय योनि से खून बहना रोग नहीं समझा जाता। हाँ, अगर चार-पांच दिनों से ज्यादा बराबर खून गिरता रहता है, तो औरत कमजोर हो जाती है एवं और भी अनेक रोग हो जाते हैं। इसका इलाज किया जाता है। मतलब यह है कि जब नाना प्रकार के मिथ्या आहार-विहार

से स्त्रियों की योनि से खून या अनेक रंग की, रक्त जैसी चीज, बहा करती है, तब कहते हैं कि स्त्री के प्रदर-रोग' हो गया है।


"भावप्रकाश' में लिया है, जब दुष्ट रज बहुत ही ज्यादा बहता है, शरीर टूटता है, अंगों में वेदना होती है, एवं शूल की-सी पीड़ा होती है, तब कहते हैं-'प्रदर-रोग'

"वैद्यरत्न' में लिखा है

अतिमार्गातिगमनं प्रभूत सुरणादिभिः।

प्रदरो जायते स्त्रीणां योनिरक्तस्बुतिः पृथुः।।

बहुत रास्ता चलने और अत्यंत परिश्रम और अति मैथुन करने से स्त्रियों को प्रदर-रोग होता है। इस रोग में योनि से खून बहता है।

'चरक' में लिखा है अगर स्त्री नमकीन, चरपरे, ख, गलन करने वाले,चिकने, अभिष्यन्दी पदार्थ, गाँव के और जल के जीवों का मांस, खिचड़ी, खीर, दही,सिरका और शराब प्रभृति को सदा या ज्यादा खाती है, तो उसकी वायु कुपित होती है और खून अपने परिमाण से अधिक बढ़ता है। उस समय वायु, उस खून को ग्रहण करके, गर्भाशय को रज बहाने वाली शिराओं का आनय ले कर, उस स्थान में रहने वाले आर्तव को बढ़ाती है। चिकित्सा शास्त्र-विशारद विद्वान, उसी बढ़े हुए वायु-संसृष्ट रक्त-पित्त को 'असग्दर' या 'रक्त-प्रदर' कहते हैं। 'वैद्यविनोद' में लिखा है

मद्यातिपानमतिमैथुनगर्भता-जीर्णध्वशोकगरयोग दिवातिनिद्रा।

स्त्रीणामसदरगदो भवतीति तस्य प्रत्युद्गतौ भ्रमरुजौ दवथुप्रलापौ।

दौर्बल्यमोहमदपाणयुगश्च तन्दा तृष्णा तथानिलरुजो बहुधा भवन्ति।वाताच्च पित्तकफर्ज त्रिविध चतुर्थ दोषोजवं प्रदररोगमिदं वदन्ति।।

बहुत ही शराब पीने, अत्यन्त मैथुन करने, गर्भपात होने या गर्भ गिरने, अजीर्ण होने, राह चलने, शोक या रंज करने, कृत्रिम विष का योग होने और दिन में बहुत सोने वगैरः कारणों से स्त्रियों को 'असग्दर' या 'प्रदर रोग' पैदा होता है। 

इस प्रदर-रोग के अत्यन्त बहने पर भ्रम, व्यथा, दाह-जलन, सन्ताप, बकवाद,कमजोरी, मोह, मद, पाण्डुरोग, तन्द्रा, तृष्णा और बहुत-से वात-रोग हो जाते हैं। यह प्रदर-रोग वात, पित्त, कफ और सन्निपात-इन भेदों से चार तरह का होता है।

'भावप्रकाश' में प्रदर रोग होने के नीचे लिखे कारण लिखे हैं(१) विरुद्ध भोजन करना। (२) मद्य पीना। (२) भोजन-पर-भोजन करना। (४) अजीर्ण होना। (५) गर्भ गिरना। (६) अति मैथुन करना। (७) अधिक राह चलना। (८) बगुन शोक करना। (९) अत्यन्त कर्षण करना। (१०) बहुत बोझ उठाना। (११) चोट लगना । (१२) दिन में सोना।

प्रदर-रोग की किस्में

प्रदर-रोग चार तरह का होता है-(१) वातग प्रदर। (२) पित्तज प्रदर) (३) कफज प्रदरा (४) सन्नितपातज प्रदर या त्रिदोषन प्रदर।

वातज प्रदर के लक्षण

अगर जातज प्रदर-रोग होता है, तो रूखा, लाल, झागदार, व्यथा-सहित, मांस के धोक्न-जैसा और थोड़ा-थोड़ा खून बहा करता है।

नोट-'चरक' में लिखा है-वातज प्रदर का खून झागदार, स्या, माँजसे अथवा अकेले लाल रंग का होता है। वह देखने में ढाक के काड़े के-से रंग का होता है। उसके साथ शूल होता है और नहीं भी होता है। लेकिन वायु-कमर, वंक्षण, इदय,पसली, पीठ में बड़े जोरों से वेदना या दर्द पैदा करती है। वातजनित प्रदर

में वायु का कोष प्रचलता से होता है और वेदना या दर्द करला वायु का काम है, इसी से यादी के प्रदर में कमर और पीत कौर: में बड़ा दर्द होता है।

पित्तज प्रदर के लक्षण

अगर पित के कारण से प्रदर-रोग होता है, तो पीला, नीला, काला, लाल और गरम खून बारम्बार बहता है। इसमें पित की वजह से दाह-जलन आदि पीड़ाएँ होती हैं।

नोट-बट्टी, नमकीन, खारी और गरम वस्तुओं का अत्यंत सेवन करने से चित्त कुपित होता और पित्तजनित या पित्त का प्रदर पैदा करता है। पित-प्रदर से खून कुछ-कुछ नीला, पीला, काला और आत्यन्त गरम होता है; बारम्बार पीड़ा होती और खून गिरता है। इसके साथ जलन, प्यास, मोह, अम और ज्वर—ये उपद्रव भी होते हैं।

कफज प्रदर के लक्षण

अगर कफ से प्रदर होता है तो कच्चे रस वाला, सेमल कौरः के गोद-जैसा चिकना, किसी कदर पाण्डु-वर्ण और तुच्छ धान्य के धवन के समान खून नहता है।

नोट–भारी प्रभृति चीजों के बहुत ही ज्यदा सेवन करने से कफ कुपित  होता और कफन प्रदर रोग पैदा करता है। इसमें यून पिच्छिल या लिलिया, पाण्डू रंग का, भारी, चिकना और शीतल होता है तथा श्लेष मिले हुए थन का स्राव होता है। पौड़ा कम होती है। पर अमन, अरुचि, हुल्लास, श्वास और खाँसी ये कफ के उपद्रव नजर आते हैं।

त्रिदोषज प्रदर के लक्षण

अगर त्रिदोष-सनिपात या वात-पित्त-कफ-जीनों दोषं के कोप से प्रदर-रोग होता है, तो शहद, पी और हरताल के रंग वाली मज्जा और शंख की-सी गन्ध बाल बन बहता है। विद्वान लेग इस चौधे प्रपर-रोग को असाध्य कहते है, अत: चतुर वैश को इस प्रदर का इलाज न करना चाहिए।

नोट-चरक' में लिखा है-जमाव होने, स्त्री के अत्यन कर पाने और

कर नष्ट होने से, यानी सब हेतुओं के मिल जाने से वात, पित और कर तीनों दोष कुपित हो जाते हैं। इन तीनों में वायु सबसे ज्यादा कुपित हो कर, असाध्य कफ का त्याग करती है, तब पित्त की तेजी के मारे, प्रदर का खून बदबूदार, लिबलिबा, पीला और जला-सा हो जाता है। बलवान वायु, शरीर की सारी वसा और मेद को ग्रहण कर के योनि की राह से घी, मज्जा और वसा के-से रंग वाला पदार्थ हर समय निकाला करती है। इसी वजह से उक्त स्त्री को प्यास, दाह और ज्वर प्रमृति उपद्रव होते हैं। ऐसी क्षीण-रक्त-कमजोर स्त्री को अंसाध्य समझना चाहिए।

खुलासा पहचान

वातज प्रदर में रूखा, झागदार और थोड़ा गरम खून बहता है।

पित्तज प्रदर में -पौला, नीला, लाल और गरम खून बहता है।

कफज प्रदर में सफेद, लाल और लिबलिबा स्त्राव होता है।

त्रिदोषज प्रदर में—बदबूदार, गरम, शहद के समान खून बहता है।

नोट-ध्यान रखना चाहिए, सोम रोग मूत्र-मार्ग में और प्रदर-रोग गर्भाशय में होता है। कहा है

सोमरूङ् मूत्रमार्गे स्यात्प्रदरो गर्भवमनि

अत्यन्त रुधिर बहने के उपद्रव

आगर प्रदर-रोग वाली स्त्री के रोग का इलाज जल्दी ही नहीं किया जाता, उसके शरीर से ही ज्यादा खून निकल जाता है, तो कमजोरी और बेहोशी आदि अनेक रोग उसे आ घेरते हैं। भावप्रकाश' और 'बंगसेन' प्रभृति ग्रन्थों में लिखा है

तस्यातिवृत्तो दौर्बल्यं अमोमूछां पदस्तृषा।

दाहः प्रलापः पाण्डवं तन्दा रोगश्च बातजाः॥

बहुत खून चूने या गिरने से कमजोरी, थकान, बेहोशी, नशा-सा बना रहना, जलन होना, बकवाद करना, शरीर का पीलापन, ऊँघ-सी आना और आँख मिचना तथा बादी के रोग-आक्षेपक आदि उत्पन्न हो जाते हैं।

डाक्टरी मत से प्रदर-कारण व निदान

साधारण तौर पर स्त्री की योनि में गर्भाशय, गर्भाशय-ग्रीवा तथा योनि की दीवारों से एक नाव निकलता रहता है, जो योनि की दीवारों को नम (हल्का गोला) बनाये रखता है। हल्के पीलेपन या सफेद या धान्य वर्ण का यह पतला पदार्थ एक विशेष प्रकार की गय लिए होता है। यों तो इसकी मात्रा बहुत कम या नहीं के बराबर होती है, लेकिन योनि को नाम रखने, और बाहर से भीतर आने वाले रोग-जनित जीवाणुओं को शक्ति-हीन बनाने के लिए पर्याप्त होती है। यह पदार्थं इन जीवाणुओं की उत्पत्ति और वृद्धि को भी रोकता है। मात्रा में बहुत कम होने के कारण अन्दर पहने जाने वाले कपड़ों पर कभी-कभी ही हल्का-सा दाग लगता है। युवावस्था (जपानी) में पैर रखने पर, गर्भकाल में, मासिक शुरू होने के कुछ पहले इस पदार्थ की मात्रा साधारणतया बढ़ जाती है। यही मात्रा यदि इतनी बढ़ जाये कि स्त्री के चलने-फिरने, दौड़ने, उठने-बैठने और काम करते वक्त अन्दर पहने जाने बले कपड़ों को गोला बनाये रख्ने तो 'प्रदर' कहाता है। साधारण बोल-चाल में इसे 'पानी गिरना' कहते हैं। क्योंकि इसमें खून नहीं मिला होता, इसलिए त्वेत-प्रदर' या 'सफेद-प्रदर' भी कहते हैं।

प्रदर के सामान्य कारण

अच्छा उपयुक्त भोजन न मिलना (कुपोषण), शारीरिक दुर्बलता, कमजोरी, खून की कमी (एनीमिया), लम्ये समय तक रहने वाली (दीर्घकालिक) बीमारियाँ, मानसिक (दिमागी) व्याधि, चिन्ता, तनाव, शोकादि। इनके अलावा योनि में किसी प्रकार के

रासायनिक पदार्थ दवाएँ, रखड़ के छल्ले, गर्भ निरोधक गोलियाँ या मासिक के समय योनि में कपड़ा, फाहा रखने से भी प्रदर होता है। 

कुछ अन्य कारण

गर्भाशय ग्रीवा की शोध, मस्सा, अर्बुद (ट्यूमर) और योनि संक्रमण—ऐसे कारण हैं जिनमें रक्त के साथ-साथ मवाद (पीव) भी आता है। योनि संक्रमण के अनेक कारणों में से दो का उल्लेख कर देना पाठकों के हक में अच्छा होगा। ये हैं-ट्राइकोमोनिएसिस (Trichomtoniasis) और मोनिलियासिस ( (Moniliasis)

ट्राइकोमोनिएसिस-एक विशेष जीवाणु 'ट्राइकोमोनस' द्वारा होने वाला प्रदर पतला, झागदार, प्रदाह या जलन पैदा करने वाला होता है। इस साव के निरन्तर बहने से भग प्रदेश में सूजन और खुजली होती, तथा पेशाब बार-बार और रुक-रुक कर होते हैं।

अब आइये जाने प्रदर-रोग ( Wight Discharge ) आयुर्वेदिक इलाज

(१) कैथ के पत्ते और वाँस के पत्ते बराबर-बराबर ले कर, सिल पर पीस कर लुगदी बना लें। इस लुगदी को शहद मिला कर खाने से तीव्र प्रदर-रोग भी नए हो जाता है। परीक्षित है।

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(२) ककड़ी के बीजों की मींगी १ तोले और सफेद कमल की पंखड़ी १ तोले ले कर पीस लें। फिर जीरा और मिश्री मिला कर सात दिन पियें। इस नुसखे से श्वेत-प्रदर आराम हो जाता है।

(३) काकजंघा की जड़ के रस में लोध का चूर्ण और शहद मिला कर पीने से श्वेत प्रदर नष्ट हो जाता है। परीक्षित है।

नोट-काकजंघा के पत्ते ओंगा या अपामार्ग-जैसे होते हैं। पौधा भी उतना ही ऊँचा, कमर तक होता है। नींद लाने को काकजंपा सिर में रखते हैं। काकजंघा का रस कान में डालने से कर्णनाद और बहरापन आराम होते और कान के कीड़े मर जाते हैं। केवल काकजंघा की जड़ को चावलों के धोवन के साथ पीने से पाण्डु-प्रदर शान्त हो जाता है।

(४) हुढारों की गुठलियां निकाल कर कूट-पीस लें। फिर उस चूर्ण को 'घी' में तल लें। पीछे 'गोपीचन्दन' पीस कर मिला दें। इसके खाने से प्रदर-रोग आराम हो जाता है। परीक्षित है।

(५) खिरनी के पत्ते और कैथ के पत्ते पीस कर घी में तल लें और खाय। इस योग से प्रदर-रोग आराम हो जाता है। परीक्षित है।

(६) कथीरिया गोंद रात को पानी में भिगो दें। सवेरे ही उसमें 'मिश्री' मिला कर पी लें। इस नुसखे से प्रदर-रोग, प्रमेह और गरमी-ये नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है।

नोट-काँटोल के पेड़ में दूध-सा या गोंद-सा होता है। उसी को

'कथीरिया गोंद' कहते हैं। काँडोल का वृक्ष सफेद रंग का होता है। इसके पत्ते बड़े और फूल लाल होते हैं। वसंत में आम-वृक्ष की तरह मौर आ कर फल लगते हैं। फल बादाम जैसे होते हैं। पकने पर मीठे लगते हैं। इसकी जड़ लाल और शीतल होती है।

(७) कपास के पत्तों का रस, चावलों के धोवन के साथ पीने से प्रदर-रोग, आराम हो जाता है।



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मंगलवार, 18 मई 2021

मूत्रकृच्छ रोग-वर्णन एवं आयुर्वेदिक उपचार

 मूत्रकृच्छ रोग-वर्णन 

मूत्रकृच्छ किसे कहते हैं--जिस रोग में पेशाब बड़ी तकलीफ के साथ होता है, उसे मूत्रकृच्छ कहते हैं। अँगरेजी मे इसे Dysuria कहते हैं। 


मृत्रकृच्छ का सामान्य लक्षण--मूत्रकृच्छू रोग होने से पेशाब बड़ी तकलीफ के साथ बूँद-बूँद अथवा कच्चे खून के साथ थोड़ा-थोड़ा उतरता है। नाभि या सूंडी के नीचे, जाँघों में और मूत्र-नली में बड़ी वेदना होती है। मूत्रकृच्छू के यही सामान्य लक्षण हैं। 


मूत्रकृच्छु और मूत्राघात में भेद--मृत्रकृच्छ और मूत्राघात दोनों ही पेशाब के रोग हैं, दोनों में ही पेशाब के समय तकलीफ़ होती है, फिर दोनों में फर्क क्या है ? मृत्रकृच्छ में पेशाब की रुकावट थोड़ी देर तक रहती है और मूत्राघात में पेशाब की रुकावट बहुत ही ज़्यादा देर तक रहती है। मूत्रकच्छु में पेशाब करते समय बहुत ही ज़्यादा तकलीफ़ होती है, परन्तु मूत्राघात में पेशाब करते समय बहुत ही कम तकलीफ़ होती है। मतलब यह है कि मूत्रकृच्छु की अपेक्षा मूत्राघात में पेशाब करते समय दर्द कम होता है। मूत्राघात में पेशाब रुक-रुक कर थोड़ाथोड़ा होता है या बन्द ही हो जाता है किन्त मूत्रकृच्छ में पेशाब इतनी देर नहीं रुकता। 


मूत्रकृच्छु के निदान--बहुत ही ज़्यादा कसरत करने, राई आदि तीक्ष्ण यदार्थ या तीक्ष्ण दवा खाने, रूखा अन्न खाने, रूखी शराब पीने, बहुत नाचने, घोड़ा आदि की सवारी करने और उन्हें बहुत दौड़ाने, बरसात में पानी में डूबे हुए स्थानों के जानवरों का मांस खाने अथवा अनूप देश की मछलियों का मांस खाने, भोजन पर भोजन करने, अजीर्ण होने और मल-मूृत्रादि के वेग रोकने से मूत्रकृच्छु-रोग पैदा होता है। यह रोग आठ तरह का होता है।' 


मूत्रकृच्छ की किस्में--मूत्रकृच्छू रोग आठ तरह का होता है-


(१) वातज, (२) पित्तज, ( 3 ) कफज, (४) सन्निपातज, (५ ) आगन्तुक, (६) पुरीषज, ( ७) अश्मरीज, ( ८ ) शुक्रज।


वातज मूत्रकृच्छ के लक्षण-- वातज मूत्रकृच्छ के होने से दोनों वंक्षण या पट्टों, पेडू या मूत्राशय और लिंग में अत्यन्त वेदना होती और बारम्बार थोड़ा-थोड़ा पेशाब होता है। पित्तज मूत्रकृच्छ के लक्षण--पित्तज मृत्रकृच्छु में दर्द और जलन के साथ बारम्बार पीला या लाल पेशाब आता है। 


> नोट--भावप्रकाश में लिखा है, बारम्बार, पीला, खून मिला हुआ, वेदना और जलन के साथ पेशाब होता है। 


कफज मूत्रकृच्छु के लक्षण--  कफज मूत्रकृच्छ में लिंग या पेडू में भार या बोझासा मालूम होता है। सूजन होती है और पेशाब चिकना-सा या लिबलिबा-सा होता है। 


सन्निषातज मूत्रकृच्छु के लक्षण--  त्रिदोषज मूत्रकृच्छू में ऊपर लिखे हुए तीनों दोषों के लक्षण मिलते हैं। 


आगन्तुक मूत्रकृच्छ के लक्षण--  पेशाब बहाने वाली नली में चोट वगैरे लगने से लगने से घाव हो जाने और मुट्ठी वगैरे की चोट लगने से जो रोग होता है, उसे आगन्तुक या शल्यज मूत्रक॒च्छ कहते हैं। इसमें मृत्यु के समान घोर वेदना होती है। इस मृत्रकृच्छु के लक्षण वातज मृत्रकुच्छ के जैसे होते हैं।


पुरीषज मूत्रकृच्छ के लक्षण-- मल का वेग रोकने से दूषित हुई वायु पेट में 

अफारा करती है और पेशाब करते समय शूल चलते हैं। 


अश्मरीज मृत्रकृच्छु के लक्षण-- पथरी होने से जो मूृत्रकृच्छ होता है, उसे अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ या पथरी का मूत्रकृच्छु कहते हैं। छाती में दर्द, कम्प, कोखशुल, मन्दाग्नि, मूर्छा दारुण मूत्रकृच्छ--ये पथरी या शर्करा के उपद्रव हैं। 


> नोट--सुश्रुत में शर्कराजन्य मूत्रकृच्छ नवाँ लिखा है; लेकिन और आचार्यों ने आठ की गिनती रखने के लिए शर्करा के मूत्रकृष्छु को अलग नहीं लिखा। फिर पथरी और शर्करा में विशेष भेद भी नहीं है। पित्त से पक कर, वायु से सूख कर और कफ के संयोग से पथरी बनती है। मूत्र, वीर्य और कफ के समुदाय को पथरी कहते हैं। जब वही पथरी कफ के संयोग से छूट कर, मूत्र-मार्ग से had के रूप में झरने लगती है, तब उसे शर्करा या कंकरी कहते हैं। 


 सुक्रज् मृत्रकृच्छ के लक्षण-- दूषित वीर्य के मूत्राशय में रहने मे रहने से सुक्रज् मृत्रकृच्छ होता है। इस रोग में पेडू और लिंग में शूल के समान दर्द होता है और बड़े कष्ट से पेशाब होता है। 


'भावप्रकाश' में लिखा है, वीर्य के दोष से दूषित हो कर मूत्र-मार्ग सिकुड़ जाता है, तब पेशाब थोड़ा-थोड़ा होता है, मृत्र के साथ वीर्य निकलता है और मूत्राशय तथा लिंग में दर्द होता है। 


आईये अब जाने मृत्रकृच्छ के आयुर्वेदिक उपचार


(१) हुलहुल के ६ माशे बीज 'बासी पानी में” पीस-छान कर और पीने से सब तरह के असाध्य मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं।* 


(२) तीन माशे जवाखार और चीनी मिला हुआ सफ़ेद कुम्हड़े का एक तोला रस पीने से सब तरह के मूत्रकृष्छ आराम हो जाते हैं। परीक्षित है। 


(३) माठे के साथ ४ माशे शुद्ध गन्धक खाने से सब तरह के मृत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं। 


(४) ६ माशे जवाखार और १ तोले शहद मिला कर खाने से सब तरह के मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं। परीक्षित है। 


(५) fata की जड़ का काढ़ा पीने से सब तरह के मूत्रकृच्छु नष्ट हो जाते हैं। 


(६) खीरे के बीज और तिल--एकत्र पीस कर घी और दूध के साथ पीने से समस्त मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाते हैं। 


(७) इलायची, पाषाणभेद, शुद्ध शिलाजीत, पीपर, खीरे के बीज, सैंधानोन और केसर--इनको समान-समान ले कर पीस छान लो। इसमें से ४ या ६ माशे चूर्ण ‘aac के धोवन' के साथ खाने से मरता हुआ मूत्रकृच्छु रोगी भी आराम हो जाता है। 


> नोट--इलायची, फाषाणभेद, शुद्ध शिलाजीत और पीपर--इन सब का चूर्ण चावलों के धोवन के साथ लेने से भी मरता हुआ मूत्रकृच्छू-रोगी आराम हो जाता है। 

(८) लोहे की भस्म महीन पीस कर और शहद में मिला कर ३ दिन खाने से मृत्रकृच्छ रोग निश्चय ही आराम हो जाता है। इसमें ज़रा भी शक नहीं। 


(९) कतेरी का सोलह तोले रश 'शहद' मिला कर पीने से मूत्रकृच्छ नष्ट हो कर सुख होता है। परीक्षित है। 


(१०) हरड़, बहेड़े और आमले को पानी के साथ सिल पर पीस लो । फिर इसमें बेरों की मींगी और सैंधानोन मिला कर पी लो। इससे भी मूत्रकृच्छु आराम हो जाता है। 


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